Rupee vs Dollar: भारतीय रुपये के लिए मंगलवार का दिन कमजोर रहा। डॉलर के मुकाबले रुपया 96 के पार फिसलकर 96.1450 प्रति डॉलर पर पहुंच गया। यह पिछले दो महीनों का सबसे कमजोर स्तर है। कारोबारी दिन में रुपये में करीब 0.2 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई। इस कमजोरी के पीछे कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और वैश्विक बाजार में बढ़ता दबाव प्रमुख वजहों में शामिल हैं।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर काफी निर्भर है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने पर देश का आयात बिल बढ़ता है। डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होने से आयात की लागत पर दबाव और बढ़ सकता है।
कच्चे तेल ने बढ़ाई रुपये की मुश्किल
रुपये पर दबाव बढ़ाने वाली सबसे बड़ी वजहों में कच्चे तेल की तेजी शामिल है। मंगलवार को ब्रेंट क्रूड 1.5 फीसदी से ज्यादा चढ़कर करीब 107 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया। बाजार में मध्य पूर्व से ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बनी हुई है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी टकराव के कारण बाजार में आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। अमेरिकी-ईरान बातचीत में प्रगति नहीं होने से तेल बाजार पर दबाव बढ़ा है। इससे कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं। इससे पहले ऐसे संकेत आए थे कि मध्य पूर्व से कच्चे तेल का निर्यात कुछ हद तक सामान्य हो रहा है। लेकिन क्षेत्र में जारी तनाव ने बाजार की चिंता कम नहीं होने दी।
विदेशी निवेशकों ने भी बढ़ाया दबाव
ग्लोबल टेंशन का असर भारतीय शेयर और बॉन्ड बाजार पर भी पड़ा है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने रुपये पर दबाव बढ़ाया है। सितंबर में अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से करीब 3.7 अरब डॉलर की रकम निकाली है। बाजार से डॉलर की इस निकासी ने रुपये की कमजोरी को और बढ़ाया है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली सिर्फ इक्विटी तक सीमित नहीं रही। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक सितंबर में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयरों से बड़ी रकम निकाली है। ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, भू-राजनीतिक अनिश्चितता और महंगे कच्चे तेल ने निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता पर असर डाला है।
भारत के लिए महंगा तेल क्यों चिंता की बात है?
भारत नेट एनर्जी-इम्पोर्टिंग देश है। यानी देश की ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा विदेशों से आने वाले ईंधन से पूरा होता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होता है तो आयात पर ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता है। अगर इसी दौरान रुपया भी डॉलर के मुकाबले कमजोर हो, तो आयात की लागत पर दोहरा दबाव बन सकता है। महंगे तेल का असर अर्थव्यवस्था के दूसरे हिस्सों पर भी पड़ सकता है। ईंधन की लागत बढ़ने से परिवहन और उत्पादन की लागत प्रभावित हो सकती है। इसका असर आगे चलकर महंगाई पर भी पड़ सकता है।
5 FAQs
1. भारतीय रुपया कितने स्तर तक गिरा?
मंगलवार को रुपया 96.1450 प्रति डॉलर पर पहुंच गया। यह करीब दो महीनों का सबसे कमजोर स्तर है।
2. रुपये में कितनी गिरावट दर्ज हुई?
कारोबारी दिन में रुपये में करीब 0.2 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई।
3. कच्चा तेल महंगा होने से रुपये पर दबाव क्यों बढ़ता है?
भारत ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है। कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से आयात के लिए ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ सकती है, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ता है।
4. ब्रेंट क्रूड की कीमत कितनी पहुंची?
29 सितंबर 2026 को ब्रेंट क्रूड करीब 107 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया।
5. सितंबर में विदेशी निवेशकों ने कितना पैसा निकाला?
सितंबर में अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से करीब 3.7 अरब डॉलर निकाले हैं।



