Consumer Price Index: सितंबर में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.54% पर पहुंच गई, जबकि अगस्त में यह 4.82% थी। आलू, प्याज, टमाटर समेत अन्य सब्जियों और खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ने से आम लोगों के घरेलू बजट पर दबाव बढ़ा है। इसके अलावा मध्य पूर्व में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने भी महंगाई की चिंता बढ़ा दी है।
महंगाई बढ़ने से ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के लोगों पर असर पड़ा है। खाद्य महंगाई दर 5.97% से बढ़कर 7.74% हो गई है। वहीं, शहरी महंगाई 4.31% से बढ़कर 4.88% और ग्रामीण महंगाई 5.24% से बढ़कर 6.08% पर पहुंच गई है।
महंगाई पर काबू पाने के लिए आरबीआई की भूमिका अहम
महंगाई को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति के तहत ब्याज दरों में बदलाव करता है। ब्याज दरें बढ़ने से कर्ज लेना महंगा हो सकता है और बाजार में मांग कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, ब्याज दरों का फैसला महंगाई, आर्थिक विकास और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखकर लिया जाता है।
गांव और शहर की महंगाई में क्या है अंतर?
सरकार खुदरा महंगाई दर की गणना के लिए वस्तुओं और सेवाओं की एक टोकरी का इस्तेमाल करती है। इसमें खाद्य पदार्थ, कपड़े, मकान का किराया, शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन जैसी जरूरतें शामिल होती हैं। ग्रामीण और शहरी परिवारों के खर्च करने के तरीके अलग होने के कारण महंगाई की गणना में इन वस्तुओं और सेवाओं को दिया जाने वाला भार भी अलग-अलग होता है।
ग्रामीण महंगाई का खाने-पीने की चीजों से सीधा संबंध
ग्रामीण परिवारों के बजट में खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की जरूरतों का महत्वपूर्ण स्थान होता है। ऐसे में बारिश की कमी, फसल खराब होने या आपूर्ति प्रभावित होने से अनाज और सब्जियों के दाम बढ़ने पर ग्रामीण परिवारों का खर्च तेजी से बढ़ सकता है। यही वजह है कि खाद्य पदार्थों की कीमतों में बदलाव ग्रामीण महंगाई को प्रभावित करता है।
शहरी परिवारों पर किराए और परिवहन का भी असर
शहरों में रहने वाले परिवारों के खर्च में मकान का किराया, बच्चों की फीस, इलाज और परिवहन जैसी मदों की भी बड़ी भूमिका होती है। पेट्रोल, बस और टैक्सी के किराए में बढ़ोतरी से उनका मासिक बजट प्रभावित होता है। इसलिए शहरी महंगाई को समझने के लिए सिर्फ खाद्य पदार्थों के दाम नहीं, बल्कि दूसरी जरूरी सेवाओं की कीमतों पर भी ध्यान देना पड़ता है।
महंगाई कैसे बढ़ती और घटती है?
महंगाई पर मांग और आपूर्ति का सीधा असर पड़ता है। जब किसी वस्तु की मांग बढ़ जाती है, लेकिन बाजार में उसकी उपलब्धता पर्याप्त नहीं होती, तो कीमतें बढ़ सकती हैं। इसके उलट, मांग कम होने और आपूर्ति पर्याप्त रहने पर कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव घट सकता है। हालांकि, ईंधन की कीमतें, मौसम, उत्पादन लागत और सरकारी नीतियां भी महंगाई को प्रभावित करती हैं।
5.54% महंगाई दर का क्या मतलब है?
खुदरा महंगाई दर की साल-दर-साल गणना में किसी महीने की कीमतों की तुलना पिछले साल के उसी महीने से की जाती है। उदाहरण के लिए, सितंबर 2026 की महंगाई दर की तुलना सितंबर 2025 की कीमतों से की जाएगी। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में शामिल वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में हुए बदलाव के आधार पर यह दर निकाली जाती है।
100 रुपये का सामान अब 105.54 रुपये का?
अगर किसी सामान या वस्तुओं के समूह की कीमत सितंबर 2025 में 100 रुपये थी और उसकी कीमत में एक साल के दौरान ठीक 5.54% की बढ़ोतरी हुई, तो सितंबर 2026 में उसकी कीमत 105.54 रुपये होगी। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर सामान की कीमत इतनी ही बढ़ी है। कुछ वस्तुएं इससे ज्यादा महंगी हुई होंगी, जबकि कुछ की कीमतों में कम बढ़ोतरी या गिरावट भी हो सकती है।



