Bilaspur Municipal Corporation: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लेकर न्यायधानी बिलासपुर तक प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में खलबली मची हुई है। एक तरफ जहां राजधानी रायपुर में नगर निगम की आंतरिक कलह, साफ-सफाई की बदतर स्थिति और जनता की समस्याओं को लेकर सियासत गरमाई हुई है, वहीं दूसरी तरफ बिलासपुर में सड़कों की खराब हालत को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है।
जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच चल रही तनातनी के कारण आम जनता को लगातार भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
रायपुर नगर निगम में एमआईसी और अधिकारियों के बीच खींचतान
राजधानी रायपुर में समस्याओं का अंबार लगा हुआ है और शहर की साफ-सफाई व विकास कार्यों की जिम्मेदारी संभालने वाले नगर निगम के अधिकारी जनप्रतिनिधियों की सुनने को तैयार नहीं हैं। स्थिति यह है कि महापौर और निगम कमिश्नर के बीच आपसी समन्वय की कमी साफ झलकती है। हाल ही में हुई महापौर परिषद (MIC) की बैठक में भी यह तल्खी खुलकर सामने आई। बैठक घंटों देरी से शुरू हुई और उसमें जनता के मुद्दों पर चर्चा होने के बजाय एमआईसी सदस्यों और अधिकारियों के बीच की खींचतान जगजाहिर हो गई।
प्रतिपक्ष ने लगाए गंभीर आरोप, शहर के विकास कार्य ठप
रायपुर नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष आकाश तिवारी ने आरोप लगाया है कि निगम प्रशासन में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। भाटागांव सब्जी बाजार के व्यवस्थापन, संपत्ति कर, वार्डों के विकास कार्यों, अवैध निर्माण, बेजा कब्जा और जल जीवन मिशन जैसे महत्वपूर्ण जनहित के मुद्दों पर गंभीर चर्चा होने के बजाय केवल अव्यवस्था देखने को मिली। उन्होंने कहा कि निगम में दो फाड़ हो चुका है—एक तरफ महापौर परिषद है और दूसरी तरफ मनमानी करने वाला अधिकारी वर्ग, जिससे आम जनता पिस रही है।
बिलासपुर हाईकोर्ट की कड़ी नाराजगी और मुख्य न्यायाधीश की दो टूक
राजधानी की तरह ही बिलासपुर नगर निगम क्षेत्र में भी सड़कों की बदहाली और अधिकारियों की कार्यप्रणाली से जनता परेशान है। इस मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की युगलपीठ ने कड़ा असंतोष व्यक्त किया है। मुख्य न्यायाधीश कृष्ण राम महापात्र और न्यायाधीश संतोष शर्मा की पीठ ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2021 से याचिका लंबित होने के बावजूद सड़कों की स्थिति में कोई ठोस सुधार नहीं आया है। अदालत के समक्ष प्रस्तुत रिपोर्टों से यह साफ हो गया है कि शहर की सड़कों की हालत बेहद दयनीय है।
सेंदरी-मोपका बाईपास और एनएचएआई के रुख पर अदालत हैरान
सुनवाई के दौरान सेंदरी-मोपका बाईपास के निर्माण को लेकर राज्य सरकार और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के रुख पर अदालत ने गहरी हैरानी जताई। एनएचएआई की ओर से बताया गया कि यह सड़क अब तक उन्हें सौंपी ही नहीं गई है और यह लोक निर्माण विभाग (PWD) के अधीन है। इस पर टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि शासन इस परियोजना को पूरा करने या इसे स्थानांतरित करने में गंभीर नहीं है। अदालत ने पीडब्ल्यूडी सचिव से विस्तृत शपथ पत्र पेश करने को कहा है।
बिलासपुर नगर निगम आयुक्त को चेतावनी और उपस्थिति के निर्देश
सुनवाई के दौरान बिलासपुर नगर निगम की ओर से किसी भी अधिवक्ता के उपस्थित न रहने पर उच्च न्यायालय ने अत्यंत कड़ी नाराजगी जाहिर की। पीठ ने निगम आयुक्त को आगामी सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने या उचित प्रतिनिधि भेजने का सख्त निर्देश दिया है, ऐसा न होने पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। इसके अलावा न्याय मित्र वरिष्ठ अधिवक्ता ने पूजा पर्व से पहले सड़कों की मरम्मत न होने पर हादसों की आशंका जताते हुए तत्काल सुधार की मांग की है।
डामर की दरें बढ़ने से 50 करोड़ की पांच परियोजनाएं अधर में
बिलासपुर में नगर निगम की करीब 12 किलोमीटर लंबी पांच प्रमुख सड़क परियोजनाएं डामरीकरण के चरण में पहुंचकर अटक गई हैं। डामर की कीमतों में भारी बढ़ोतरी और आपूर्ति की कमी के चलते ठेकेदारों ने काम रोक दिया है और प्राकलन (एस्टीमेट) में संशोधन की मांग की है। प्रभावित परियोजनाओं में अशोक नगर मार्ग, साइंस कॉलेज मार्ग, अपोलो मार्ग, स्मृति वन मार्ग और अरपा अटल पथ शामिल हैं, जिनकी लागत लगभग 50 करोड़ रुपये है। हाईकोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 14 अक्तूबर को तय की है।
जनता का दर्द: प्रशासनिक मनमानी और अदालती दखल की मजबूरी
आम नागरिकों का कहना है कि जब स्थानीय निकाय और नगर निगम के अधिकारी किसी की नहीं सुनते और मनमानी करते हैं, तब जनता को न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। बिलासपुर हाईकोर्ट द्वारा सड़कों को दुरुस्त करने के लिए दिए गए कड़े निर्देशों के बाद अब यह देखना अहम होगा कि शासन और प्रशासन इस दिशा में कितनी जल्दी और प्रभावी कार्रवाई करते हैं ताकि आम जनता को राहत मिल सके।



