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Bilaspur: कब्रिस्तान की जमीन पर 70 साल से कब्जे का दावा, बिलासपुर हाई कोर्ट ने खारिज की याचिका: कहा – लंबा कब्जा मालिकाना हक नहीं बनता

High Court’s verdict on land possession: छत्तीसगढ़ में सरकारी जमीन पर कब्जा कर मालिकाना हक जताने वालों के लिए बिलासपुर हाई कोर्ट का बड़ा झटका है। जशपुर जिले में कब्रिस्तान के लिए आरक्षित जमीन पर 70 साल से कब्जे के आधार पर मालिकाना हक मांगने वाले तीन दावेदारों की याचिका को हाई कोर्ट ने खारिज […]

Bilaspur: कब्रिस्तान की जमीन पर 70 साल से कब्जे का दावा, बिलासपुर हाई कोर्ट ने खारिज की याचिका: कहा – लंबा कब्जा मालिकाना हक नहीं बनता
तस्वीर: The Rural Press फाइल / सौजन्य

High Court’s verdict on land possession: छत्तीसगढ़ में सरकारी जमीन पर कब्जा कर मालिकाना हक जताने वालों के लिए बिलासपुर हाई कोर्ट का बड़ा झटका है। जशपुर जिले में कब्रिस्तान के लिए आरक्षित जमीन पर 70 साल से कब्जे के आधार पर मालिकाना हक मांगने वाले तीन दावेदारों की याचिका को हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा है – सिर्फ सालों तक जमीन पर काबिज रहने से कोई मालिक नहीं बन जाता।

जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की सिंगल बेंच ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जशपुर तहसील के चिर बगीचा मोहल्ले का यह मामला है। याचिकाकर्ता बाराती भगत, दीपक राम भगत और राजेश राम भगत ने खसरा नंबर 505 की कुल 6.69 एकड़ जमीन में से 1.50 एकड़ जमीन पर अपना मालिकाना हक घोषित करने की मांग की थी।

आजादी से पहले के कब्जे का दावा 

उनका दावा था कि उनके पूर्वज आजादी से पहले से इस जमीन पर काबिज हैं। वे लगातार कृषि कार्य कर रहे हैं। करीब 70 साल से लगातार कब्जा होने के कारण प्रतिकूल कब्जे (Adverse Possession) के आधार पर उनका मालिकाना हक बन चुका है। उन्होंने जमीन पर स्थायी रोक लगाने की भी मांग की थी।

सरकार ने कहा – यह जमीन कब्रिस्तान के लिए आरक्षित है

राज्य सरकार ने कोर्ट में याचिकाकर्ताओं के दावे का जोरदार विरोध किया। सरकार ने राजस्व अभिलेख और 26 जून 1957 के निस्तार पत्रक को कोर्ट में पेश किया, जिसमें यह जमीन स्पष्ट रूप से कब्रिस्तान के लिए आरक्षित दर्ज है।

सरकार का कहना था कि शासकीय और सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित जमीन पर प्रतिकूल कब्जे का दावा नहीं किया जा सकता।

निचली अदालतों से भी झटका लग चुका था

यह मामला पहले जशपुर सिविल न्यायालय में गया था, जहां कोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव में स्वामित्व के दावे को खारिज कर दिया था। इसके बाद जिला न्यायालय में अपील की गई, वहां भी फैसला बरकरार रहा और अपील खारिज हो गई। इसी के खिलाफ हाई कोर्ट में दूसरी अपील दायर की गई थी।

हाई कोर्ट ने क्या कहा? – 5 बातें जो साबित करनी जरूरी हैं

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में प्रतिकूल कब्जे को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा:

1.  केवल यह कहना कि कई वर्षों से कब्जा है, पर्याप्त नहीं है।

2.  कब्जे का दावा करने वाले को यह साबित करना होगा कि कब्जा कब शुरू हुआ।

3.  कब्जे की प्रकृति क्या थी, क्या वह खुला और लगातार था?

4.  वास्तविक मालिक को इस कब्जे की जानकारी थी या नहीं।

5.  यह कब्जा कब से वास्तविक मालिक के अधिकार के प्रतिकूल हुआ।

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता इनमें से एक भी तथ्य को स्पष्ट रूप से साबित नहीं कर पाए।

सबसे बड़ी टिप्पणी – कानून का महत्वपूर्ण सवाल ही नहीं

हाई कोर्ट ने कहा कि इस दूसरी अपील में कानून का कोई महत्वपूर्ण सवाल (Substantial Question of Law) ही नहीं बनता। लंबा कब्जा अपने आप प्रतिकूल कब्जा नहीं बन जाता। इसके लिए खुला, लगातार और वास्तविक मालिक के अधिकार को नकारने वाला कब्जा साबित करना जरूरी है।

FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल 

Q1. बिलासपुर हाई कोर्ट में कब्रिस्तान जमीन का क्या मामला था?

Ans. जशपुर में खसरा 505 की 6.69 एकड़ में से 1.50 एकड़ कब्रिस्तान आरक्षित जमीन पर तीन लोगों ने 70 साल से कब्जे के आधार पर मालिकाना हक का दावा किया था।

Q2. हाई कोर्ट ने याचिका क्यों खारिज की?

Ans. कोर्ट ने कहा कि केवल लंबा कब्जा मालिकाना हक का आधार नहीं बन सकता। कब्जे की शुरुआत, प्रकृति और वास्तविक मालिक के अधिकार के खिलाफ कब से है, यह साबित करना जरूरी है, जो याचिकाकर्ता नहीं कर पाए।

Q3. इस जमीन के दस्तावेज में क्या दर्ज है?

Ans. राजस्व अभिलेख और 26 जून 1957 के निस्तार पत्रक में यह जमीन कब्रिस्तान के लिए आरक्षित दर्ज है।

Shami Imam
लेखक / पत्रकार:

Shami Imam

विशेष संवाददाता (Special Correspondent)

वरिष्ठ न्यूज़ रिपोर्टर, The Rural Press

The Rural Press के लिए निष्पक्ष और निर्भीक रिपोर्टिंग।

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