रायपुर। छत्तीसगढ़ में धान की खेती का वास्तविक रकबा पता करने के लिए अब आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके लिए खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण संचालनालय और छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (CGCOST) के बीच बुधवार को समझौता ज्ञापन (MoU) हुआ है।
इस व्यवस्था में सैटेलाइट इमेजरी, रिमोट सेंसिंग और GIS तकनीक की मदद से धान की खेती वाले क्षेत्रों की पहचान, मैपिंग और सत्यापन किया जाएगा। यानी डिजिटल रिकॉर्ड में जिस खेत को धान की खेती के रूप में दर्ज किया गया है, उसकी वास्तविक स्थिति का सैटेलाइट तस्वीरों के जरिए मिलान किया जा सकेगा।
इससे धान के रकबे से जुड़े आंकड़ों को ज्यादा सटीक और भरोसेमंद बनाने की कोशिश होगी। खास तौर पर ऐसे इलाकों पर भी ध्यान दिया जाएगा, जहां अभी जियो-रेफरेंस्ड कृषि भूमि का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
खेत के रिकॉर्ड और सैटेलाइट तस्वीरों का होगा मिलान
नई तकनीकी व्यवस्था में अलग-अलग स्रोतों से मिलने वाले कृषि डेटा को एक साथ इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें भू-अभिलेख, डिजिटल क्रॉप सर्वे और सैटेलाइट इमेजरी प्रमुख होंगे।
जियो-रेफरेंस्ड कृषि भूमि में दर्ज Latitude और Longitude को सैटेलाइट से मिलने वाली तस्वीरों से मिलाया जाएगा। इससे यह जांचने में मदद मिलेगी कि संबंधित स्थान पर वास्तव में धान की फसल मौजूद है या नहीं।
यानी कागज या डिजिटल रिकॉर्ड में दर्ज जानकारी और खेत की वास्तविक स्थिति के बीच मिलान तकनीकी तरीके से किया जा सकेगा।
FRA और डुबान क्षेत्रों की भी होगी मैपिंग
परियोजना में वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत आने वाले क्षेत्रों और डुबान क्षेत्र की कृषि भूमि को भी शामिल किया गया है।
इन क्षेत्रों में कई कृषि भू-भागों का जियो-रेफरेंस्ड रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने से डिजिटल सत्यापन में परेशानी आती है। अब ऐसे कृषि क्षेत्रों की GIS आधारित पॉलीगॉन लेयर तैयार की जाएगी।
इसके बाद सैटेलाइट इमेजरी और रिमोट सेंसिंग की मदद से इन क्षेत्रों में धान की खेती वाले हिस्से की पहचान और क्षेत्रफल निर्धारित करने का प्रयास किया जाएगा।
क्या होगा फायदा?
इस प्रक्रिया से ऐसे कृषि क्षेत्रों को भी डिजिटल रिकॉर्ड से जोड़ने में मदद मिल सकती है, जिनकी जानकारी अभी पूरी तरह जियो-रेफरेंस्ड रूप में उपलब्ध नहीं है।
सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर बड़े क्षेत्र में फसल की स्थिति का विश्लेषण भी किया जा सकेगा।
मैनुअल प्रक्रिया पर निर्भरता होगी कम
बड़े कृषि क्षेत्र का सर्वे केवल पारंपरिक या मैनुअल तरीके से करना समय लेने वाला काम हो सकता है। सैटेलाइट और GIS तकनीक के इस्तेमाल से बड़े इलाके की जानकारी व्यवस्थित तरीके से जुटाने और उसका विश्लेषण करने में मदद मिलेगी।
हालांकि, तकनीकी डेटा का इस्तेमाल खेत की वास्तविक स्थिति के सत्यापन के लिए किया जाएगा। इसका उद्देश्य मानवीय प्रक्रिया को पूरी तरह खत्म करना नहीं, बल्कि उपलब्ध कृषि रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति के बीच बेहतर मिलान तैयार करना है।
डिजिटल क्रॉप सर्वे को मिलेगा तकनीकी आधार
खाद्य संचालनालय और CGCOST के बीच हुआ यह सहयोग प्रदेश में डिजिटल क्रॉप सर्वे को तकनीकी आधार देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
भू-अभिलेख, GIS मैपिंग, डिजिटल क्रॉप सर्वे और सैटेलाइट आधारित सत्यापन से कृषि क्षेत्रफल से जुड़े डेटा को एक साथ देखा जा सकेगा। इससे भविष्य में फसल के रकबे का अधिक व्यवस्थित विश्लेषण करने में मदद मिल सकती है।
धान उपार्जन में भी काम आएगा सटीक डेटा
छत्तीसगढ़ में धान उपार्जन बड़े पैमाने पर होता है। ऐसे में धान की खेती के वास्तविक रकबे से जुड़ी जानकारी महत्वपूर्ण है।
नई व्यवस्था के जरिए भू-स्थानिक डेटा और सैटेलाइट इमेजरी का इस्तेमाल बढ़ाकर अधिक प्रमाणिक कृषि डेटा तैयार करने का प्रयास किया जाएगा। इससे धान के रकबे से जुड़े आंकड़ों की जांच और विश्लेषण के लिए एक अतिरिक्त तकनीकी आधार उपलब्ध होगा।
MoU के दौरान ये अधिकारी रहे मौजूद
समझौता ज्ञापन के दौरान प्रमुख सचिव विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सोनमणि बोरा, खाद्य विभाग की सचिव रीना बाबा साहेब कंगाले, खाद्य संचालनालय की संचालक डॉ. फरिहा आलम और CGCOST के संचालक कवीश्वर सहित संबंधित अधिकारी मौजूद रहे।
एक नजर में
1.धान के वास्तविक रकबे के आकलन में सैटेलाइट तकनीक का इस्तेमाल होगा।
2. से धान वाले क्षेत्रों की पहचान की जाएगी।
3.भू-अभिलेख और डिजिटल क्रॉप सर्वे के डेटा का सैटेलाइट इमेजरी से मिलान होगा।
4.FRA और डुबान क्षेत्रों की कृषि भूमि की डिजिटल मैपिंग की जाएगी।
5.इसका उद्देश्य धान के रकबे से जुड़े आंकड़ों को अधिक सटीक और भरोसेमंद बनाना है।



