CG News: छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ अभियान के बीच अब ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर राजनीतिक बहस तेज होती दिखाई दे रही है। दिल्ली से लेकर बस्तर तक इस शब्द को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम के बयान के बाद बस्तर शांति समिति से जुड़े लोगों ने भी सवाल उठाते हुए कहा है कि जब बस्तर हिंसा से बाहर निकलकर शांति और विकास की दिशा में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है, तब ऐसे बयान लोगों को भ्रमित करने का काम कर सकते हैं। बता दें कि पी. चिदंबरम ने कहा है कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है।

लेकिन इस बहस को केवल बयानबाजी तक सीमित करके देखना बस्तर की उस वास्तविकता को नजरअंदाज करना होगा, जिसे यहां के लोगों ने दशकों तक झेला है। नक्सली हिंसा का असर सिर्फ पुलिस और सुरक्षा बलों तक नहीं रहा। इसके निशान ग्रामीणों, आदिवासी परिवारों, महिलाओं, बच्चों और उन परिवारों की जिंदगी में भी दिखाई देते हैं, जिन्होंने अपने किसी सदस्य को खोया या किसी अपने को हमेशा के लिए दिव्यांग होते देखा।

‘दिमागी नक्सल’ की बहस में बस्तर की पीड़ा भी याद रखनी होगी
आज ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर बहस हो रही है, लेकिन बस्तर के लिए नक्सलवाद कोई वैचारिक बहस भर नहीं रहा है। यहां यह दशकों तक जमीन पर मौजूद हिंसा की वास्तविकता रहा है। गोलियों की आवाज, आईईडी विस्फोट, अपहरण, धमकियां और हमलों ने हजारों परिवारों की जिंदगी प्रभावित की है।कांकेर के गौतरीराम विश्वकर्मा की कहानी इसका एक उदाहरण है। 22 सितंबर 2009 को उन्हें घर से अगवा कर जंगल ले जाया गया और गोली मार दी गई। वे बच तो गए, लेकिन सामान्य जीवन में वापस नहीं लौट सके। सियाराम रामटेके भी नक्सली हमले में गंभीर रूप से घायल हुए और आज सहारे के साथ जीवन जी रहे हैं। ये घटनाएं सिर्फ आंकड़े नहीं हैं। हर घटना के पीछे एक परिवार है, जिसकी जिंदगी उस एक दिन के बाद बदल गई।

नक्सली हिंसा का शिकार केवल जवान नहीं, ग्रामीण भी हुए
नक्सलवाद पर चर्चा अक्सर सुरक्षा बलों और मुठभेड़ों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहती है। लेकिन बस्तर की कहानी इससे कहीं बड़ी है। नक्सली हिंसा में कई ऐसे ग्रामीण भी प्रभावित हुए, जिनका किसी संघर्ष से कोई लेना-देना नहीं था। दंतेवाड़ा के नंदलाल मुड़ामी पर घर में घुसकर हमला किया गया। अवलम मारा जंगल में अपने पिता के साथ जा रहे थे, तभी प्रेशर बम की चपेट में आ गए और उनका पैर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। ऐसी घटनाएं बताती हैं कि हिंसा का दायरा जंगल से निकलकर गांव और घरों तक पहुंच गया था। बारूदी सुरंगों ने उन रास्तों को भी खतरनाक बना दिया, जिनसे होकर ग्रामीण अपनी रोजी-रोटी के लिए जंगल और खेतों तक पहुंचते थे।

शहीद परिवारों के लिए ‘नक्सलवाद’ कोई बहस नहीं
बस्तर में नक्सली हिंसा ने कई परिवारों से उनके बेटे, पति और पिता छीन लिए। आरक्षक मोहन उडके की शहादत के बाद उनकी पत्नी आरती उडके के लिए नक्सलवाद किसी राजनीतिक शब्दावली का हिस्सा नहीं, बल्कि जिंदगीभर का दर्द है। इसी तरह सहायक कमांडेंट रामपाल सिंह के परिवार ने भी उनकी शहादत का दर्द झेला। 10 जून 2009 को बीजापुर जिले में माओवादियों के खिलाफ अभियान के दौरान वे वीरगति को प्राप्त हुए। इन परिवारों के लिए सवाल यह नहीं है कि नक्सलवाद को किस शब्द से परिभाषित किया जाए। उनके लिए सवाल यह है कि हिंसा ने उनसे क्या छीना।

जवानों ने गंवाए अंग, परिवारों ने खोया सहारा
नक्सल हिंसा का एक और दर्दनाक पक्ष उन जवानों की जिंदगी है, जो हमलों में घायल होने के बाद आज भी अपने शरीर पर उन घटनाओं के निशान लेकर जी रहे हैं। सीजी पुलिस के जवान अमर सिंह कुमेटी प्रेशर बम विस्फोट में गंभीर रूप से घायल हुए और उनका एक पैर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। तरुण कलाकार की रीढ़ की हड्डी और सिर में गंभीर चोटें आईं। वहीं 25 जनवरी 2026 को आईईडी विस्फोट के बाद हुए हमले में सीआरपीएफ कोबरा जवान रुद्रेश सिंह गंभीर रूप से घायल हुए और उनकी दोनों टांगों को घुटने के नीचे से काटना पड़ा। इन लोगों के लिए नक्सली हिंसा एक बीती हुई खबर नहीं है। यह उनके शरीर और जीवन का हिस्सा बन चुकी है।

बस्तर अब किस दिशा में बढ़ना चाहता है?
यही वह सवाल है, जो ‘दिमागी नक्सल’ की बहस के बीच सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। बस्तर के लोगों ने हिंसा का लंबा दौर देखा है। अब सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सुरक्षा और बेहतर भविष्य की उम्मीदें भी उसी समाज के केंद्र में हैं। बस्तर को अगर बंदूक और बारूदी सुरंगों से बाहर निकालना है तो केवल सुरक्षा अभियान ही पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ लोगों का विश्वास मजबूत करना, विकास को गांवों तक पहुंचाना और युवाओं के लिए अवसर पैदा करना भी जरूरी है। बस्तर शांति समिति से जुड़े लोगों की आपत्ति भी इसी संदर्भ में सामने आती है। उनका कहना है कि शांति की ओर बढ़ रहे क्षेत्र में ऐसे बयान नहीं होने चाहिए, जो लोगों के बीच फिर से भ्रम या अविश्वास पैदा करें।

‘दिमागी नक्सल’ से बड़ा सवाल है शांति
‘दिमागी नक्सल’ शब्द पर राजनीतिक बहस हो सकती है। इसके अर्थ, इस्तेमाल और संदर्भ पर अलग-अलग राय भी हो सकती है। लेकिन बस्तर की जमीन पर एक सवाल इससे बड़ा है क्या आने वाली पीढ़ी को हिंसा की वही विरासत मिलेगी, या अब बस्तर शांति और विकास की नई कहानी लिखेगा? नक्सली हिंसा की घटनाओं को याद करना किसी विचारधारा या राजनीतिक पक्ष का समर्थन करना नहीं है। यह उन लोगों की पीड़ा को सामने लाना है, जिन्होंने उस हिंसा को अपनी जिंदगी में झेला है। गौतरीराम विश्वकर्मा से लेकर सियाराम रामटेके तक, नंदलाल मुड़ामी से लेकर अवलम मारा तक और शहीद जवानों के परिवारों से लेकर घायल सुरक्षा कर्मियों तक इन सभी की कहानियां एक बात कहती हैं कि हिंसा की कीमत हमेशा आम इंसान चुकाता है।

बस्तर में स्थायी शांति कैसे आएगी?
इसलिए बस्तर की मौजूदा बहस को केवल ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्दों तक सीमित करने के बजाय उस बड़े सवाल पर केंद्रित करने की जरूरत है कि बस्तर में स्थायी शांति कैसे आएगी। बंदूक किसी भी पक्ष के हाथ में हो, उसका सबसे बड़ा असर समाज पर पड़ता है। बस्तर की जरूरत अब बहस से ज्यादा भरोसे की है, टकराव से ज्यादा संवाद की है और हिंसा से ज्यादा विकास की है। बस्तर की नई पहचान अगर बननी है, तो वह बारूदी सुरंगों और गोलियों से नहीं, बल्कि शांति, शिक्षा, रोजगार, विकास और सुरक्षित भविष्य से बने यही उन परिवारों की पीड़ा का सबसे सार्थक जवाब हो सकता है, जिन्होंने नक्सली हिंसा में अपना सब कुछ खोया है।

नवीन कुमार साहू को पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में 5 वर्ष से अधिक का अनुभव है। उन्होंने कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय से Bachelor of Science (Electronic Media) और Master of Science (Electronic Media) की डिग्री हासिल की है। उन्होंने राजधानी रायपुर के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है।