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1500 ज्योति कलश, संतान की कामना और लव-कुश की मान्यता; जानें तुरतुरिया धाम की अनोखी कहानी

Navratri Turturiya Dham Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार जिले में स्थित तुरतुरिया धाम में शारदीय नवरात्र के दौरान करीब 1500 ज्योति कलश प्रज्वलित किए गए। कसडोल विकासखंड से करीब 22 किलोमीटर दूर सिरपुर मार्ग पर स्थित इस धाम में माता पहाड़ावाली की पूजा काली स्वरूप में की जाती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, माता को संतानदात्री […]

1500 ज्योति कलश, संतान की कामना और लव-कुश की मान्यता; जानें तुरतुरिया धाम की अनोखी कहानी
तस्वीर: The Rural Press फाइल / सौजन्य

Navratri Turturiya Dham Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार जिले में स्थित तुरतुरिया धाम में शारदीय नवरात्र के दौरान करीब 1500 ज्योति कलश प्रज्वलित किए गए। कसडोल विकासखंड से करीब 22 किलोमीटर दूर सिरपुर मार्ग पर स्थित इस धाम में माता पहाड़ावाली की पूजा काली स्वरूप में की जाती है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार, माता को संतानदात्री देवी माना जाता है। इसी विश्वास के साथ श्रद्धालु यहां संतान प्राप्ति और अन्य मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए दर्शन करने पहुंचते हैं।

नवरात्रि में ज्योति कलश से रोशन होता है माता का दरबार

तुरतुरिया धाम में चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। इस वर्ष शारदीय नवरात्र में यहां करीब 1500 ज्योति कलश प्रज्वलित किए गए। इनकी देखरेख जनपद पंचायत की ओर से नियुक्त पुजारी करते हैं। नवरात्र के दिनों में मंदिर परिसर में भक्तिमय माहौल रहता है। श्रद्धालु माता के दर्शन कर पूजा-अर्चना करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि सहित अपनी मनोकामनाओं के लिए प्रार्थना करते हैं।

संतान की कामना लेकर पहुंचते हैं श्रद्धालु

तुरतुरिया धाम की प्रमुख पहचान पहाड़ी पर स्थित माता पहाड़ावाली का मंदिर है। यहां माता की पूजा काली स्वरूप में होती है। स्थानीय मान्यता है कि माता पहाड़ावाली संतानदात्री हैं। इसी विश्वास के चलते संतान की कामना रखने वाले दंपति यहां दर्शन करने पहुंचते हैं। मान्यता के अनुसार, मनोकामना पूरी होने के बाद श्रद्धालु दोबारा मंदिर आकर चढ़ावा चढ़ाते हैं और माता के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। छत्तीसगढ़ के अलग-अलग क्षेत्रों के अलावा दूसरे राज्यों से भी भक्त यहां आते हैं।

माता के मंदिर के नीचे है वाल्मीकि आश्रम

तुरतुरिया का धार्मिक महत्व पहाड़ावाली माता के मंदिर तक सीमित नहीं है। मंदिर के नीचे स्थित वाल्मीकि आश्रम को भगवान श्रीराम और माता सीता के पुत्र लव-कुश की जन्मस्थली के रूप में मान्यता प्राप्त है। घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच स्थित यह आश्रम धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां आने वाले श्रद्धालु आश्रम के दर्शन करते हैं। इससे तुरतुरिया धाम की पहचान आस्था के साथ पौराणिक परंपराओं से भी जुड़ती है।

‘तुरतुर’ की आवाज से जुड़ा है धाम का नाम

तुरतुरिया में गोमुखी प्राकृतिक झरना भी आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। स्थानीय जानकारी के अनुसार, इस झरने में सालभर पानी बहता रहता है। पानी के प्रवाह से ‘तुरतुर’ जैसी आवाज सुनाई देती है। मान्यता है कि इसी आवाज के कारण इस स्थान का नाम तुरतुरिया पड़ा। झरने के आसपास हरियाली, पहाड़ियां और घने जंगल हैं। धार्मिक दर्शन के लिए आने वाले लोगों के साथ प्रकृति के बीच समय बिताने के इच्छुक पर्यटक भी इस स्थान पर पहुंचते हैं।

राम वन गमन पथ से भी जुड़ा है तुरतुरिया

तुरतुरिया को राम वन गमन पथ में शामिल किए जाने से इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को विशेष महत्व मिला है। यहां माता पहाड़ावाली का मंदिर, वाल्मीकि आश्रम और गोमुखी झरना एक ही क्षेत्र में स्थित हैं। नवरात्र के दौरान माता की आराधना और ज्योति कलश स्थापना इस धाम की खास पहचान है। आस्था, पौराणिक मान्यताओं और प्राकृतिक परिवेश के कारण तुरतुरिया छत्तीसगढ़ के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है।

Rverma
लेखक / पत्रकार:

Rverma

विशेष संवाददाता (Special Correspondent)

वरिष्ठ न्यूज़ रिपोर्टर, The Rural Press

The Rural Press के लिए निष्पक्ष और निर्भीक रिपोर्टिंग।

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