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धमतरी के इस गांव में दशमी नहीं, एकादशी को होता है दशहरा! सहस्त्रबाहु की प्रतिमा का वध, मिट्टी का लगता है तिलक

देवेंद्र कुमार मिश्रा देशभर में दशमी के दिन रावण दहन के साथ दशहरा मनाया जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के सिहावा भीतररास गांव में दशहरा मनाने की परंपरा बिल्कुल अनोखी है यहां दशमी नहीं, बल्कि एकादशी के दिन दशहरा मनाया जाता है रावण के पुतले का दहन करने के बजाय सहस्त्रबाहु की नग्न […]

Sihawa Dussehra
तस्वीर: The Rural Press फाइल / सौजन्य

देवेंद्र कुमार मिश्रा

देशभर में दशमी के दिन रावण दहन के साथ दशहरा मनाया जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के सिहावा भीतररास गांव में दशहरा मनाने की परंपरा बिल्कुल अनोखी है यहां दशमी नहीं, बल्कि एकादशी के दिन दशहरा मनाया जाता है रावण के पुतले का दहन करने के बजाय सहस्त्रबाहु की नग्न प्रतिमा का खड्ग से वध किया जाता है इसके बाद श्रद्धालु प्रतिमा की मिट्टी को पवित्र मानकर माथे पर तिलक लगाते हैं और विजय का उत्सव मनाते हैं इस बार 21 अक्टूबर को दशहरा पर्व के अवसर पर सिहावा की यह अनूठी परंपरा एक बार फिर चर्चा में रहेगी।

दशमी नहीं, एकादशी को मनाया जाता है दशहरा

धमतरी जिले के सिहावा क्षेत्र का भीतररास गांव अपनी सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा के लिए जाना जाता है यहां दशहरा मनाने का तरीका दूसरे स्थानों से अलग है एकादशी के दिन सुबह से ही गांव में लोगों की भीड़ जुटने लगती है दूर-दराज से लोग इस अनोखे आयोजन को देखने पहुंचते हैं, जहां परंपरागत विधि-विधान के साथ सहस्त्रबाहु की प्रतिमा का वध किया जाता है।खड्ग से होता है प्रतिमा का वध, मिट्टी के तिलक से मनता है जश्न इस आयोजन का सबसे खास दृश्य सहस्त्रबाहु की नग्न प्रतिमा का वध है गांव के कुम्हार द्वारा तैयार की गई प्रतिमा का मंदिर के पुजारी मंत्रोच्चार और धार्मिक विधि-विधान के बाद खड्ग से वध करते हैं इसके बाद श्रद्धालु प्रतिमा की मिट्टी लेने के लिए उमड़ पड़ते हैं मान्यता के अनुसार, इस मिट्टी को पवित्र माना जाता है लोग इसे अपने घर ले जाते हैं और एक-दूसरे के माथे पर तिलक लगाकर विजय की खुशी मनाते हैं स्थानीय मान्यता के अनुसार, वासना से ग्रसित असुर का वध माता चंडिका ने अपने खड्ग से किया था।इसी धार्मिक विश्वास से इस अनोखी परंपरा के जुड़े होने की मान्यता है।

चांदमारी से शुरू होता है आयोजन, सभी समुदायों का सहयोग

सिहावा के दशहरे में केवल प्रतिमा का वध ही आकर्षण नहीं है यहां शीतला माता की आराधना के बाद पारंपरिक चांदमारी की रस्म भी निभाई जाती है इस परंपरा में सिहावा थाना प्रभारी को प्रतीकात्मक रूप से राजा माना जाता है और वे पीपल के पेड़ पर बंधे नारियल पर निशाना साधते हैं प्रतिमा बनाने के लिए गांव के घरों से मिट्टी लाई जाती है।स्थानीय कुम्हार पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं खास बात यह है कि आयोजन में अलग-अलग धर्म और समुदाय के लोग मिलकर सहयोग करते हैं, जिससे यह परंपरा सामाजिक एकता का प्रतीक भी बनी हुई है।

सदियों से कायम है अनोखी परंपरा

सिहावा का दशहरा अपनी अलग पहचान और धार्मिक मान्यताओं के चलते दूर-दूर तक प्रसिद्ध है यहां महिलाएं पारंपरिक आयोजन में शामिल नहीं होतीं वहीं, अन्य स्थानों की तरह रावण दहन के बाद सोनपत्ती बांटने के बजाय यहां प्रतिमा की मिट्टी का तिलक लगाकर विजय का उत्सव मनाया जाता है
सिहावा क्षेत्र की इस धार्मिक विरासत को देखने हर साल बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं बदलते समय के बीच भी सिहावा क्षेत्र के ग्रामीण अपनी पुरानी परंपरा को सहेजकर रखे हुए हैं यही वजह है कि यहां का दशहरा न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि धमतरी जिले की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान भी बन चुका है।

Deeksha Mishra
लेखक / पत्रकार:

Deeksha Mishra

विशेष संवाददाता (Special Correspondent)

वरिष्ठ न्यूज़ रिपोर्टर, The Rural Press

The Rural Press के लिए निष्पक्ष और निर्भीक रिपोर्टिंग।

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