Rural mothers providing fresh vegetables for school meals in Surguja Chhattisgarh
Rural mothers providing fresh vegetables for school meals in Surguja Chhattisgarh

Surguja News: सरगुजा में अदाणी फाउंडेशन की पहल और ग्रामीण माताओं की मदद से बच्चों के पोषण को मजबूत करने का स्थानीय मॉडल तैयार किया है। इस पहल के जरिए महिलाएं अपने खेतों में हरी और मौसमी सब्जियां उगाकर स्कूल की रसोई तक पहुंचा रही हैं। गांव की डेयरी समितियां दूध उपलब्ध करा रही हैं और स्थानीय महिलाएं स्कूल में बच्चों के लिए भोजन भी तैयार कर रही हैं। इससे 1000 से ज्यादा आदिवासी बच्चों को बेहतर पोषण मिल रहा है। साथ ही महिलाओं के लिए काम और आमदनी का रास्ता भी खुला है।

पहाड़ी रास्तों, जंगलों और दूर-दराज की बस्तियों वाले इन इलाकों में बच्चों तक पर्याप्त पोषण पहुंचाना आसान नहीं था। स्कूल में सुबह की प्रार्थना के दौरान रोजाना औसतन 15 से 20 बच्चों को कमजोरी और चक्कर आने की शिकायत होती थी। जांच में कई बच्चों का वजन सामान्य से कम मिला। बच्चों में सुस्ती, कम ऊर्जा और सहनशक्ति की कमी भी देखी गई।

थाली में खाना था, लेकिन पोषण की कमी थी

स्कूल के अध्ययन में सामने आया कि बच्चों के भोजन में कार्बोहाइड्रेट पर्याप्त था, लेकिन प्रोटीन, अमीनो एसिड और जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी थी। क्षेत्र में डेयरी पशुपालन सीमित है और ज्यादातर परिवार शाकाहारी भोजन करते हैं। ऐसे में स्कूल प्रबंधन और ग्रामीण महिलाओं ने स्थानीय खान-पान की आदतों को ध्यान में रखते हुए पोषण का मॉडल तैयार किया। इसमें बच्चों की माताओं को सबसे अहम जिम्मेदारी दी गई।

माताओं ने संभाली खेत से रसोई तक की कमान

महिलाएं अपने खेतों में हरी पत्तेदार और मौसमी सब्जियां उगाती हैं। ये सब्जियां सीधे स्कूल की रसोई तक पहुंचती हैं। गांव की महिला दुग्ध समितियां बच्चों के लिए दूध उपलब्ध कराती हैं। स्थानीय महिलाओं का दल स्कूल में भोजन तैयार करता है। इसमें स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की माताएं भी शामिल हैं। इससे भोजन की गुणवत्ता और साफ-सफाई पर निगरानी रहती है और बच्चों की जरूरत के मुताबिक भोजन तैयार किया जाता है। भोजन में हरी सब्जियों के अलावा दालें, अंकुरित अनाज, पोषणयुक्त दूध और मौसमी फल शामिल किए जाते हैं। बच्चों की शारीरिक सक्रियता के लिए सप्ताह में छह दिन व्यायाम भी कराया जाता है। स्कूल में सुबह का नाश्ता और दोपहर का संतुलित भोजन दिया जाता है।

पहले बच्चे थके लौटते थे, अब रहते हैं उत्साहित

महिला स्व-सहायता समूह की अध्यक्ष और स्कूल के एक विद्यार्थी की दादी अमिता सिंह के मुताबिक, पहले बच्चे स्कूल से लौटने के बाद थके और कमजोर नजर आते थे। इसके बाद माताओं ने तय किया कि वे अपने खेतों की सब्जियां स्कूल को देंगी और मिलकर बच्चों के लिए खाना तैयार करेंगी। अब सब्जियां उपलब्ध कराने और स्कूल की रसोई चलाने से महिलाओं को नियमित आमदनी भी मिल रही है। इससे वे अपने बच्चों की पढ़ाई में भी मदद कर पा रही हैं। स्कूल प्रबंधन के मुताबिक इस पहल के बाद बच्चों की उपस्थिति में सुधार हुआ है। उनके वजन, स्टैमिना और आत्मविश्वास में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। पहले कमजोरी के कारण बच्चे कक्षा में सुस्त दिखाई देते थे, अब पढ़ाई और स्कूल आने को लेकर उनका उत्साह बढ़ा है।

14 गांवों तक पहुंचा अदाणी फाउंडेशन का पोषण मॉडल

इस पहल से जुड़े 14 गांवों में घाटबर्रा में 310 परिवार और 1,395 लोग हैं, हरिहरपुर में 142 परिवार और 704 लोग, फत्तेपुर में 357 परिवार और 1,594 लोग, बासेन में 123 परिवार और 570 लोग, जनार्दनपुर में 105 परिवार और 423 लोग, तारा में 287 परिवार और 1,291 लोग, साल्ही में 433 परिवार और 2,236 लोग, चकेरी में 146 परिवार और 617 लोग, गुमगा में 328 परिवार और 1,533 लोग, परोगिया में 78 परिवार और 322 लोग, पारसा में 746 परिवार और 3,313 लोग, सैदू में 31 परिवार और 119 लोग, शिवनगर में 161 परिवार और 830 लोग तथा सुस्कम में 26 परिवार और 118 लोग हैं। इनमें प्रत्येक गांव के पुरुषों और महिलाओं की संख्या क्रमशः इस प्रकार है: घाटबर्रा 710/685, हरिहरपुर 320/384, फत्तेपुर 793/801, बासेन 304/266, जनार्दनपुर 218/205, तारा 641/650, साल्ही 1,148/1,088, चकेरी 348/269, गुमगा 765/768, परोगिया 155/167, पारसा 1,707/1,606, सैदू 65/54, शिवनगर 417/413 और सुस्कम 56/62।

एक थाली में साथ बैठ रहे 1000 से ज्यादा बच्चे

इस पहल की एक खास बात यह भी है कि 1000 से ज्यादा विद्यार्थी, शिक्षक और स्कूल स्टाफ एक साथ बैठकर भोजन करते हैं। इससे बच्चों में साथ बैठकर खाना खाने और एक-दूसरे के साथ घुलने-मिलने की भावना बढ़ रही है। स्कूल प्रबंधन का कहना है कि दूरदराज के इलाकों में बच्चों तक अच्छा पोषण पहुंचाना बड़ी चुनौती है। सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। बच्चों का स्वस्थ रहना भी उतना ही जरूरी है। स्थानीय माताओं की भागीदारी ने इस चुनौती से निपटने में मदद की है। यह मॉडल इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें खेत, डेयरी, महिला समूह और स्कूल की रसोई एक ही व्यवस्था का हिस्सा बन गए हैं। बच्चों की थाली में पोषण पहुंचाने के साथ महिलाओं के लिए रोजगार और आमदनी का रास्ता भी तैयार हुआ है।

रंजना वर्मा पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया से जुड़ी अनुभवी न्यूज राइटर हैं। उन्होंने देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर से मास्टर ऑफ मास कम्युनिकेशन की शिक्षा प्राप्त की है। रायपुर के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम करते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ और देश से जुड़े समसामयिक मुद्दों के साथ राजनीति, शिक्षा, सरकारी योजनाओं, कारोबार, तकनीक और लाइफस्टाइल जैसे विषयों पर लेखन किया है। समाचार लेखन के साथ SEO आधारित कंटेंट तैयार करने में भी उनकी अच्छी पकड़ है। सरल भाषा में तथ्यों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना और पाठकों तक विश्वसनीय जानकारी पहुंचाना उनकी लेखन शैली की प्रमुख विशेषता है।