Justice Krishna Ram Mohapatra: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को नया नेतृत्व मिल गया है। जस्टिस कृष्ण राम महापात्र ने चीफ जस्टिस के पद की शपथ लेकर न्यायिक क्षेत्र में अपने लंबे सफर का एक अहम पड़ाव पूरा किया है। कानून और न्यायपालिका से उनका रिश्ता केवल पेशेवर नहीं, बल्कि पारिवारिक भी रहा है। उनके पिता स्वर्गीय जस्टिस शरत चंद्र महापात्र स्वयं न्यायपालिका का हिस्सा रहे थे। ऐसे माहौल में पले-बढ़े कृष्ण राम महापात्र ने कानून को अपना पेशा बनाया और करीब चार दशक के सफर में वकील से हाईकोर्ट के जज और अब चीफ जस्टिस तक पहुंचे।
जस्टिस कृष्ण राम महापात्र का जन्म 18 अप्रैल 1965 को हुआ। उनके पिता स्वर्गीय जस्टिस शरत चंद्र महापात्र न्यायिक सेवा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके थे। ऐसे परिवार में बचपन से ही कानून, न्याय और अदालतों की कार्यप्रणाली का वातावरण उनके आसपास रहा। पिता की न्यायिक पृष्ठभूमि ने निश्चित तौर पर उनके व्यक्तित्व और पेशेवर सोच को प्रभावित किया। हालांकि, न्यायपालिका में अपनी पहचान बनाने के लिए उन्होंने खुद भी लंबे समय तक मेहनत की और वकालत से लेकर न्यायाधीश की कुर्सी तक का सफर तय किया।
कला की पढ़ाई के बाद चुना कानून का रास्ता
जस्टिस महापात्र ने कला विषय में स्नातक यानी B.A. की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने कानून की पढ़ाई की और LL.B. की डिग्री हासिल की। कानून की शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने न्यायिक क्षेत्र में अपने करियर की नींव रखी। उनका शुरुआती करियर वकालत से शुरू हुआ। 7 फरवरी 1988 को उन्होंने उड़ीसा स्टेट बार काउंसिल में एडवोकेट के रूप में अपना पंजीकरण कराया। यही वह समय था जब उनके लंबे कानूनी सफर की औपचारिक शुरुआत हुई।
26 साल तक अदालत में की वकालत
जस्टिस कृष्ण राम महापात्र ने करीब 26 वर्षों तक बार में प्रैक्टिस की। इस दौरान उन्होंने अलग-अलग तरह के कानूनी मामलों पर काम किया और अदालत की बारीकियों को करीब से समझा। सिविल और क्रिमिनल मामलों के साथ उन्होंने सर्विस और संवैधानिक कानून से जुड़े मामलों में भी पैरवी की। यही व्यापक अनुभव आगे चलकर उनके न्यायिक करियर की महत्वपूर्ण ताकत बना।
परिवार और बच्चों से जुड़े मामलों में भी अनुभव
उनकी कानूनी विशेषज्ञता केवल सामान्य मुकदमों तक सीमित नहीं रही। Guardians and Wards Act, Hindu Minority and Guardianship Act और Juvenile Justice Act जैसे कानूनों से जुड़े मामलों में भी उन्होंने काम किया। परिवार, अभिभावकत्व और बच्चों से जुड़े मामले बेहद संवेदनशील माने जाते हैं। ऐसे मामलों में काम करने के दौरान कानून के साथ मानवीय पहलुओं को समझना भी जरूरी होता है। वकालत के दौरान इस क्षेत्र का अनुभव उनके व्यापक कानूनी प्रोफाइल का हिस्सा बना।
सरकारी और बड़े संस्थानों का किया प्रतिनिधित्व
वकालत के लंबे दौर में जस्टिस महापात्र ने सरकारी और संस्थागत मामलों में भी अपनी भूमिका निभाई। वे राज्य सरकार के Additional Standing Counsel के रूप में काम कर चुके हैं। इसके अलावा उड़ीसा लोक सेवा आयोग यानी OPSC के मामलों में भी उन्होंने कानूनी प्रतिनिधित्व किया। बैंक ऑफ बड़ौदा, नीलाचल इस्पात निगम लिमिटेड और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग (NIOS) जैसे संस्थानों से जुड़े मामलों में भी उन्होंने पैरवी की। इस अनुभव ने उन्हें केवल व्यक्तिगत मुकदमों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक निकायों से जुड़े जटिल कानूनी मामलों की समझ भी दी।
वकील से जज बनने का बड़ा पड़ाव
लंबे समय तक वकालत करने के बाद 17 अप्रैल 2015 को जस्टिस कृष्ण राम महापात्र को उड़ीसा हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया। यह उनके करियर का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। बार में करीब ढाई दशक से अधिक समय तक अदालत में पक्ष रखने के बाद अब उनकी भूमिका बदल चुकी थी। वकील के तौर पर जहां वे अपने पक्षकार के मामले को अदालत के सामने रखते थे, वहीं न्यायाधीश के रूप में उन्हें दोनों पक्षों की दलीलों को सुनकर कानून के आधार पर निर्णय देने की जिम्मेदारी मिली।
उड़ीसा हाईकोर्ट में मिला व्यापक न्यायिक अनुभव
उड़ीसा हाईकोर्ट में न्यायाधीश के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने विभिन्न प्रकार के मामलों की सुनवाई की। संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मामलों के साथ-साथ अन्य महत्वपूर्ण कानूनी विषय उनके न्यायिक कार्यक्षेत्र का हिस्सा रहे। बार में लंबे अनुभव और न्यायाधीश के रूप में प्राप्त अनुभव ने उनके न्यायिक दृष्टिकोण को व्यापक बनाया। इसी लंबे अनुभव के बाद उन्हें अब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
अब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की कमान
जस्टिस कृष्ण राम महापात्र ने अब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के रूप में नई जिम्मेदारी संभाली है। लोकभवन में आयोजित समारोह में राज्यपाल रमेन डेका ने उन्हें शपथ दिलाई।
चार दशक का सफर और नई जिम्मेदारी
जस्टिस कृष्ण राम महापात्र का सफर एक ऐसे कानूनविद की कहानी है, जिसने न्यायपालिका को करीब से समझने के लिए पहले वकालत की लंबी पारी खेली, फिर हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में जिम्मेदारी संभाली और अब मुख्य न्यायाधीश के पद तक पहुंचे हैं। 1988 में बार काउंसिल में एडवोकेट के रूप में शुरुआत से लेकर 2015 में हाईकोर्ट जज बनने और अब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की जिम्मेदारी संभालने तक उनका सफर करीब चार दशकों में फैला है। न्यायिक परिवार की विरासत और अपने लंबे कानूनी अनुभव के साथ अब उनकी नई पारी छत्तीसगढ़ में शुरू हुई है।


