Wednesday, December 1, 2021
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Covid-19 2nd Wave: आखिर क्यों हुई 3 लाख से अधिक मौतें? साइंटिस्‍ट्स ने बताई बड़ी वजह

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टीआरपी डेस्क। कोविड-19 की दूसरी लहर के चलते मौत का आंकड़ा साढ़े तीन लाख के करीब पहुंच गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, दूसरी लहर के पीछे सबसे बड़ा कारण वायरस का डेल्‍टा वेरिएंट (B.1.617) है। इस वेरिएंट और इसके सब-लीनिएज (B.1.617.2) के चलते ही दूसरी लहर में रोज तीन-तीन लाख से ज्‍यादा मामले दर्ज किए गए। डेल्‍टा वेरिएंट अपने से पहले मिले अल्‍फा वेरिएंट (B.1.1.7) से 50% ज्‍यादा संक्रामक है।

यह रिसर्च नैशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (NCDC) और INSACOG (भारत में जीनोम सीक्‍वेंसिंग करने वाली लैब्‍स का संघ) के वैज्ञानिकों ने की। पता चला कि यूके में मिले अल्‍फा वेरिएंट के मुकाबले डेल्‍टा वेरिएंट 50% ज्‍यादा तेजी से फैलता है।

पॉजिटिविटी रेट के साथ बढ़ने लगा B.1.617.2

डेल्‍टा वेरिएंट के सब-लीनिएज B.1.617.2 में E484Q म्‍यूटेशन नहीं था मगर T478K आ गया। सैम्‍पल्‍स में इसकी मात्रा सबसे ज्‍यादा पाई गई है। जैसे-जैसे पॉजिटिविटी रेट बढ़ा, वैसे-वैसे इसका प्रतिशत भी बढ़ता चला गया। स्‍टडी में यह कहा गया है कि अल्‍फा वेरिएंट का केस फैटिलिटी रेशियो (CFR) डेल्‍टा के मुकाबले ज्‍यादा था। हालांकि स्‍टडी कहती है कि अभी CFR में बदलाव के B.1.617.2 से सीधे कनेक्‍शन के सबूत नहीं मिले हैं।

डेल्‍टा वेरिएंट सभी राज्‍यों में मिला है मगर इसने सबसे ज्‍यादा दिल्‍ली, आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्‍ट्र, तेलंगाना और ओडिशा में लोगों को संक्रमित किया। यही राज्‍य कोविड-19 की दूसरी लहर में सबसे ज्‍यादा प्रभावित हुए। ब्रेकथ्रू इन्‍फेक्‍शंस यानी वैक्‍सीनेशन के बाद होने वाले इन्‍फेक्‍शन में भी इसकी बड़ी भूमिका रही है।

भारत में ही मिला था यह वेरिएंट, अब दुनियाभर में फैला

B.1.617 का पहला केस पिछले साल अक्‍टूबर में महाराष्‍ट्र से आया था। इसे ‘डबल म्‍यूटेशन’ वेरिएंट कहा गया। ‘डबल म्‍यूटेशन’ का मतलब वायरस के स्‍पाइक प्रोटीन में आए दो बदलावों E484Q और L452R से है। मगर इस वेरिएंट के सब-लीनिएज B.1.617.2 में E484Q म्‍यूटेशन नहीं है। अबतक यह वेरिएंट दुनिया के 60 से ज्‍यादा देशों में फैल चुका है।

WHO की शुरुआती जांच के अनुसार, B.1.617.1 और B.1.617.2 भारत में फैल रहे अन्‍य वेरिएंट्स से कहीं ज्‍यादा तेजी से फैलते हैं। इन वेरिएंट्स के खिलाफ वैक्‍सीन के असर को लेकर भी WHO की ओर से कुछ नहीं कहा गया है।

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