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Nobel Peace Prize Controversy : ट्रंप फिर खाली हाथ, नोबेल शांति पुरस्कार पर क्यों उठे सवाल, जानें ओबामा से आंग सान सू ची तक विवादों की कहानी

Nobel Peace Prize Controversy History: नोबेल शांति पुरस्कार 2026 के विजेता का ऐलान हो गया है। भारतीय मूल की दक्षिण अफ्रीकी न्यायविद और संयुक्त राष्ट्र की पूर्व मानवाधिकार प्रमुख नावनेथम ‘नावी’ पिल्लई को इस साल का प्रतिष्ठित सम्मान देने की घोषणा की गई है। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर यह पुरस्कार हासिल […]

Nobel Peace Prize Controversy : ट्रंप फिर खाली हाथ, नोबेल शांति पुरस्कार पर क्यों उठे सवाल, जानें ओबामा से आंग सान सू ची तक विवादों की कहानी
तस्वीर: The Rural Press फाइल / सौजन्य

Nobel Peace Prize Controversy History: नोबेल शांति पुरस्कार 2026 के विजेता का ऐलान हो गया है। भारतीय मूल की दक्षिण अफ्रीकी न्यायविद और संयुक्त राष्ट्र की पूर्व मानवाधिकार प्रमुख नावनेथम ‘नावी’ पिल्लई को इस साल का प्रतिष्ठित सम्मान देने की घोषणा की गई है। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर यह पुरस्कार हासिल नहीं कर सके।

हालांकि, नोबेल शांति पुरस्कार का इतिहास सिर्फ सम्मान और उपलब्धियों की कहानियों तक सीमित नहीं है। बराक ओबामा, यासिर अराफात, हेनरी किसिंजर, आंग सान सू ची और अबी अहमद जैसे विजेताओं के चयन पर भी सवाल उठ चुके हैं। आखिर शांति के नाम पर दिए जाने वाले इस सम्मान को लेकर विवाद क्यों होता है? आइए, जानते हैं।

दुनिया में शांति कायम करना जितना मुश्किल है, शांति के लिए किसी व्यक्ति को सम्मानित करने का फैसला भी उतना ही चुनौतीपूर्ण हो सकता है। किसी नेता का एक कदम बातचीत और सुलह की उम्मीद जगाता है, तो उसके दूसरे फैसले विवादों में घिर सकते हैं। यही वजह है कि दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में शामिल नोबेल शांति पुरस्कार के कई फैसले आलोचना का विषय बने हैं।

कभी किसी नेता को उसकी संभावित उपलब्धियों के लिए सम्मानित करने पर सवाल उठे, तो कभी पुरस्कार पाने वाले व्यक्ति की नीतियों और बाद के कामों ने उसकी उपलब्धि पर बहस छेड़ दी। बराक ओबामा को राष्ट्रपति बनने के कुछ ही महीनों बाद पुरस्कार देना हो या अबी अहमद को सम्मान मिलने के बाद इथियोपिया में संघर्ष का शुरू होना, इन मामलों ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है—क्या शांति की कोशिशों को प्रोत्साहित करना ज्यादा जरूरी है या ठोस नतीजों का इंतजार करना?

बराक ओबामा: उपलब्धियों से पहले ही मिल गया सम्मान?

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा को 2009 में नोबेल शांति पुरस्कार देने का फैसला दुनिया के सबसे चर्चित विवादों में शामिल है। राष्ट्रपति पद संभालने के कुछ ही महीनों बाद उन्हें यह सम्मान मिला था। नोबेल समिति ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को मजबूत करने और देशों के बीच सहयोग बढ़ाने के उनके प्रयासों को इसकी वजह बताया।

लेकिन, आलोचकों को यह फैसला जल्दबाजी भरा लगा। उनका तर्क था कि ओबामा को शांति के क्षेत्र में ठोस उपलब्धियां हासिल करने से पहले ही सम्मानित कर दिया गया। दरअसल, पुरस्कार के लिए नामांकन की समय-सीमा उनके राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के लगभग 12 दिन बाद ही समाप्त हो गई थी।

ओबामा ने भी पुरस्कार मिलने पर हैरानी जताई थी। बाद में अफगानिस्तान में अमेरिकी सैन्य अभियान और दूसरे अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में अमेरिका की भूमिका को लेकर उनकी विदेश नीति की आलोचना होती रही।

उनके समर्थकों का मानना था कि यह पुरस्कार दुनिया में कूटनीति, संवाद और सहयोग को बढ़ावा देने की उम्मीदों का प्रतीक था। वहीं, आलोचकों ने सवाल उठाया कि क्या भविष्य में किए जाने वाले कामों की उम्मीद के आधार पर इतना बड़ा सम्मान दिया जाना चाहिए।

यासिर अराफात: शांति वार्ता के नायक या विवादित नेता?

फिलिस्तीनी नेता यासिर अराफात को 1994 में इजराइल के प्रधानमंत्री यित्ज़ाक राबिन और विदेश मंत्री शिमोन पेरेस के साथ संयुक्त रूप से नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया था। तीनों नेताओं को इजराइल और फिलिस्तीन के बीच शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने और ओस्लो समझौते से जुड़ी कोशिशों के लिए सम्मानित किया गया।

हालांकि, अराफात का अतीत विवादों से घिरा रहा था। फिलिस्तीनी आंदोलन के नेतृत्व और सशस्त्र संघर्ष से उनके जुड़ाव के कारण आलोचकों ने सवाल उठाया कि क्या उन्हें शांति का सर्वोच्च सम्मान दिया जाना चाहिए।

यह फैसला नोबेल समिति के भीतर भी मतभेद की वजह बना। समिति के सदस्य कारे क्रिस्टियानसन ने अराफात को पुरस्कार देने के विरोध में इस्तीफा दे दिया था।

इस विवाद ने शांति पुरस्कार के सामने एक मुश्किल सवाल रखा: क्या किसी नेता की शांति वार्ता में भूमिका को उसके पुराने संघर्षों से अलग करके देखा जा सकता है? या सम्मान देने से पहले उसके पूरे राजनीतिक इतिहास का आकलन जरूरी है?

हेनरी किसिंजर: युद्धविराम के प्रयासों के बीच विवाद

1973 में अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर और उत्तर वियतनामी नेता ले डक थो को वियतनाम युद्ध में युद्धविराम की दिशा में किए गए प्रयासों के लिए नोबेल शांति पुरस्कार देने की घोषणा की गई थी। लेकिन यह फैसला विवादों में घिर गया।

किसिंजर की भूमिका को लेकर आलोचकों ने वियतनाम युद्ध और कंबोडिया में अमेरिकी बमबारी का मुद्दा उठाया। दक्षिण अमेरिका की सैन्य सरकारों के प्रति अमेरिकी नीतियों को लेकर भी उनकी आलोचना हुई।

विवाद इतना बढ़ा कि नोबेल समिति के दो सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया। ले डक थो ने यह कहते हुए पुरस्कार स्वीकार नहीं किया कि वियतनाम में वास्तविक शांति अभी स्थापित नहीं हुई थी।

इस प्रकरण ने पुरस्कार की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए। आलोचकों का तर्क था कि किसी युद्ध में संघर्षविराम की कोशिश करना महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे उस व्यक्ति की दूसरी नीतियों और फैसलों से जुड़े सवाल अपने आप खत्म नहीं हो जाते।

आंग सान सू ची: लोकतंत्र की लड़ाई से रोहिंग्या संकट तक

म्यांमार की नेता आंग सान सू ची को 1991 में लोकतंत्र की बहाली के लिए किए गए अहिंसक संघर्ष के वास्ते नोबेल शांति पुरस्कार मिला था। सैन्य शासन के खिलाफ आंदोलन और लंबे समय तक नजरबंदी के कारण वह दुनियाभर में लोकतांत्रिक अधिकारों की प्रमुख आवाज बन गई थीं।

लेकिन बाद के वर्षों में उनकी छवि को बड़ा झटका लगा। म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघनों के मामलों में उनकी भूमिका की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हुई।

आलोचकों का आरोप था कि उन्होंने रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ हुई हिंसा की पर्याप्त निंदा नहीं की। 2019 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में म्यांमार की सरकार और सेना के पक्ष में उनके रुख ने भी विवाद को बढ़ाया। इसके बाद कई लोगों और संगठनों ने उनसे पुरस्कार वापस लेने की मांग की।

हालांकि, नोबेल शांति पुरस्कार एक बार दिए जाने के बाद वापस नहीं लिया जाता। यह मामला इस बात का उदाहरण बना कि किसी व्यक्ति के पुराने योगदान और उसके बाद के आचरण के बीच अंतर होने पर भी पुरस्कार को लेकर सवाल उठते रह सकते हैं।

अबी अहमद: शांति समझौते के बाद इथियोपिया में युद्ध

इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद को 2019 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्हें पड़ोसी देश इरीट्रिया के साथ लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष को समाप्त करने और दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने के प्रयासों के लिए चुना गया।

उनकी पहल से पूर्वी अफ्रीका में शांति की नई उम्मीद जगी थी। लेकिन 2020 में इथियोपिया के टिगरे क्षेत्र में संघर्ष शुरू होने के बाद उनके पुरस्कार पर सवाल उठने लगे।

इस संघर्ष के दौरान बड़े पैमाने पर लोगों को विस्थापन, भोजन और दवाओं की कमी तथा हिंसा का सामना करना पड़ा। अबी अहमद की सरकार की सैन्य कार्रवाई को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हुई।

आलोचकों ने कहा कि पुरस्कार देते समय शांति की संभावनाओं को वास्तविक और स्थायी सफलता मान लेने में जल्दबाजी की गई। उनके समर्थकों की शुरुआती उम्मीदों और बाद में सामने आई परिस्थितियों के बीच बड़ा अंतर दिखाई दिया।

वंगारी मथाई: पर्यावरण संरक्षण के योगदान के बीच बयान पर विवाद

केन्या की पर्यावरण कार्यकर्ता वंगारी मथाई को 2004 में नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया था। वह यह सम्मान पाने वाली पहली अफ्रीकी महिला थीं। उन्हें पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास, लोकतंत्र और शांति के बीच संबंधों को मजबूत करने के लिए सम्मानित किया गया।

उनके नेतृत्व में ग्रीन बेल्ट मूवमेंट ने पेड़ लगाने और स्थानीय समुदायों को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने का काम किया। हालांकि, एचआईवी और एड्स के वायरस को लेकर उनसे जुड़ा एक विवादित दावा भी चर्चा में आया। उन्होंने कथित तौर पर वायरस को जैविक हथियार के रूप में बनाए जाने की बात कही थी, जिसके समर्थन में वैज्ञानिक प्रमाण नहीं थे।

यह विवाद उनके पर्यावरण संरक्षण के काम से अलग था, लेकिन इसने सार्वजनिक हस्तियों के बयानों और उनकी विश्वसनीयता को लेकर बहस जरूर छेड़ी। इस मामले को बाकी विवादों से अलग समझना जरूरी है, क्योंकि यहां मुख्य सवाल उनके शांति प्रयासों के बजाय एक वैज्ञानिक दावे को लेकर था।

The Rural Press ब्यूरो
लेखक / पत्रकार:

The Rural Press ब्यूरो

सम्पादकीय डेस्क (The Rural Press Editorial Team)

द रूरल प्रेस केंद्रीय सम्पादकीय मंडल एवं राज्य ब्यूरो नेटवर्क

The Rural Press की विशेष सम्पादकीय एवं ग्रामीण खोजी पत्रकारिता टीम। जमीनी मुद्दों, कृषि संकट और निष्पक्ष जनसरोकार की विश्वसनीय रिपोर्टिंग।

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