Madras High Court House Husband Remark: मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने डॉक्टर दंपति के वैवाहिक विवाद पर फैसला सुनाते हुए घरेलू जिम्मेदारियों और पति-पत्नी की भूमिकाओं को लेकर अहम टिप्पणी की है। जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस एमडी सुमति की पीठ ने कहा कि अगर हाउस वाइफ हो सकती है तो हाउस हसबैंड भी हो सकता है।
अदालत ने कहा कि घर संभालने और कमाई करने की जिम्मेदारी, दोनों का समान सम्मान होना चाहिए। इसी मामले में पति-पत्नी की सहमति के आधार पर हाई कोर्ट ने विवाह समाप्त करने का आदेश दिया।
क्या था डॉक्टर दंपति का मामला?
मामला तिरुवन्नामलाई के एक डॉक्टर दंपति से जुड़ा है। दोनों पुडुचेरी के श्री वेंकटेश्वर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में काम करते थे और वर्ष 2011 में उनकी शादी हुई थी। वर्ष 2012 में उनका पहला बच्चा हुआ। इसके बाद पत्नी बच्चे की देखभाल के लिए अपने माता-पिता के साथ रहने लगीं, जबकि पति ने कार्डियोलॉजी में उच्च शिक्षा जारी रखी। वर्ष 2016 में दोनों के दूसरे बच्चे का जन्म हुआ। कोविड महामारी के बाद वर्ष 2020 में दोनों फिर साथ रहने लगे। हालांकि, इसके बाद उनके बीच मतभेद बढ़ गए। पत्नी ने वैवाहिक साथ बहाल करने के लिए फैमिली कोर्ट का रुख किया, जबकि पति ने तलाक की मांग की। फैमिली कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद दोनों ने हाई कोर्ट में अलग-अलग अपील दायर की।
होममेकर सिर्फ महिलाओं तक सीमित नहीं
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने घरेलू काम और परिवार की जिम्मेदारी को लेकर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि परिवार में कमाई करने और घर संभालने की जिम्मेदारी दोनों ही महत्वपूर्ण हैं और दोनों को समान सम्मान मिलना चाहिए। पीठ ने ‘होममेकर’ शब्द को जेंडर-न्यूट्रल बताते हुए कहा कि अगर महिला घर संभाल सकती है तो पुरुष भी यह भूमिका निभा सकता है। अदालत के मुताबिक, ऐसी व्यवस्था सामान्य हो तो परिवार और वैवाहिक जीवन को मजबूती मिल सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि घरेलू काम का कोई सीधा वेतन नहीं होता, लेकिन इसका आर्थिक महत्व है। पीठ ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें घरेलू काम को आर्थिक मूल्य वाला माना गया है।
पत्नी ने परिवार के लिए करियर पीछे रखा
मामले की परिस्थितियों पर चर्चा करते हुए अदालत ने गौर किया कि जब पति अपनी उच्च चिकित्सा शिक्षा और करियर पर ध्यान दे रहे थे, तब पत्नी ने बच्चों और घर की जिम्मेदारी संभाली। इसी वजह से उनकी अपनी पेशेवर गतिविधियां सीमित रहीं। पीठ ने पति-पत्नी के बीच घरेलू जिम्मेदारियों के बंटवारे को लेकर भी बात रखी। अदालत ने कहा कि परिवार में कमाई और घर की देखभाल, दोनों भूमिकाएं जरूरी हैं।
2.5 करोड़ रुपये के सेटलमेंट पर तलाक
सुनवाई के दौरान पति ने पत्नी और दोनों बच्चों के हित को देखते हुए कुल 2.5 करोड़ रुपये देने पर सहमति जताई। पत्नी ने भी इस व्यवस्था को स्वीकार किया। इसके बाद हाई कोर्ट ने दोनों की आपसी सहमति से तलाक मंजूर कर दिया। अदालत ने पति को पत्नी के बैंक खाते में 1.5 करोड़ रुपये तीन महीने के भीतर जमा करने का निर्देश दिया। इसके अलावा दोनों बच्चों के नाम एक साल के भीतर 50-50 लाख रुपये की एफडी कराने को कहा गया। इस तरह पत्नी के लिए 1.5 करोड़ और दोनों बच्चों के लिए कुल 1 करोड़ रुपये तय किए गए। तलाक का आदेश इन वित्तीय जिम्मेदारियों को पूरा करने से जुड़ा है।



