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High Court On Compassionate Appointment: बहू सास को देगी 25 प्रतिशत सैलरी, जानिए हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

High Court On Compassionate Appointment: राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने अनुकंपा नियुक्ति और परिवार के भरण-पोषण के दायित्व को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत बहु को 25 प्रतिशत की सैलरी सास के भरण पोषण के लिए देने का फैसला सुनाया है। दरअसल, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति की मृत्यु के बाद […]

Rajasthan High Court building view representing legal judgment on compassionate appointment and maintenance.
तस्वीर: The Rural Press फाइल / सौजन्य

High Court On Compassionate Appointment: राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने अनुकंपा नियुक्ति और परिवार के भरण-पोषण के दायित्व को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत बहु को 25 प्रतिशत की सैलरी सास के भरण पोषण के लिए देने का फैसला सुनाया है।

दरअसल, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति की मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति पाने वाली बहू दूसरी शादी कर ले और ससुराल से नाता तोड़ ले, तब भी वह अपनी आश्रित सास का भरण पोषण करेगी। वह भरण-पोषण के कानूनी और नैतिक दायित्व से मुक्त नहीं हो सकती। जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (AVVNL) को आदेश दिए हैं कि बहू के मासिक वेतन से 25 प्रतिशत राशि काटकर सीधे सास के बैंक खाते में जमा कराई जाए।

2018 से चल रहा था कानूनी विवाद

यह पूरा मामला साल 2017 का है। अजमेर विद्युत वितरण निगम में टेक्निकल हेल्पर के पद पर कार्यरत एक कर्मचारी का निधन हो गया था। बेटे की मौत के बाद सास-ससुर ने अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) दिया था, जिसके आधार पर बहू को अनुकंपा नौकरी मिली थी। नियुक्ति के वक्त बहू ने एक शपथ पत्र दिया था कि वह दिवंगत कर्मचारी के परिवार का भरण-पोषण करेगी। हालांकि, नौकरी मिलने के कुछ समय बाद बहू ने ससुराल छोड़ दिया, दूसरी शादी कर ली और सास-ससुर की देखभाल बंद कर दी। इसके बाद साल 2018 में सास-ससुर ने न्याय के लिए अदालत का रुख किया। हालांकि, कानूनी लड़ाई के दौरान ही ससुर का निधन हो गया था।

‘अनुकंपा नियुक्ति कोई निजी विशेषाधिकार नहीं’

सुनवाई के दौरान बहू की ओर से दलील दी गई थी कि सास का भरण-पोषण उनके अन्य दो बेटे भी कर सकते हैं और यह वेतन उनका व्यक्तिगत अधिकार है। अदालत ने इन तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता के वकील की दलीलों को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति कोई निजी विशेषाधिकार या संपत्ति नहीं है, बल्कि यह एक कल्याणकारी उपाय है। कोर्ट ने साफ किया कि परिवार के भरण-पोषण का शपथ पत्र ही इस नौकरी का आधार था। ऐसे में इस दायित्व से पीछे हटना अनुकंपा योजना की मूल भावना के खिलाफ है।

टर्मिनल बेनिफिट्स का भी होगा बराबर बंटवारा


हाईकोर्ट ने AVVNL प्रबंधन को निर्देश दिए हैं कि बहू के वेतन से 25 फीसदी की कटौती कर सास के खाते में भेजने की व्यवस्था सास के जीवनकाल तक जारी रहे। इसके अलावा, अदालत ने दिवंगत कर्मचारी के सभी सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) और अन्य बकाया लाभ को 30 दिनों के भीतर जारी करने का आदेश दिया है। इन सभी फंड्स को सास और बहू के बीच बराबर-बराबर बांटा जाएगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)


1- राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में क्या मुख्य निर्देश दिया है?
अदालत ने अजमेर विद्युत वितरण निगम को आदेश दिया है कि अनुकंपा नौकरी पाने वाली बहू के मासिक वेतन से 25 प्रतिशत राशि काटकर सीधे उसकी सास के बैंक खाते में जमा कराई जाए।

2- यह कानूनी विवाद कब शुरू हुआ था?
यह कानूनी विवाद वर्ष 2018 में शुरू हुआ था, जब दिवंगत कर्मचारी के माता-पिता ने बहू द्वारा भरण-पोषण से इनकार करने के बाद याचिका दायर की थी।

3- क्या अनुकंपा नियुक्ति पाने वाली बहू दूसरी शादी कर सकती है?
कानूनन दूसरी शादी पर रोक नहीं है, लेकिन हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि नौकरी परिवार के भरण-पोषण के शपथ पत्र पर मिली है, तो वह अपने आश्रित सास-ससुर के देखभाल के दायित्व से मुक्त नहीं हो सकती।

4- फैसले में टर्मिनल बेनिफिट्स को लेकर क्या कहा गया है?
अदालत ने निर्देश दिए हैं कि दिवंगत कर्मचारी के सभी सेवानिवृत्ति और अन्य बकाया लाभ 30 दिनों के भीतर जारी किए जाएं और उन्हें सास व बहू के बीच बराबर बांटा जाए।

5- यह मामला किस विभाग से जुड़ा है?
यह मामला अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (AVVNL) से जुड़ा है।

Vikas Soni
लेखक / पत्रकार:

Vikas Soni

विशेष संवाददाता (Special Correspondent)

वरिष्ठ न्यूज़ रिपोर्टर, The Rural Press

The Rural Press के लिए निष्पक्ष और निर्भीक रिपोर्टिंग।

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