Opposition preparing to remove Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar amidst the controversy.
Amid the ongoing controversy, the demand to remove CEC Gyanesh Kumar has come up for discussion again.

SIR Controversy: SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) को लेकर उपजे विवाद के बाद अब चर्चाएं CEC (मुख्य चुनाव आयुक्त) ज्ञानेश कुमार को हटाने की हो रही है। लेकिन संवैधानिक रूप से इन्हें हटाना इतना आसान नहीं होगा। विपक्ष को महाभियोग लाना होगा और संसद में दो तिहाई बहुमत से इसे पास भी कराना होगा, जो कि तर्क संगत नहीं दिखता। इसी बीच 2 अक्टूबर से CJP (कॉकरोच जनता पार्टी) ने आंदोलन की चेतावनी भी दे दी है।

दरअसल, संवैधानिक नियमानुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संसद में महाभियोग प्रस्तुत करना होगा। महाभियोग के लिए भी लोकसभा में कम से कम 100, जबकि राज्यसभा में 50 सांसदों का समर्थन जरूरी है। यानी कि सदन की कुल सदस्यता का एक चौथाई (1/4) सदस्यों के हस्ताक्षर वाला नोटिस होना चाहिए। वहीं, प्रस्ताव पास कराने के लिए संसद में उपस्थित सभी सांसदों की दो तिहाई सहमति भी जरूरी है। यानी कि सीधे तौर पर CEC को हटाने के लिए संसद में दोनों सदनों की सहमति जरूरी है। वहीं, आंकड़ों के अनुसार लोकसभा और राज्यसभा मिलाकर दोनों ही सदनों में दो तिहाई वोट के लिए लगभग 524 सांसदों का समर्थन जरूरी है। लेकिन पहले ही NDA सरकार परिसीमन सहित अन्य बिलों में बहुमत के इस जादुई आंकड़े से दूर रह चुकी है। वहीं विपक्ष के पास अभी सिर्फ 290 सांसदों का ही समर्थन दिख रहा है।

महाभियोग लाने 150 हस्ताक्षर जरूरी

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए दोनों सदनों के सदस्यों को कदाचार या अक्षमता के आरोप के साथ प्रस्ताव लाना होगा। जिसे महाभियोग प्रस्ताव कहा जाता है। महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार किए जाने के लिए, लोकसभा में कम से कम 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर होने चाहिए। यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो आरोपों की सच्चाई की जांच की जाती है।

राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद होगा पास

मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत के बाद राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का आदेश देते हैं। वहीं, इस मामले में संवैधानिक जरूरतें पूरी होने के बाद राष्ट्रपति के पास कोई विकल्प नहीं बचता और संसद की ही सलाह उन्हें माननी होती है और अंतत: इसे मंजूरी देनी ही होती है।

ऐसे समझें, दो तिहाई बहुमता का पूरा गणित

  • 543 लोकसभा की सीटें
  • 245 राज्यसभा की सीटें
  • 788 सीटें दोनों सदनों में
  • 524 सांसदों का समर्थन जरुरी

विपक्ष के पास सिर्फ 290 सांसदों का समर्थन

वर्तमान में विपक्ष अपने दम पर दो तिहाई बहुमत के जादुई आंकड़े को पाता नहीं दिख रहा है। वर्तमान में संसद के दोनों सदनों में मिलाकर विपक्ष के पास सिर्फ 290 सांसद ही हैं। जिसमें लोकसभा में इंडी ब्लॉक सहित सभी विपक्षी सांसदों की संख्या 234 है, जबकि राज्यसभा यानी कि उच्च सदन में लगभग 60 से 65 सांसद हैं। ऐसे में 524 के जादुई आंकड़े तक पहुंचने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना होगा।

ऐसे गिरा था महिला आरक्षण बिल

महिलाओं के आरक्षण से संबंधित बिल से दो तिहाई बहुमत के चक्कर में ही गिरा था। संविधान के 131वें संशोधन बिल में संसद की 543 सीटें बढ़ाकर 850 करने का प्रावधान वर्तमान सरकार NDA ने किया था। लेकिन लोकसभा में बिल के समर्थन में उपस्थित 528 सांसदों ने वोट डाले, पक्ष में 298, जबकि विपक्ष में 230 वोट पड़े।

अप्रैल में भी खारिज हुआ था प्रस्ताव

राज्यसभा के चेयरमैन और लोकसभा के स्पीकर ने पहले भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। इसी साल 12 मार्च को ममता बनर्जी ने लोकसभा और राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव पेश किया था। इस प्रस्ताव पर 130 सांसदों और राज्यसभा वाले प्रस्ताव पर 63 सांसदों के हस्ताक्षर थे। उस दौरान CEC पर पक्षपाती और भेदभावपूर्ण व्यवहार का आरोप लगाया गया था।