जालंधर। दृढ़ इच्छाशक्ति, कड़ी मेहनत और नेक इरादे हों तो कुछ भी असंभव नहीं हो सकता। आज हम आपको बताने जा रहे हैं एक ऐसे दिव्यांग शख्श की दास्तां जो पैदा हुए तो डॉक्टर के मुंह से निकल पड़ा कि अफसोस यह कुछ नहीं कर सकता। यह तो शारीरिक और मानसिक तौर पर दिव्यांग है। आज वही विवेक जोशी समाज के लिए प्रेरणास्नोत बनकर उभरे हैं। वह दूसरों का जीवन संवार रहे हैं।

पंजाब के जालंधर में रामा मंडी के बसंत हिल्स निवासी विवेक जोशी बताते हैं कि उनका संघर्ष जन्म लेते ही शुरू हो गया था। शुरुआत में मैं न बोल पाता था और न लिख और पढ़ पाता था। लोग दया भरी निगाहों से देखते, लेकिन ऐसी कठिन परिस्थिति में परिवार का साथ मिला। पढ़ाई का शौक था। जिद की तो पिता ने स्कूल में दाखिला करा दिया।

विवेक ने सोचा कि दसवीं कर लेगा तो कहीं नौकरी मिल जाएगी और मन लगा रहेगा। दसवीं के बाद उन्होंने तय किया कि अभी पढ़ना है। फिर जो सिलसिला शुरू हुआ तो बारहवीं, बीए, एलएलबी, एलएलएम, एमबीए व एमएसडब्ल्यू के बाद अब तक नहीं थमा। फिलहाल विवेक डिसेबिलिटी मैनेजमेंट पर पीएचडी कर रहे हैं.

See also  VRFB : अब बैटरी से मिलेगी बिजली, 20 साल तक नहीं होगी खराब

माता-पिता पढ़कर सुनाते तो करते थे याद

विवेक बताते है, ‘बीए तक तो मैं पढ़-लिख नहीं पाता था। माता-पिता पढ़कर सुनाते, मैं उसे याद करता और परीक्षा में जो सहायक मिलता, उससे लिखवाता। इसी बीच 2014 में माधव सेवा सोसायटी बनाई। फिर जरूरतमंद व इच्छुक बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। मेरी कक्षा में दिव्यांग व सामान्य सब एक साथ बैठते हैं। यहां लगभग 400 बच्चे पढ़ चुके हैं।

विवेक बताते हैं कि नौकरी न मिलने से कुंठाग्रस्त तीन युवक मिले। काउंसिलिंग की तो वे कनाडा चले गए। एक लड़की रिजल्ट से इतनी डरी थी कि बारहवीं की परीक्षा ही नहीं देना चाहती थी। उसे समझाया और पढ़ाया। आखिर वह 86 फीसद अंकों के साथ उत्तीर्ण हुई। एलएलबी और एलएलएम के बाद जरूरतमंदों और दिव्यांगों के केस मुफ्त लड़ते हैं। कभी दिव्यांगों की सुविधाओं की बात आई, तो आरटीआइ से सरकार व अफसरों का पीछा करते रहे।

अध्यापक बनना ही पसंद

विवेक कहते हैं कि मुझे अध्यापक बनना ही पसंद है। कम से कम अगली पीढ़ी को कुछ दे तो सकते हैं। जब अब्दुल कलाम राष्ट्रपति थे, तब हैदराबाद में सेरेब्रल पाल्सी पर इंटरनेशनल कांफ्रेंस में उनसे मिले। उन्हें पता चला कि एलएलएम कर रखी है तो उन्होंने सिर पर हाथ रख बधाई दी और कहा कि अपने ज्ञान को पूरी दुनिया में फैलाओ। उन्होंने विवेक की किताब लफ्ज-लफ्ज मासूम रिलीज की थी।

See also  अमित की बिगड़ती तबियत को लेकर चिंता में ऋचा जोगी, लगाई ये गुहार लेकिन कोई नहीं सुन रहा पुकार

नाउम्मीदी को जिंदगी की डिक्शनरी से निकाल दो

विवेक कहते हैं कि पहले खुद के लिए संघर्ष किया, अब दूसरों के लिए कर रहा हूं। दो बातें ध्यान रहें। मां-बाप को भगवान समझो। नाउम्मीदी को जिंदगी की डिक्शनरी से निकाल दो। जुगनू भी अंधेरे को चुनौती देता है तो हमारे लिए कुछ भी असंभव नहीं।

दिव्यांग नहीं, ये खास हैं

तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल कलाम और प्रणब मुखर्जी के हाथों सम्मानित विवेक की कामयाबी में अतुलनीय योगदान के लिए उनकी मां कौशल्या जोशी को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सम्मानित किया है। वह कहती हैं कि लोग सोचते हैं कि दिव्यांग कुछ नहीं कर सकता, लेकिन यह बच्चे खास हैं। पिता सुभाष जोशी बताते हैं कि ब्रिटेन से आए लॉर्ड स्वराज पॉल विवेक को बीए की डिग्री दे रहे थे तो कहा था कि एक दिन आप इसके नाम से जाने जाएंगे। यकीनन वही हो रहा है।

Chhattisgarh से जुड़ी Hindi News के अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें Facebook पर Like करें, Twitter पर Follow करें और Youtube  पर हमें subscribe करें। एक ही क्लिक में पढ़ें  The Rural Press की सारी खबरें।

See also  स्वास्थ्य मंत्री ने प्रवासी मजदूरों की वापसी पर विभाग को सतर्क रहने के दिए निर्देश