टीआरपी न्यूज़। गरम मसाले से तो हर कोई परिचित हैं। हर खाने में विशेष स्वाद और सुगंध लाने के लिए यह उपयोगी है जब कि हकीकत यह है कि इसको यह गर्म मसाला नाम उन मसालों की तासीर (गुण/प्रभाव) के कारण मिला है जो इस मिश्रण में शामिल किए जाते हैं- जावित्री, जायफल, लवंग, दालचीनी आदि।

दरअसल, हमें यह सवाल काफी अरसे से बेचैन करता रहा है, कि इस गर्म आबोहवा वाले देश में ठंडा मसाला क्यों नहीं देखने-चखने को मिलता! तो इसके लिए हमें अपनी रसोई के मसालों की तासीर समझनी होगी। जहां नुस्खों के हिसाब से इन मसालों की बदलती तासीर इन्हें ठंडे मसालों की श्रेणी में ला देती है।

देते हैं ताजगी का पुट

गर्मियों में जठराग्नि मंद हो जाती है सो भूख खोलने के लिए खटास उपयोगी सिद्ध होती है। चटनी का ही जिक्र करें तो कच्चा आम भी इस त्रिवेणी से जुड़ जाता हैं। परंपराओं में जुड़ा स्वादशीतल सामग्री’ नाम से जो पेय पुष्टमार्गी मंदिरों के छप्पन भोग की सूची में नजर आता है उसमें कर्पूर जैसे शीतलकों का प्रयोग किया जाता है। जिस समय हम होली का रंगीन उत्सव मना रहे होते हैं, उस वक्त गर्मी के आगमन की पदचाप सुनी जा सकती है। इस पर्व के साथ ठंडाई अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है। इस पारंपरिक शरबत में जितने मसाले पड़ते हैं उन सभी की तासीर ठंडी मानी जाती है- गुलाब की पंखुड़ी, हरी इलायची, चार मगज, काली मिर्च और छिले हुए भीगे बादाम। हालांकि यह बात रेखांकित करने लायक है कि काली मिर्च तथा बादाम की तासीर दूसरे नुस्खों में गरम भी हो जाती है।

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औषधीय प्रभाव से बना स्थान

धनिये या पुदीने के ताजे हरे पत्ते ही नहीं, इनका सूखा रूप भी गुणकारी माना जाता है। इसी क्रम में धनिए के पिसे बीज भी ठंडा मसाला ही समझे जाते हैं। गर्मियों में लू लगने से बचने के लिए दही से बनने वाले पेय लस्सी तथा छाछ फायदेमंद माने जाते हैं। इनका प्रभाव बढ़ाने के लिए अक्सर इनमें भुने जीरे का तड़का लगाया जाता है अर्थात् काली मिर्च की तरह जीरे की तासीर भी अवसरानुसार बदलती है। महत्वपूर्ण बात किसी भी मसाले के औषधीय प्रभाव की है। ऐसे में क्षुधावर्धक, रुचिकर, पाचक, वमन निरोधक, तृष्णा निग्रह व ज्वरहर होने वाले पदार्थ को आप ठंडे मसाले की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं।गं्थों से लेकर रसोई तकमहाकवि कालिदास ने अपने अमर गीतिकाव्य ‘ऋतुसंहारम्’ में उन पदार्थो का उल्लेख कई जगह किया है, जो जठराग्नि को शीतलता देते हैं। उल्लेखनीय है कि अवध के बावर्ची संदल/चंदन का उपयोग ग्रीष्मकालीन व्यंजनों में करते थे। इसी तरह खस की जड़ का प्रयोग शरबत में ही नहीं खाने के मुख्य व्यंजनों में भी होता रहा है। तटवर्ती भारत में ताजे नारियल, नारियल के दूध तथा कोकम को भी तापहर मसालों के साथ जुगलबंदी करते देखा जा सकता है। स्पष्ट है कि मौसम के बढ़ते ताप से दो-दो हाथ करने में हम इन दिनों आसानी से उपलब्ध हो रहे धनिया, पुदीना, हरी इलायची, चार मगज और काली मिर्च की शरण ले सकते हैं।

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