रोजगार गारंटी योजना की सोशल ऑडिट में गड़बड़िया आ रही हैं सामने, मूल हितग्राही की बजाय करा दिए गए दूसरों के काम

कोरबा। महात्मा गाँधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत काम हुए हैं या नहीं इसकी पड़ताल के लिए सोशल ऑडिट किया जाता है। वर्तमान में छत्तीसगढ़ में इसी तरह की सोशल ऑडिट चल रही है, जिसमे कई तरह की गड़बड़ियां सामने आ रही हैं।

ग्रामीण इलाकों में लोगों को 100 दिन की मजदूरी मिले इसके लिए रोजगार गारंटी योजना लागू की गई है। इसके तहत समय-समय पर काम का स्वरुप बदलता गया है। वर्तमान में कुआँ निर्माण, भूमि समतलीकरण, कचरा शेड अदि कार्य चल रहे हैं।

रोजगार गारंटी योजना की सोशल ऑडिट में गड़बड़िया आ रही हैं सामने, मूल हितग्राही की बजाय करा दिए गए दूसरों के काम

बीच में कोरोना काल के चलते मनरेगा के कार्यो का सोशल ऑडिट नहीं हो सका। अभी प्रदेश भर के लिए अलग-अलग टीमें बनाकर ग्राम पंचायतों में सोशल ऑडिट कराया जा रहा है। इस मौके पर ग्रामीणों की बैठक आयोजित कर कार्यों की वस्तुस्थिति के बारे में पूछा जाता है। इस दौरान कई गड़बड़ियां भी सामने आ रही हैं।

काम हुआ नहीं और निकल गया पैसा

जनपद पंचायत कोरबा के ग्राम पंचायत मदनपुर में बीते दिनों जब सोशल ऑडिट दौरान अनेक ग्रामीण चौंक उठे। क्योंकि उनके नाम से मनरेगा का कार्य स्वीकृत तो हुआ है, मगर काम के एवज में पैसा ही नहीं दिया गया। वहीं उनके नाम से पैसा निकाल लिया गया है। इनमे से कुछ ग्रामीण तो ऐसे भी हैं, जिन्होंने अपने खर्चे पर काम करवा लिया है मगर उन्हें काम के एवज में अब तक पैसा नहीं मिला है।

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5 लाख 50 हजार की गड़बड़ी आयी सामने

ग्राम पंचायत मदनपुर में सोशल ऑडिट के दौरान यूनिट के लोगों ने रिकॉर्ड देखकर बताया कि किन-किन लोगों के कार्य स्वीकृत किये गए हैं और कौन से कार्य पूरे हो चुके हैं। इस दौरान कुछ ग्रामीणों ने इस बात पर आपत्ति जताई कि उनके नाम पर पैसे का भुगतान होना बताया जा रहा है। मगर उनका कोई काम ही नहीं हुआ है। इनमे से एक भीखम सिंह है, जिसके नाम से कुंआ निर्माण का सवा लाख रुपया स्वीकृत हुआ था। मगर उनके पैसे से धन सिंह नामक ग्रामीण का कुआँ बनवा दिया गया। ठीक ऐसा ही सरपंच मोहल्ले के जोगी राम राठिया के साथ हुआ है।

महिला सरपंच के रिश्तेदार के साथ भी धोखाधड़ी

वहीं जिले की महिला सरपंच कवित्री बाई के देवर प्यारेलाल के लिए कुआं खुदाई का कार्य मनरेगा के तहत स्वीकृत हुआ था। सरपंच पति श्यामलाल ने बताया कि उसके भाई को कुआँ खुदाई का पैसा नहीं मिला। जबकि निर्माण सामग्री के नाम से कुछ रूपये निकाल लिए गए हैं। इसी तरह राजेन्द्रनाथ दत्ता के पिता अतीन कुमार के नाम पर जमीन समतलीकरण का कार्य स्वीकृत हुआ। इस दौरान अतीन कुमार की मौत हो गई, सोशल ऑडिट की बैठक में पता चला कि उनके नाम से मनरेगा के पैसे तो निकाल लिए गए हैं। मगर पैसा उनके परिजनों को नहीं दिया गया है, जबकि राजेन्द्रनाथ का कहना है कि उसने इस उम्मीद से अपने पैसे लगाकर जमीन समतलीकरण करा दिया कि शासन से उसे पैसे मिल जायेंगे। इसी तरह प्रीतम सिंह पिता महेत्तर सिंह ने भी अपनी जमीन का समतलीकरण कराया, मगर उसके पैसे नहीं मिले, जबकि सोशल ऑडिट यूनिट ने बताया कि उसके नाम पर पैसे निकाले जा चुके हैं।

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मस्टर रोल में भी गड़बड़ी

मनरेगा में काम करने वाले मजदूरों की जो कार्यसूची तैयार की जाती है, उसे मस्टर रोल कहा जाता है। स्वाभाविक है कि अगर किसी भी हितग्राही के पैसे से दूसरे ग्रामीण का काम कराया जा रहा है तो मस्टर रोल में भी गड़बड़ी की जाती होगी। मदनपुर में सोशल ऑडिट के दौरान खुलासा हुआ कि जिन ग्रामीणों ने मजदूरी ही नहीं की उनके नाम पर भी फर्जी मस्टर रोल बनाकर रूपये निकल लिए गए हैं।

अधिकांश गांवों में हुई अनियमितता

मनरेगा की सोशल ऑडिट का काम लगभग प्रदेश के सभी जिलों में चल रहा है। इस कार्य में लगे कर्मचारियों का कहना है कि लगभग सभी गांवों में इसी तरह की ही गड़बड़ियां उजागर हो रहीं हैं। अनेक लोगों को उनके कार्य स्वीकृत होने की जानकारी ही नहीं मिली। इतना ही नहीं उनके नाम पर स्वीकृत राशि से किसी और का काम करवा दिया गया। अब इस कार्य में लगी टीम इसकी रिपोर्ट जनपद पंचायत में जमा करके सुनवाई की तिथि तय करेगी। साथ ही सभी ग्रामीणों के प्रकरणों का निपटारा किया होगा। अगर गबन का मामला उजागर हुआ तो उसकी वसूली की जायेगी, साथ ही दोषी कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा भी की जाएगी।

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तकनीकी और रोजगार सहायक की भूमिका

मनरेगा के कार्य को पूरा करने में रोजगार सहायक और तकनीकी सहायक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मूल हितग्राही की बजाय उसके पैसे से किसी और का कार्य अगर कराया जा रहा है तो इसमें इनकी जवाबदेही तय होती है। मदनपुर में उजागर हुए मामलो में इन दोनों की भूमिका संदिग्ध है, मगर सरपंच और हितग्राही किसी और को भी गड़बड़ी में दोषी बता रहे हैं। मनरेगा के कार्य में गड़बड़ियों को रोकने के लिए केवल सोशल ऑडिट ही नहीं बल्कि समय-समय पर उसकी समीक्षा के लिए दूसरी एजेंसियों को भी लगाया जाय, ताकि मूल हितग्राहियों को इस योजना का लाभ मिल सके।

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