रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक बार फिर मजदूरों के शोषण की शर्मनाक तस्वीर सामने आई है। करीब छह साल पहले 2019 एक कंपनी के फ्रेंचाइजी अधिकार वाली पार्ले फैक्ट्री से 27 बच्चों को बाल मजदूरी से मुक्त कराया गया था। अब उसी मालिकाना हक वाली खरोरा स्थित उमाश्री राइस मिल कैंपस में संचालित मोजो मशरूम फैक्ट्री से 97 मजदूरों को बंधुआ मजदूरी से छुड़ाया गया है, जिनमें महिलाएं, पुरुष और करीब 20 नाबालिग बच्चे भी शामिल हैं।

इन मजदूरों में महिलाएं, पुरुष और करीब 20 नाबालिग बच्चे शामिल हैं। महिला बाल विकास विभाग और बचपन बचाओ आंदोलन संस्था की संयुक्त कार्रवाई में ये मजदूर रेस्क्यू किए गए। मजदूरों का आरोप है कि उनसे 24-24 घंटे जबरन काम करवाया गया, मारपीट की गई, और न तो वेतन दिया गया, न बाहर निकलने की इजाजत।

कैसे हुआ खुलासा?

2 जुलाई की रात कुछ मजदूर फैक्ट्री मालिकों की प्रताड़ना से तंग आकर भाग निकले। 20 किलोमीटर पैदल चलकर वे रायपुर पहुंचे और SSP कार्यालय में शिकायत दर्ज कराई। इसके बावजूद पुलिस ने तुरंत कोई कार्रवाई नहीं की और 7 दिन बाद फैक्ट्री पर रेड की गई।

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फैक्ट्री के हालात

  • मजदूरों को फैक्ट्री के गेट तक आने की भी इजाजत नहीं थी
  • फैक्ट्री परिसर की दीवारें 12 फीट ऊंची हैं
  • बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था
  • गेट पर ताला और गार्ड तैनात रहता था

शिकायत के बावजूद कोई FIR नहीं

अब तक कोई FIR दर्ज नहीं हुई है। रायपुर SSP डॉ. लाल उमेद सिंह का कहना है कि FIR तभी दर्ज होगी जब श्रम विभाग की जांच रिपोर्ट आएगी। जबकि मजदूरों ने विकास तिवारी, विपिन तिवारी और नितेश तिवारी के खिलाफ शिकायत दी है। इन पर बंधक बनाकर रखने, मारपीट करने और मजदूरी का भुगतान न करने का आरोप है।

पहले भी इसी कंपनी का रहा है विवाद

2019 में रायपुर स्थित पार्ले की फ्रैंचाइज़ी फैक्ट्री में बाल मजदूरी का मामला सामने आया था, जहां से 27 बच्चों को रेस्क्यू किया गया था। अब उसी कंपनी के मालिकाना हक वाली उमाश्री राइस मिल और मोजो मशरूम यूनिट से जुड़ रहा है।

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महिला बाल विकास का दावा

महिला बाल विकास अधिकारी शैल ठाकुर ने बताया कि शिकायत मिलते ही रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया। मजदूरों को यूपी, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश से लाया गया था। इनमें से 20 नाबालिग बच्चों को बाल मजदूर के तौर पर वर्गीकृत किया गया है।

अब तक 7 फैक्ट्रियां सील की जा चुकी हैं, लेकिन मुख्य आरोपियों के खिलाफ कोई गिरफ्तारी नहीं हुई। ऐसे में सवाल उठता है कि जब सबूत सामने हैं, मजदूर खुद प्रताड़ना की कहानी बता रहे हैं, तो क्या FIR के लिए रिपोर्ट का इंतज़ार केवल एक बहाना है?