टीआरपी डेस्क। Heritage of Chhattisgarh : छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में एक ऐसा मंदिर भी है जो करीब 1000 साल पुराना है। इस मंदिर में भगवान गणेश अपने पिता भगवान शंकर के साथ विराजे हैं। यह मंदिर बहुत ज्यादा प्रसिद्ध तो नहीं है, लेकिन भक्तों में इस मंदिर के प्रति बड़ी आस्था है। आसपास की जगहों से लोग यहां दर्शन करने आते हैं। भक्तों का मानना है कि यहां पूजा-अर्चना करने से मनचाहा जीवन साथी मिलता है और बड़ी परीक्षाओं में सफलता मिलने के भी कुछ उदाहरण देखे गए हैं।

कहां स्थित है ये प्राचीन मंदिर ?
दुर्ग जिला मुख्यालय से करीब 16 km दूर, खैरागढ़ रोड में एक गांव है नगपुरा। जहां तालाब के बाए किनारे पर यह मंदिर सदियों से स्थापित है। यह मंदिर भगवान शिव और गणपति को समर्पित है। मंदिर का मुख पूर्व दिशा की ओर है। मंदिर के गर्भगृह में शिव लिंग स्थापित है और मंदिर के पीछे बाह्य भित्ति पर भगवान गणेश की प्रतिमा विरजमान है। इसके अलावा इस मंदिर में कुछ अन्य प्रतिमाएं भी स्थापित किए गए हैं। वरिष्ठ पुरात्तववेता केपी वर्मा ने बताया कि यह मंदिर करीब 12वीं शताब्दी में बनाया गया था। संभवतः रायपुर के कलचुरि राजाओं ने अपने शासन के दौरान इस मंदिर का निर्माण करवाया था।

भोरम देव मंदिर की तरह दिखता है यह मंदिर
Heritage of Chhattisgarh : यह मंदिर कवर्धा में स्थित भोरम देव मंदिर की तरह दिखता है। गांव वाले भी ऐसा ही कहते हैं, क्योंकि इस मंदिर के चौखट पर भोरम देव की तरह ही छोटे-छोटे करीब 10 मिथून प्रतिमाएं उकेरी गई है। वरिष्ठ पुरात्तववेता केपी वर्मा ने बताया कि दिखने में हालाकि एक जैसे दिखते हैं, लेकिन दोनों मंदिर में काफी अंतर है। भोरमदेव 11 वीं शताब्दी का है जबकि नगपुरा का मंदिर 12वीं शताब्दी का है।

शासन की अनदेखी, ग्रामवासी करते हैं देखरेख
यह मंदिर पुरातत्व विभाग के जानकारी में है, लेकिन शासन द्वारा इस मंदिर की देख-रेख, पूजा-पाठ और सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। यह मंदिर धीरे-धीरे कमजोर भी होता जा रहा है। मंदिर की देख-रेख और पूजा-अर्चना लंबे समय से गांव वाले ही करते आए हैं। चूंकी गांव वालों की इस मंदिर से बड़ी आस्था जूड़ी है। उनके पूर्वज यहां पीढ़ियों से पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं। गांव में किसी भी शुभ काम की शुरूआत मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद ही की जाती है।


