टीआरपी डेस्क। ये कहानी है छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के बसे एक छोटे से गांव थनौद की, 2,000 की कुल आबादी वाले इस गांव में तकरीबन 200 परिवार ऐसे हैं जिनके जीविकोपार्जन का मुख्य स्त्रोत ही मूर्ति बनाना है। यहां के मूर्तिकारों की कला के चलते इस गांव की पहचान देशभर में शिल्प ग्राम के नाम से होने लगी है।

शिल्प ग्राम सुनते ही हर किसी के दिमाग में एक ऐसा गांव ही आएगा जहां की शिल्पकारी विख्यात हो, लेकिन क्षेत्र कोई भी हो हर दल को एक मुखिया की जरूरत होती ही है। फिलहाल इस गांव में मूर्तिकारों का मुखिया राधेश्याम चक्रधारी “राधे” है।

थनौद गांव के कुम्हार परिवार में जन्में राधेश्याम चक्रधारी का परिवार तकरीबन 200 सालों से मूर्तिकला के क्षेत्र में अपने वर्चस्व को बरकरार रखे हुए है। समय के साथ बदलती पद्धतियों को अपनाते हुए यह परिवार मूर्तिकला के क्षेत्र में अपने परिवार समेत थनौद गांव और पूरे छत्तीसगढ़ का नाम राष्ट्रीय पटल पर स्थापित कर रहा है। उनका परिवार 4 पीढ़ियों से मूर्तिकला के क्षेत्र में काम करता आ रहा है।

गरीबी बना जुनून
राधेश्याम बताते हैं कि उनका जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था। वह एक ऐसा दौर था जब गांव के बड़े परिवार के बच्चे ही शिक्षा का खर्च वहन कर पाते थे। राधे स्कूल तो जाते थे लेकिन उनका रुझान बचपन से ही मूर्तिकला की ओर था, तो वे स्कूल में कागज की कठपुतलियां बनाया करते थे और साथ पढ़ने वाले बड़े घराने के बच्चों को वो कठपुतलियां बेचकर उससे मिले पैसों से कॉपी खरीदते थे। इतना ही नहीं उस एक कॉपी को राधे चार हिस्सों में बांटकर सारे विषयों की पढ़ाई एक ही कॉपी के माध्यम से करते थे। इन स्थितियों को देखकर उन्होंने जीवन में अपना नाम बनाने और पैसा कमाने की ठानी थी।

दादी ने बढ़ाया मनोबल
राधे बताते हैं कि जब वे बचपन में छोटी-छोटी मूर्तियां बताने थे तब उनकी दादी अटकन बाई उनका खूब मनोबल बढ़ती थीं। राधे ने बताया कि उनके जीवन में मूर्तियों को लेकर पहली मार्गदर्शक उनकी दादी ही है। बचपन से ही राधे की बनाई मूर्तियों को उनकी दादी बाजार में लेजाकर बेचती थीं और उससे मिलने वाले पैसे लाकर राधे को देती थीं, ताकि राधे को उनकी मेहनत का उचित प्रतिफल मिले व उनका उत्साहवर्धन हो।
4 पीढ़ियों से जारी मूर्तिकारी
मूर्तिकारी के क्षेत्र में चक्रधारी परिवार का बड़ा नाम रहा है राधे बताते हैं कि उनके दादा बृजलाल चक्रधारी अपने समय में चाक (गति पहिया) पर कुम्हारी करते थे। दूसरी पीढ़ी के 5 भाइयों में बालम चक्रधारी जिन्हें राधेश्याम भी अपना गुरु मानते हैं और छत्तीसगढ़ में जिनकी मूर्तिकला से कोई अनभिज्ञ नहीं है उनका इस क्षेत्र में वर्चस्व रहा। अब तीसरी पीढ़ी में खुद राधे ने मूर्तिकला के क्षेत्र में अपनी पारिवारिक बागडोर संभाल रखी है, राधे आज भी मिट्टी की मूर्तिकारी कर रहे हैं और उनके बेटे लव चक्रधारी राधेश्याम आर्ट गैलरी में ही फाइबर और मेटल की मूर्तियां बनाकर अपनी पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। जो चक्रधारी परिवार की मूर्तिकारी के क्षेत्र में चौथी पीढ़ी के प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

राजनांदगांव से मिली ख्याति
राधेश्याम बताते हैं कि मूर्तिकारी में पूर्ण रूप से प्रवेश करने के बाद आर्थिक तंगी के चलते एक दौर ऐसा भी आया कि उन्हें अपना काम जमाने के लिए थनौद से पलायन कर राजनांदगांव जाना पड़ा, जहां उनकी दोस्ती नंदू भूतड़ा से हुई जिन्होंने राधे को उनके जीवन का पहला बड़ा काम दिलवाया। राधे को राजनांदगांव के बाल समाज में नरसिंह देव की मूर्ति बनाने का काम मिला। जिस वर्ष राधे ने नरसिंह देव की मूर्ति बनाई उस वर्ष राजनांदगांव बाल समाज की मूर्ति को वहां की झांकी में पहला स्थान प्राप्त हुआ। जिसके बाद लगातार 7 वर्षों (1995-2002) तक पुणे-मुंबई-कोलकाता के बड़े कलाकारों द्वारा बनाई गई मूर्तियों को राजनांदगांव की झांकी में बाल समाज की 17 साल के राधे द्वारा बनाई गई मूर्तियों ने हर वर्ष मात दी, जिसके बाद ही आमजन ने राधे की कला को सराहा और उन्हें प्रसिद्धि प्राप्त हुई।

राधे का शुरुआती संघर्ष
शुरुआती दौर के जब राधे ने काम शुरू किया तब उनका साथ उनके दोस्त दिलीप यादव जो आज भी उनकी बनाई मूर्तियों के रंगसाझ हैं, उनका दूसरा दोस्त सन निषाद जो अब भी मूर्तिकारी में उनका हाथ बंटा रहे हैं और उनके जीजा राजू कुम्हार जो आज भी राधे आर्ट गैलरी में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं ने दिया था। राधे बताते हैं कि यही वे लोग हैं जिन्होंने गरीबी के उस दौर में भी उनकी काबिलियत को पहचाना और हमेशा उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।

जन्मभूमि ने भी दिया साथ
राधे बताते हैं कि शिवनाथ नदी से लगे थनौद गांव में नदी और नाले के बीच का हिस्सा जिसे कुम्हार सरार कहते हैं वहां चार अलग अलग प्रकार की मिट्टी पाई जाती है और हर मिट्टी का अलग उपयोग होता है। किसी मिट्टी से मूर्ति का चेहरा तो किसी मिट्टी से शरीर और किसी मिट्टी से हाथ पैर बनाए जाते हैं। ये सभी प्रकार की मिट्टियां गांव के सरार क्षेत्र में मिल जाती हैं। सरार ऐसी जगह है जहां नदी का पानी कटकर नाले तक जाता है और नदी की काली मिट्टी को अपने साथ खींचकर जमीनी क्षेत्र में ले जाता है, जिस मिट्टी का उपयोग कुम्हार और मूर्तिकार मिट्टी के बर्तन और मूर्ति बनाने में करते हैं। राधे ने खुदको किस्मत वाला बताते हुए कहा कि थनौद में सरार क्षेत्र होने के चलते शुरुवाती दौर में उन्हें मिट्टी की कोई समस्या नहीं आई और वह आसानी से मूर्तिकारी के क्षेत्र में आगे बढ़ सके।

प्रतिभा को मिला सम्मान
राधे बताते हैं कि मूर्तिकारी के लिए उनका कई जगहों पर सम्मान किया गया। नगर निगम दुर्ग, नगर निगम भिलाई महाराष्ट्र में गोदिया समेत छत्तीसगढ़ के कई अन्य जिलों से उन्हें सम्मान प्राप्त हुआ। लेकिन उनका कहना है कि वह अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि 1995 में राजनांदगांव की झांकी में बाल समाज की मूर्ति के जीतने पर उनके मिले सम्मान को ही वे यादगार मानते हैं, क्योंकि उसी पुरस्कार के मिलने का बाद देशभर में राधे की मूर्तियों को अलग पहचान मिली।

मूर्ति विवाद पर राधे की राय
राधे ने बताया कि उन्हें वास्तविक स्वरूप में ही देवी-देवताओं की मूर्तियां पसंद हैं। भगवान की मूर्तियों में उनके असली स्वरूप के साथ खिलवाड़ उन्हें स्वीकार नहीं। उनका कहना हैं कि मूर्ति बनाने का काम देने वाले लोग अपने मापदंडों पर मूर्ति बनवाना चाहते हैं और मूर्तिकार को अपनी रोजीरोटी कमाने के लिए उनके मापदंडों को मानना पड़ता है, इसलिए वे मूर्ति बनाने का काम देने वाले से इस बात की उम्मीद रखते हैं कि कोई भी भगवान के अलसी स्वरूप को बदलकर मूर्ति बनाने की फरमाइश न रखे।
राधे की मूर्तिकारी
राधे बताते हैं कि हर वर्ष वे भगवान गणेश और मां दुर्गा की मूर्तियों का काम लेते हैं। वह बताते हैं कि 12 साल की उम्र के बाद से वे हर साल कम से कम 100 मूर्तियां बनाते आए हैं। मिट्टी की मूर्तियों के अलावा साकर धारा के मोक्ष धाम में नदी के बीचोबीच 35 फीट की और दुर्ग के शक्ति नगर के तालाब के बीच 50 फीट की स्थापित भगवान शिव की मूर्ति भी उन्होंने ही बनाई है। राधे अब तक 5,000 से ज्यादा मूर्तियां बना चुके हैं और वे 2024 में बनाई गई दगड़ू हलवाई गणेश प्रतिमा जिसे उन्होंने बनकर पुणे भेजा था उसे अपनी सर्वश्रेष्ठ कलाकृति मानते हैं। दुर्ग के लोककला मार्ग में स्थापित सारी फाइबर और मेटल की मूर्तियां भी राधे ने ही तैयार की हैं, इसे भी वे अपनी बड़ी उपलब्धियों में गिनते हैं।

बच्चों को मुफ्त में सीखते हैं कारीगरी
राधे बताते हैं कि बचपन में जब वे मूर्तिकारी सीखने की चाह में बड़े मूर्तिकारों के पास जाया करते थे, तो ज़्यादातर मूर्तिकार उनके साथ दुर्व्यवहार करते थे। जिसके चलते उन्होंने तय किया कि जब भी कोई युवा मूर्तिकार उनसे कारीगरी सीखने आएगा तो वे उसे मुफ्त में कारीगरी सीखने के साथ साथ उसके रहने खाने का खर्चा भी वहन करेंगे। राधे अब तक 500 से ज्यादा युवा मूर्तिकारों को मूर्तिकारी सिखा चुके हैं जो अब अपने अपने क्षेत्र में मूर्तिकारी के जरिए अपना जीवनयापन कर रहे हैं।

राजनीति से बनाए रखी दूरियां
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने राधेश्याम चक्रधारी को उनकी कला को देखते हुए छत्तीसगढ़ माटी शिल्प बोर्ड का अध्यक्ष बनने प्रस्ताव रखा था, लेकिन राधे मूर्तिकारी को भगवान के प्रति अपनी आस्था मानते हैं, उनका उद्देश्य कभी भी अपनी कला के जरिए कोई पद हासिल करना नहीं रहा और वे अपनी इस कला पर कोई भी राजनीतिक ठप्पा नहीं लगाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का प्रस्ताव पर अपने गुरु बालम चक्रधारी का नाम आगे किया। जिसके बाद बलम चक्रधारी छत्तीसगढ़ माटी शिल्प बोर्ड के अध्यक्ष मनोनीत किए गए।



