टीआरपी डेस्क। दीपावली पर्व माता लक्ष्मी की आराधना के साथ-साथ भगवान कुबेर की उपासना का भी विशेष अवसर माना जाता है। मान्यता है कि, लक्ष्मी को प्रसन्न करने से पहले उनके कोषाध्यक्ष भगवान कुबेर की पूजा करना आवश्यक होता है। ऐसे में मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में स्थित कुबेर मंदिर अपनी प्राचीनता और रहस्यमय विशेषताओं के कारण अत्यंत प्रसिद्ध है।

खिलचिपुरा स्थित मंदिर आस्था और मान्यताओं का प्रतीक

मंदसौर शहर से लगभग तीन किलोमीटर दूर खिलचिपुरा में स्थित यह मंदिर आकार में छोटा होते हुए भी आस्था और मान्यताओं में अत्यंत विशाल है। स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, यह मंदिर यतियों द्वारा तंत्र साधना के माध्यम से यहां स्थापित किया गया था। कहा जाता है कि तंत्र क्रियाओं से जुड़ी विशेष शक्तियों के कारण आज तक इस मंदिर की नींव नहीं मिल पाई है। लगभग 1400 वर्ष पुराने इस मंदिर की बनावट तिरछी दिखाई देती है, जो इसे और रहस्यमय बनाती है।

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गर्भगृह में प्रवेश करने से पहले झुकाना पड़ता है सिर

मंदिर का एक अनोखा पहलू यह है कि श्रद्धालुओं को गर्भगृह में प्रवेश करने के लिए सिर झुकाना पड़ता है। आम तौर पर कुबेर मंदिरों में केवल धन के देवता की प्रतिमा होती है, लेकिन इस मंदिर में भगवान शिव का भव्य शिवलिंग और भगवान गणेश की प्रतिमा भी स्थापित है। भगवान कुबेर की ओजस्वी प्रतिमा इनके साथ दीवार पर विराजमान है। यह अनोखा संयोजन तंत्र क्रियाओं और सिद्धियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

धनतेरस के दिन इस मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। श्रद्धालु धन और समृद्धि की कामना के साथ भगवान कुबेर की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। मंदिर परिसर में इस दिन विशेष हवन और धार्मिक आयोजन होते हैं।

मराठा काल के दौरान निर्मित हुआ था मंदिर

पंडित राकेश भट्ट के अनुसार, यह मंदिर मराठा काल के दौरान निर्मित हुआ था और उस समय इस पर मुगल सेना ने हमला भी किया था। आज भी धनतेरस पर सुबह से देर रात तक भक्तों का तांता लगा रहता है। कुबेर मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि यह आस्था, रहस्य और इतिहास का अद्भुत संगम भी प्रस्तुत करता है।

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