टीआरपी डेस्क। धनतेरस दीपावली की शुरुआत का प्रतीक है और इसे धन और स्वास्थ्य का पर्व माना जाता है। इस दिन सोना, चांदी या नए बर्तन खरीदने की परंपरा है, जिससे मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और घर में सुख समृद्धि आती है। लेकिन शास्त्र बताते हैं कि धनतेरस सिर्फ धन का ही नहीं, स्वास्थ्य का भी पर्व है।
धन्वंतरि, जिन्हें आयुर्वेद का प्रणेता और वैद्यकशास्त्र का देवता माना जाता है, का जन्म इसी दिन समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर हुआ था। वे विष्णु के अवतार माने जाते हैं और उनके चार भुजाओं में शंख, चक्र, औषध और अमृत कलश हैं। उनकी पूजा से आयुर्वेद और स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान का सम्मान होता है।
पुराणों और आयुर्वेदिक ग्रंथों में धन्वंतरि की महिमा का वर्णन है। सुश्रुत संहिता के अनुसार धन्वंतरि ने आयुर्वेद का प्राचीन ज्ञान प्रसारित किया और शल्यशास्त्र में निपुण लोगों को प्रशिक्षण दिया। उनका योगदान शल्य चिकित्सा और स्वास्थ्य विज्ञान के क्षेत्र में अमूल्य है। धन्वंतरि के तीन रूप में समुद्र मंथन से उत्पन्न धन्वंतरि प्रथम, धन्व के पुत्र धन्वंतरि द्वितीय और काशिराज दिवोदास धन्वंतरि तृतीय माने जाते हैं। इनकी पूजा के माध्यम से स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना की जाती है।
वैदिक और पौराणिक परंपराओं में धन्वंतरि को रोगों के नाशक और जीवन रक्षक के रूप में पूजा जाता है। उनका अमृत कलश सभी प्रकार के भय और रोगों से सुरक्षा का प्रतीक है। धनतेरस के इस शुभ अवसर पर भगवान धन्वंतरि से प्रार्थना की जाती है कि वे सभी के स्वास्थ्य और कल्याण की रक्षा करें।


