टीआरपी। folk songs, dance and Sufi music : छत्तीसगढ़ के संगीत रसिकों को पूरे सालभर तक इंतजार रहता है कि उन्हें देश के नामी कलाकारों को देखने और सुनने का अवसर मिलेगा। अपने मनपसंद गायक, कलाकारों को मंच पर देखने के लिए हजारों प्रशंसक प्रतिदिन राज्योत्सव में आयोजित कार्यक्रम देखने पहुंचते हैं। ऐसा ही नजारा पिछले तीन दिनों से देखने को मिल रहा है। पहले दिन प्रसिद्ध सूफी गायक हंसराज रघुवंशी ने सूफी गीतों और भजनों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। दूसरे दिन प्रसिद्ध गायक आदित्य नारायण ने बॉलीवुड के सुपरहिट गीतों से समां बांधा। तीसरे दिन गायिका भूमि त्रिवेदी ने अपनी मनमोहक आवाज से दर्शकों को झूमने के लिए मजबूर कर दिया।

गायिका भूमि त्रिवेदी ने ‘ससुराल गेंदा फूल’, ‘सैय्यारा’, ‘राम चाहे लीला’, ‘झुमका गिरा रे’ ‘जय-जय शिवशंकर-कांटा लगे न कंकड़’, ‘होली खेले रघुवीरा, रंग बरसे, ये देश है वीर जवानों का जैसे लोकप्रिय गीतों को अपने नए अंदाज़ में प्रस्तुत कर माहौल को जोश और उमंग से भर दिया। हिंदी, पंजाबी और राजस्थानी सहित अन्य राज्यों के भाषाओं के धुनों के साथ छत्तीसगढ़ी लोकसंगीत का ताना-बाना जोड़ते हुए उन्होंने युवाओं के दिलों में संगीत की हलचल मचा दी। दर्शकों की तालियों और नृत्य से राज्योत्सव परिसर गूंज उठा।

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पंडवानी की वीरता और सूफी संगीत की रूहानी छुअन

छत्तीसगढ़ की गौरवगाथा को आगे बढ़ाते हुए पद्मश्री ऊषा बारले ने अपने तानपुरे की झंकार और अभिव्यक्तिपूर्ण मुद्राओं से महाभारत की वीरता को जीवंत कर दिया। उनकी प्रस्तुति ने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। उन्होंने महाभारत के चीरहरण की घटनाओं को मार्मिक और ह्रदयस्पर्शी ढंग से प्रस्तुत किया।
इसके बाद सूफी पार्श्व गायक राकेश शर्मा और उनकी टीम ने ‘दमादम मस्त कलंदर’, ‘मौला मेरे मौला’, ‘चोला माटी के राम’ जैसे गीतों से श्रोताओं को रूहानी सफर पर ले गए। उनकी साथी गायिका निशा शर्मा और कलाकारों ने भी अपने स्वर और लय से इस सूफियाना माहौल को और प्रगाढ़ बनाया।

’माटी की खुशबू और लोकनृत्य की छटा’

प्रादेशिक लोकमंच के कलाकार कुलेश्वर ताम्रकार ने नाचा के माध्यम से छत्तीसगढ़ की माटी में रची-बसी लोकसंस्कृति को मंच पर साकार किया। उनके प्रदर्शन ने परंपरा, ऊर्जा और रचनात्मकता का ऐसा संगम रचा कि दर्शक देर तक तालियां बजाते रहे और दर्शकदीर्घा में मुस्कान के साथ थिरकते रहे।

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