टीआरपी डेस्क। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट कर दिया है कि, गिरफ्तार व्यक्ति को यदि गिरफ्तारी के आधार लिखित रुप से उस भाषा में दिए जाएं जिसे वह समझता हो। यदि ऐसा नहीं किया गया तो गिरफ्तारी और रिमांड दोनों अवैध मानी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि, गिरफ्तार व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने के 2 घंटे के भीतर यह हो जाना चाहिए। विदित हो कि गिरफ्तारी की सूचना और गिरफ्तारी का आधार दो अलग विषय हैं।
क्या है पूरा मामला ?
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने मिहिर राजेश शाह विरुद्ध महाराष्ट्र सरकार की सुनवाई करते हुए कहा “गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार बताना संवैधानिक आदेश है जो सभी कानूनों के अंतर्गत आने वाले हर अपराध में अनिवार्य है। यह IPC जो कि अब BNS है उसके अंतर्गत आने वाले सभी अपराधों में अनिवार्य है।” चीफ जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज की बेंच ने कहा “गिरफ्तारी के आधार गिरफ्तार व्यक्ति को उसकी समझ में आने वाली भाषा में लिखित रुप में बताए जाने चाहिए। उक्त आधारों को उचित समय के भीतर और किसी भी स्थिति में मजिस्ट्रेट के समक्ष रिमांड कार्यवाही के लिए गिरफ्तार व्यक्ति को पेश करने से कम से कम 2 घंटे पहले लिखित रूप में बताया जाना चाहिए।”
नियम का पालन न होने पर हो सकती है रिहाई
Supreme Court ने कहा है कि, यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो गिरफ्तारी और उसके बाद की रिमांड अवैध मानी जाएगी और व्यक्ति को रिहा किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 22 (1) का उल्लेख करते हुए कहा है कि गिरफ्तार व्यक्ति को केवल आधार पढ़कर सुना देने से संवैधानिक अधिदेश का उद्देश्य पूरा नहीं होता। यह अनुच्छेद 22 (1) के उद्देश्य के विपरीत होगा।


