टीआरपी डेस्क। Nature’s Protector : भारत अपना अमृत काल पूरा कर चुका है। 1947 में आजाद हुए भारत और अब (2025) के भारत में जमीन-आसमान का फर्क है, हम बात कर रहे हैं देश में हुए अनगिनत विकासकार्यों, सड़कों के विस्तार और बुनियादी ढांचे में हुए अभूतपूर्व विकास की। स्वाभाविक सी बात है कि इस विकास के लिए लाखों-करोड़ों पेड़ों की कटाई की गई है। समय-समय पर पेड़ों के संरक्षण के लिए कई योद्धा भी सामने आए जिन्होंने निःस्वार्थ भाव से पर्यावरण और वृक्षों के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दिया। ऐसे ही एक योद्धा छत्तीसगढ़ में भी मौजूद है जो इन दिनों खूब चर्चाओं में है।

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के रोमशंकर यादव ने पिछले 3 दशकों से पेड़ों के संरक्षण का बीड़ा उठा रखा है। सालों से पेड़ों की निःस्वार्थ सेवा कर रहे रोमशंकर यादव का उद्देश्य ही अपने आप में एक प्रेरणा है, उन्होंने अकेले ही 10 लाख पेड़ों के विनाश को रोका। इसके साथ ही रोमशंकर ने लाखों पौधे रोपे जो उपवन का रूप ले चुके हैं, उन्होंने अपने इस प्रयास से लोगों को वृक्षारोपण के प्रति जागरुक भी किया।

सालों की तपस्या के बाद रोमशंकर यादव को कौन बनेगा करोड़पति के मंच पर सम्मानित किया। साथ ही उनके इस प्रयास से प्रेरणा लेते हुए महानायक अमिताभ बच्चन ने हर वर्ष अपने और अपने परिजनों के जन्मदिन पर एक पौधा लगाने का प्रण लिया।

कौन हैं रोमशंकर यादव ?

रोमशंकर यादव दुर्ग जिले के ग्राम डुंडेरा के निवासी हैं जो तकरीबन 20 सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। एक ग्रामीण कृषक परिवार में जन्में रोंमशंकर यादव, रोजमर्रा के संघर्षों के साथ-साथ प्रकृति के प्रति समर्पण की पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। रोमशंकर पिछले 2 दशकों से भिलाई इस्पात संयंत्र से लगे मड़ोदा डैम क्षेत्र में लगे 7 लाख से ज्यादा वृक्षों का संरक्षण और लगातार पौधारोपण कर पर्यावरण के संरक्षण की दृष्टि से अनुकरणीय कार्य कर रहे हैं।

खेल-खेल में हुई शुरुआत

पेड़ों के संरक्षण और पौधारोपण के आगाज़ के सवाल पर रोमशंकर ने बताया कि मेरा परिवार शुरू से ही पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरुक रहा है। मैंने बचपन से ही अपने घर के बड़ों को पेड़ों की रक्षा करते, पौधारोपण करते देखा, जिसके चलते शुरुआत से ही दिल में पेड़ों के प्रति लगाव और उससे भी ज्यादा जिम्मेदारी का अहसास शामिल था। बचपन में अपने दोस्तों के साथ खेल-खेल में पौधारोपण की शुरुआत हुई, युवावस्था में पहुंचने पर मैं जल-जंगल-जमीन अभियान के साथ जुड़ा और इस अभियान में मुझे यह बात समझ आई की पृथ्वी में जीवन के लिए पेड़ों का संरक्षण कितना जरूरी है। जिसके बाद मैंने अपने ही क्षेत्र में लगे करीब 10 लाख पेड़ों के संरक्षण की दिशा में लगातार काम किया। इससे वातावरण को ताजी हवा तो मिलती ही थी लेकिन इसके साथ-साथ भिलाई इस्पात संयंत्र में स्टील निर्माण कार्य से पैदा होने वाले कार्बन से भी आसपास के क्षेत्रों का संरक्षण होता था।

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स्व. ज्ञानलाल देशमुख बने प्रेरणा

रोमशंकर दुर्ग जिले के ग्राम कोड़िया के पर्यावरण प्रेमी स्व. ज्ञानलाल देशमुख को अपना प्रेरणा स्त्रोत मानते हैं। रोमशंकर बताते हैं कि स्व. ज्ञानलाल देशमुख पर्यावरण के प्रति इतने समर्पित थे कि उन्होंने कोड़िया स्थित अपने 5 एकड़ जमीन को जंगल में बदल दिया था। उस दौर में रोमशंकर भी पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में कार्यरत थे जिसके चलते उनकी मुलाकात ज्ञानलाल देशमुख से हुई और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उनके कार्यों को देखकर रोमशंकर ने उन्हें अपना गुरु बना लिया।

रोमशंकर के ग्राम डुंडेरा के करीब मड़ोदा डैम क्षेत्र में भिलाई इस्पात संयंत्र ने ₹18 करोड़ की लागत से 10 लाख पेड़ लगाए थे जिसने जंगल का रूप ले लिया था। पर्यावरण के प्रति रोमशंकर के बढ़ते रुझान के बीच भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा लगाए गए पोड़ों की लोगों ने कटाई शुरू कर दी, जब रोमशंकर को इस बात का चला तो वे व्यथित हो उठे और उनके मन में सबसे पहला विचार यह आया कि जब कोड़िया के गेंदलाल देशमुख बंजर जमीन को जंगल में बदल सकते हैं तो वे विकसित जंगल का संरक्षण क्यों नहीं कर सकते। इसी सोंच के साथ वे भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा कराई जा रही पेड़ों की अंधाधुंध कटाई का विरोध करने पहुंचे जहां से पेंड़ों के संरक्षण के प्रति उनके रुझान ने जुनून का रूप लिया।

रोमशंकर का मानना है कि पेड़ों के संरक्षण से बड़ी कोई पूजा नहीं है। वे कहते हैं कि पेड़ ऑक्सीजन का सबसे प्रमुख स्त्रोत हैं और यदि वे पेड़ों का संरक्षण कर रहे हैं तो वे अपनों के साथ-साथ दुश्मन के लिए भी भलाई का ही कार्य कर रहे हैं, क्योंकि पेड़ों से पैदा होने वाली ऑक्सीजन सभी के उपयोग में आएगी और हर किसी को जीवित रहने के लिए ऑक्सीजन सबसे ज्यादा जरूरी है।

कई कठिनाईयों का करना पड़ा सामना

इस पहल के आगाज के दौरान रोमशंकर को बहुत समर्थन नहीं मिला, तकरीबन 6-7 सालों तक मड़ोदा क्षेत्र में कटाई से बचाए गए 7 लाख पेड़ों की देख-रेख वे अकेले ही करते रहे। इस दौरान उन्हें कई विरोधियों का भी सामना करना पड़ा। ग्रामीण क्षेत्र में निवासरत होने के कारण गांव के ही लोग जलाऊ लकड़ी के लिए पेड़ों की कटाई करने की कोशिश करते थे और रोमशंकर द्वारा उन्हें रोकने पर उनके घर तक पहुंच जाते थे, लेकिन रोमशंकर का परिवार हमेशा उनके साथ खड़ा रहा और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में उनकी इस पहल का सहयोग किया। समय के साथ रोमशंकर ने एक संस्था बनाने का निर्णय लिया जिसमें उन्होंने ऐसे लोगों को आमंत्रित किया जो निःस्वार्थ भाव से पेड़ों के संरक्षण के लिए कार्य कर सकें।

हितवा संगवारी का कार्यक्षेत्र

रोमशंकर यादव ने बताया कि उनके संगठन हितवा संगवारी की शुरुआत बड़ी अच्छी रही। उनके साथ करीब 60-70 लोग जुड़े और कई महीनों तक पेड़ों के संरक्षण के लिए काम किया। हितवा संगवारी के सदस्यों द्वारा लोगों पेड़ों के सरक्षण के प्रति जागरुक करने के लिए अभियान चलाए गए, मड़ोदा स्थित कृत्रिम जंगल का संरक्षण, समय-समय पर पौधारोपण अभियान का आयोजन, पौधा वितरण अभियान समेत स्वयं तथा लोगों द्वारा लगवाए गए पौधों की स्थिति का जायजा लेने जैसे कार्य शामिल थे।

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रोमशंकर की अगुआई में हितवा संगवारी ने कई बड़े कार्य भी किए जिनमें दुर्ग जनपद कार्यालय के उद्यान में पौधारोपण कर उसे पुनर्जीवित करना, डुंडेरा के शासकीय गार्डन की देख-रेख और पौधारोपण, पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम की याद में कलाम गार्डन की स्थापना और पूर्वजों की याद में पौधारोपण और संधारण के लिए पुरखा गार्डन की स्थापना जैसे कार्य शामिल हैं। इसके अलावा हितवा संगवारी के सदस्य 1 अप्रैल को अप्रैल फूल की जगह अप्रैल कूल डे मनाते हैं जो पड़ें को संरक्षण के लिए समर्पित हैं, इसमें सभी सदसय लोगों को यह संदेश देते हैं कि कैसे पड़ों के माध्यम से पर्यावरण में तापमान का संतुलन बना रहता और क्यों पोड़ों का संरक्षण और पौधारोपण आवश्यक है।

रोमशंकर ने बताया कि शुरु में तो बहुत लोग उनसे जुड़े लेकिन धीरे-धीरे अपनी निजी व्यस्तताओं के चलते अब उनके साथ गिने-चुने सदस्य ही रह गए हैं जिनमें ज्ञानप्रकाश साहू, प्रेम नारायण, रमेश चंद्राकर और उनके परिवार के कुछ लोग ही रह गए हैं, लेकिन पेड़ों के प्रति रोमशंकर का प्रेम और प्रतिज्ञा भाव आज भी कम नहीं हुआ है और वे अपने चंद साथियों के साथ इस दिशा में लागातार कार्य कर रहे हैं।

रोमशंकर खुद वहन करते हैं सारा खर्च

रोमशंकर ने पेड़ों के संरक्षण का जो बीड़ा उठाया है उसमें होने वाला सारा खर्च वे स्वयं ही वहन करते हैं। उनका मानना है कि पेड़ों की सेवा मानव सेवा से भी बड़ा कार्य है क्योंकि इससे सभी जीवों को ऑक्सीजन मिलता है और अपनी आत्मसंतुष्टि के लिए इसमें होने वाला सारा खर्च वे खुद ही वहन करते हैं। वे रोजाना स्वयं और अपने साथियों द्वारा लगाए गए पौधों को सींचते हैं। इसके अलावा वे छोटे पौधों के संरक्षण के लिए चारों तरफ ट्री गार्ड भी स्थापित करते हैं, नए पौधों के लगाने के लिए बीजों की खरीदी और आयोजनों में होने वाले खर्च को रोमशंकर अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। इसलिए उन्होंने अपने इस अभियान को आगे बढ़ाने के लिए आज तक किसी से भी आर्थिक मदद की उम्मीद नहीं रखी।

सम्मानों से हुई कार्यों की सराहना

अपने पुरस्कारों का जिक्र करते हुए रोमशंकर ने बताया कि उनका सबसे पहला और बड़ा सम्मान 2004 में खेल एवं युवा कल्याण विभाग द्वारा जिला स्तर पर किया गया जिसके बाद उनके कार्य लोगों तक पहुंचने लगे। फिर थोड़े समय बाद नेहरू युवा केंद्र द्वारा उन्हें “जिला युवा पुरस्कार” से सम्मानित किया गया। जिससे उनका मनोबल और बढ़ा और वे लगातार पेड़ों के संरक्षण के क्षेत्र में कार्य करते रहे और लगातार उनके कार्यों की सराहना भी होती रही। फिर साल 2019 में पेशे से पत्रकार रोमशंकर यादव को भूपेश बघेल की कांग्रेस सरकार ने “स्व. चंदूलाल चंद्राकर राज्य अलंकरण पुरस्कार” से सम्मानित किया जो कि उन्हें पर्यावरण संरक्षण की दिशा में संपादित उनके लेखों के लिए दिया गया।

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रोमशंकर के इस लगातार जारी संघर्ष को लोगों में पहचान मिलने लगी, जिसके बाद 2023 में उन्हें आउटलुक ने “स्पीक आउट रिमेनिंग पुरस्कार” से सम्मानित किया और अब साल 2025 में उन्हें कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम में फोर्स फॉर गुड हीरोज कार्यक्रम के तहत अमिताभ बच्चन ने सम्मानित किया।

अब तक का सबसे बड़ा मंच है KBC

ज्ञठब् में मिले सम्मान को लेकर किए गए सवाल पर रोमशंकर यादव ने कहा “कभी सोचा नहीं था और न ही उम्मीद थी कि अपनी संतुष्टि के लिए किए जा रहे कार्यों के लिए मुझे इतने बड़े मंच में सम्मानित किया जाएगा, मुझे नहीं लगता कि लोगों को पेड़ों की रक्षा के लिए जागृत करने इससे अच्छा मौका मुझे मिल सकता था। सम्मान मिलने की मुझे बहुत खुशी है, इस बात की भी खुशी है कि इस सम्मान के जरिए अब पूरे देश में मुझे और मेरे काम को पहचाना जा रहा है लेकिन सबसे बड़ी खुशी इस बात की है कि KBC जैसे मंच पर महानायक अमिताभ बच्चन ने मेरे कार्यों को देखते हुए प्रण लिया कि वे अपने और अपने परिजनों के जन्मदिन पर पौधारोपण करेंगे।“

सरकार से मदद की नहीं कानून बनाने की उम्मीद

रोमशंकर पेड़ों के संरक्षण की अपनी इस पहल को लेकर शासन से किसी सहयोग की कोई उम्मीद नहीं रखते, वे सिर्फ इतना चाहते हैं कि वन संरक्षण और पौधारोपण को लेकर सरकार अपनी नीतियां बनाए जिनमें सामान्य नागरिकों की भी पर्यावरण के प्रति जवाबदारी सुनिश्चित की जाए।

रोमशंकर ने यह भी कहा कि आगे भी वे इसी तरह पर्यावरण और पेड़ों के लिए कार्य करते रहेंगे और उनका और उनका संस्था का सबसे पहला लक्ष्य मड़ोदा स्थित उस जमीन को वापस जंगल का रूप देना है जहां विकास के नाम पर भिलाई इस्पात संयंत्र ने लगभग 2.50 लाख पेड़ों की कटाई की थी।

हसदेव-तामनार में रुके कटाई

हसदेव-तामनार में विकास के नाम पर धड़ल्ले से चल रही पेड़ों की कटाई को लेकर रोमशंकर ने कहा कि वे शासन की विकास नीतियों के विरोधी नहीं हैं लेकिन उनकी मांग सिर्फ इतनी है कि शासन विकास के साथ-साथ पेड़ों के संरक्षण का भी ध्यान रखे। उनका मानना है कि बिल्डिंग निर्माण के बिना भी जीवन संभव है लेकिन बिना ऑक्सीजन के बिना किसी भी जीव का जीवन संभव नहीं है।

Nature’s Protector : हसदेव-तामनार में जारी कटाई को लेकर भी रोमशंकर यादव ने अपनी संस्था हितवा संगवारी के सदस्यों और पर्यावरण प्रेमियों के साथ मिलकर कई प्रदर्शन किए, रैलियां निकाली, करीब 700-800 लोगों की मानव श्रृखला बनाई, हस्ताक्षर अभियान चलाकर कलेक्टर को सौंपने के साथ-साथ कविता और गीत पाठ कर भी सोशल मीडिया के जरिए पेड़ों की कटाई का विरोध किया।