रायपुर। संविदा चिकित्सक को नियम विरुद्ध तरीके से संविलियन करने के बहुचर्चित मामले में हाईकोर्ट में दायर याचिका पर सुनवाई हो रही है। दरअसल वर्ष 2019 में तत्कालीन मुख्य सचिव सुनील कुजूर के कार्यकाल के दौरान उनकी पत्नी, चिकित्सा अधिकारी डॉ. स्वाती कुजूर, को स्वास्थ्य संचालनालय से चिकित्सा शिक्षा विभाग में संविलियन कर एसोसिएट प्रोफेसर बना दिया गया। इस मामले में सिम्स के लेक्चरर डॉ. प्रवीण श्रीवास्तव की तरफ से याचिका लगाई है।

क्या है मामला..?

याचिका में इस बात का उल्लेख है कि कि यह संविलियन संविदा नियुक्ति नियम 2012 के विपरीत था, क्योंकि नियमों में स्पष्ट रूप से संविदा पर कार्यरत व्यक्तियों के संविलियन का कोई प्रावधान ही नहीं है। इसके बावजूद मार्च 2019 में आदेश जारी कर दिया गया।

इस संविलियन के खिलाफ छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में लगी याचिका पर सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि ‘जब अन्य डॉक्टरों के संविलियन के आवेदन वर्षों से लंबित हैं, तो केवल एक ही डॉक्टर का संविलियन क्यों किया गया?’ कोर्ट ने सरकार और संबंधित विभागों से विस्तृत जवाब मांगा है।

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दस्तावेज बताते हैं कि कि डॉ. स्वाती कुजूर ने खुद ही संविलियन के लिए आवेदन किया था। वर्ष 2017 से लेकर वर्ष 2019 तक लगातार इस संबंध में स्वास्थ्य संचालनालय और चिकित्सा शिक्षा विभाग के बीच फाइल चली। सामान्य प्रशासन विभाग और छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग से भी इस संबंध में अभिमत मांगा गया।

तमाम आपत्तियों के बावजूद किया गया संविलियन

सामान्य प्रशासन विभाग ने यह कहते हुए पूरी फाइल वापस कर दी थी कि यह प्रक्रिया नियमों के विरुद्ध है। सामान्य प्रशासन ने इस संविलियन को संविदा नियुक्ति नियम 2012 के खिलाफ बताया था।

यही टीप छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग ने भी की थी। आयोग ने 8 मार्च 2019 के पत्र में साफ कहा था कि संविदा नियुक्ति नियम 2012 में संविलियन का कोई प्रावधान नहीं है, इसलिए सहमति नहीं दी जा सकती। फिर भी विभागीय स्तर पर नियम 2013 के नियम 6(4) का हवाला देते हुए मार्च 2019 में संविलियन कर दिया गया।

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कुजूर मुख्य सचिव बने और बन गया ‘काम’

बता दें कि उस समय मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के सामान्य प्रशासन विभाग और स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर ने इस आवेदन को नियमों में प्रावधान न होने की वजह से अस्वीकार कर दिया था, मगर जनवरी 2019 में सुनील कुजूर मुख्य सचिव बने और सिर्फ दो महीनों बाद 9 मार्च 2019 को संविलियन का आदेश जारी हुआ।

बताया जा रहा है कि 2007 से लेकर पिछले कई वर्षों में कई डॉक्टरों ने स्वास्थ्य सेवा से चिकित्सा शिक्षा विभाग में संविलियन के लिए आवेदन दिए, लेकिन उनमें से किसी का भी संविलियन नहीं किया गया। मामला अब इसलिए तूल पकड़ रहा है कि नियम न होने के बावजूद सिर्फ एक ही व्यक्ति को लाभ दिया गया, जबकि दर्जनों डॉक्टर अब भी प्रतीक्षा में हैं।

इस मामले में सिम्स के लेक्चरर डॉ. प्रवीण श्रीवास्तव की तरफ से याचिका लगाई है। अब हाईकोर्ट ने सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि संविदा नियुक्ति नियम 2012 में प्रावधान न होने के बावजूद संविलियन कैसे किया गया? PSC और GAD की असहमति के बावजूद आदेश किस आधार पर जारी किया गया? अन्य डॉक्टरों के लंबित मामलों पर अलग से विचार क्यों नहीं किया गया? अब देखना है कि सरकार इस मामले में क्या जवाब देती है और नियम विरुद्ध प्रक्रिया पर कोई कार्यवाही करती है या नहीं।

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