टीआरपी डेस्क। आज वसंत पंचमी का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस दिन विद्या, बुद्धि और कला की देवी मां सरस्वती की पूजा का विशेष महत्व होता है। वसंत पंचमी से ऋतु परिवर्तन की भी शुरुआत मानी जाती है और इसे ज्ञान, संगीत और शिक्षा से जुड़े कार्यों के लिए शुभ माना जाता है।
सरस्वती पूजा के लिए सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल पर पीले रंग का वस्त्र बिछाकर मां सरस्वती की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। इसके बाद देवी को अक्षत, फूल, पीले वस्त्र और माला अर्पित करें। धूप-दीप जलाकर सरस्वती वंदना और मंत्रों का जाप करें। विद्यार्थियों के लिए इस दिन पुस्तकों और लेखन सामग्री की पूजा का विशेष महत्व होता है।
मां सरस्वती को पीले रंग के भोग प्रिय हैं। पूजा में केसरिया या पीले चावल, बूंदी, खीर, हलवा, बेसन के लड्डू और पीले फल अर्पित किए जाते हैं। पूजा के बाद प्रसाद का वितरण किया जाता है।
वसंत पंचमी के अवसर पर कई स्थानों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम, संगीत और शैक्षणिक आयोजन भी होते हैं। यह पर्व ज्ञान, सृजन और सकारात्मक ऊर्जा का संदेश देता है।
सरस्वती पूजा विधि
- पूजा की शुरुआत मां सरस्वती को पुष्प, रोली, चंदन, अक्षत, धूप और दीप अर्पित करके की जाती है।
- देवी के चरणों में पुस्तक, कलम और वाद्य यंत्र रखकर प्रणाम किया जाता है।
- इसके बाद फल और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। पूजा के दौरान सरस्वती स्तोत्र का पाठ या मंत्र जाप किया जाता है।
पूजा में “ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः” या “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सरस्वत्यै नमः” मंत्र का जप विशेष फलदायी माना जाता है। - अंत में मां सरस्वती की आरती की जाती है, क्योंकि आरती के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है।
बसंत पंचमी पूजा सामग्री
- पूजा के लिए मां सरस्वती की मूर्ति या तस्वीर आवश्यक होती है, जिसमें देवी वीणा धारण किए हुए और हंस पर विराजमान हों।
- मूर्ति को जमीन पर न रखकर चौकी पर स्थापित किया जाता है और चौकी पर पीले रंग का कपड़ा बिछाया जाता है।
इसके साथ मिट्टी का कलश, उसमें जल, आम के पत्ते और नारियल रखा जाता है। - मौली, पीला चंदन, केसर, हल्दी में रंगे अक्षत, पीले फूल, धूप, अगरबत्ती और घी का दीपक पूजा में शामिल किए जाते हैं।
- भोग में बूंदी या बेसन के लड्डू, केसर-मेवे वाले मीठे चावल और बेर का विशेष महत्व होता है।
बसंत पंचमी की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, सृष्टि की रचना के बाद भगवान ब्रह्मा को चारों ओर मौन और शून्यता का अनुभव हुआ। उन्होंने भगवान विष्णु की सलाह से अपने कमंडल से जल छिड़का। उसी जल से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई, जो चतुर्भुजी देवी थीं। उनके हाथों में वीणा, पुस्तक, माला और वर मुद्रा थी। जब देवी ने वीणा का मधुर स्वर छेड़ा, तो पूरी सृष्टि में ध्वनि फैल गई और जीव-जंतुओं को वाणी प्राप्त हुई। तब ब्रह्मा जी ने देवी का नाम सरस्वती रखा। मान्यता है कि मां सरस्वती का प्राकट्य बसंत पंचमी के दिन हुआ था, इसलिए इस दिन को उनका जन्मोत्सव मानकर बसंत पंचमी मनाई जाती है।



