बिलासपुर। 26 जनवरी को जब पूरा देश 77वां गणतंत्र दिवस हर्षोल्लास के साथ मना रहा था, छत्तीसगढ़ की न्यायधानी कहे जाने वाले बिलासपुर स्थित एसईसीएल मुख्यालय के मुख्य गेट के सामने कोरबा-कुसमुंडा क्षेत्र के भूविस्थापित परिवारों के सदस्यों का रोजगार की मांग को लेकर आमरण अनशन जारी रहा। इस आंदोलन ने एक बार फिर एसईसीएल प्रबंधन की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
अनशन पर बैठे भूविस्थापितों ने बताया कि कुसमुंडा क्षेत्र में खनन परियोजनाओं के विस्तार के दौरान उनकी कृषि भूमि का अधिग्रहण किया गया था। भूमि जाने के बाद अब उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया। नियमानुसार प्रत्येक पात्र विस्थापित परिवार को रोजगार देने का प्रावधान है, लेकिन वर्षों बीत जाने के बावजूद अब तक उन्हें नौकरी नहीं दी गई है।
इनका आरोप है कि इस मामले में एक वर्ष पूर्व हाईकोर्ट, बिलासपुर द्वारा भी स्पष्ट आदेश जारी किया गया था, जिसमें पीड़ितों की समस्या का शीघ्र समाधान कर उन्हें नियमानुसार रोजगार देने के निर्देश दिए गए थे। बावजूद इसके एसईसीएल प्रबंधन द्वारा आदेश का पालन नहीं किया गया और पिछले एक वर्ष से प्रभावितों को कार्यालयों के चक्कर कटवाए जा रहे हैं। बार-बार आवेदन, ज्ञापन और मुलाकात के बाद भी उन्हें केवल आश्वासन ही मिला। अनशनकारियों ने कहा कि गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व के दिन वे अपने अधिकारों के लिए भूखे-प्यासे सड़क पर बैठे हैं, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

इनका आरोप है कि कुछ मामलों में नियमों को दरकिनार कर बाहरी लोगों को रोजगार दिया गया, जबकि वास्तविक भूविस्थापित आज भी बेरोजगार हैं। इन्होंने प्रशासन और एसईसीएल प्रबंधन से मांग की है कि हाईकोर्ट के आदेश का तत्काल पालन करते हुए सभी पात्र परिवारों को शीघ्र रोजगार प्रदान किया जाए।
रोजगार मिलने तक जारी रहेगा आमरण–अनशन
आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया है कि जब तक उनकी मांग पूरी नहीं होती, तब तक आमरण–अनशन जारी रहेगा, चाहे यह अनिश्चित काल तक ही क्यों न चले। अनशन स्थल पर लगातार लोगों का समर्थन प्रभावितों को मिल रहा है। इन सभी की निगाहें प्रशासन और एसईसीएल प्रबंधन की ओर टिकी हैं कि वे कब पीड़ितों की सुध लेते हैं और उनका संवैधानिक अधिकार दिलाते हैं।



