नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक चौंकाने वाला दावा करते हुए कहा है कि भारत रूस से तेल का आयात बंद करने पर सहमत हो गया है। हालांकि, भारत सरकार की ओर से इस बयान पर अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि या खंडन सामने नहीं आया है। ट्रंप के इस दावे के बाद भारत की विदेश नीति और रणनीतिक स्वायत्तता को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस छिड़ गई है।

रूस और भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार में पिछले कुछ वर्षों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है। वित्त वर्ष 2024-25 में यह व्यापार 68.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, जिसमें अकेले कच्चे तेल की हिस्सेदारी 52.73 अरब डॉलर थी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत पूरी तरह से तेल आयात बंद करता है, तो दोनों देशों का व्यापार गिरकर 20 अरब डॉलर से भी नीचे आ सकता है।

केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने पिछले महीने संकेत दिए थे कि रूस से तेल आयात में गिरावट जारी रह सकती है। उन्होंने स्पष्ट किया था कि भारत अपने तेल आपूर्तिकर्ताओं में विविधता ला रहा है। आंकड़ों के अनुसार, रूस से होने वाली आपूर्ति पहले ही 1.8 मिलियन बैरल प्रति दिन से घटकर 1.3 मिलियन बैरल प्रति दिन रह गई है। जहां भारत इसे बाजार की परिस्थितियों का परिणाम बता रहा है, वहीं ट्रंप इसे अपने दबाव की सफलता के रूप में पेश कर रहे हैं।

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विदेशी मामलों के जानकारों का कहना है कि ट्रंप का यह रुख भारत की विदेश नीति के लिए कड़ी चुनौती है। थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के मनोज जोशी के अनुसार, यदि भारत अमेरिकी दबाव में तेल आयात बंद करता है, तो इससे रूस के साथ संबंधों में खटास आ सकती है और भारत की वैश्विक साख पर सवाल उठेंगे।

दूसरी ओर, रक्षा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ऊर्जा के बाद ट्रंप का अगला निशाना भारत-रूस रक्षा साझेदारी हो सकती है। हालांकि भारत ने रूस पर अपनी सैन्य निर्भरता 82 प्रतिशत से घटाकर 36 प्रतिशत कर ली है, लेकिन एस-400 मिसाइल सिस्टम और परमाणु पनडुब्बी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अब भी रूस भारत का अहम साझेदार है। भारत के लिए असली चुनौती रूस को पूरी तरह चीन के पाले में जाने से रोकने और अमेरिका के साथ संतुलन बनाए रखने की होगी।