टीआरपी डेस्क। सुप्रीम कोर्ट में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की उस याचिका पर सुनवाई शुरू हो गई है, जिसमें राज्य में मतदाता सूचियों के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को चुनौती दी गई है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच इस मामले में चुनाव आयोग का जवाब सुन रही है।
यह मामला भारत के चुनावी लोकतंत्र और वोटर लिस्ट की शुद्धता से जुड़ा है। यदि मुख्यमंत्री के दावे सही पाए जाते हैं, तो यह करोड़ों मतदाताओं के मताधिकार पर असर डाल सकता है। साथ ही, एक सिटिंग सीएम का खुद कोर्ट में बहस करना देश के संवैधानिक इतिहास की एक दुर्लभ घटना है।
1.36 करोड़ वोटर्स पर संकट, माइक्रो-ऑब्जर्वर पर भी सवाल
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाते हुए 1.36 करोड़ से ज्यादा वोटर्स की लिस्ट में गड़बड़ी का मुद्दा उठाया है। उनका दावा है कि सरनेम की स्पेलिंग में गलती या शादी के बाद पता बदलने जैसे आधार पर सिस्टमैटिक ढंग से नाम हटाए जा रहे हैं। इसके अलावा, उन्होंने राज्य में तैनात 8,300 माइक्रो-ऑब्जर्वर की नियुक्ति को भी गैर-संवैधानिक बताया है, जिन्हें उन्होंने केंद्र सरकार का अधिकारी होने का दावा किया है।
सीएम की व्यक्तिगत पेशी पर उठा विवाद
इस मामले में एक नया मोड़ तब आया जब अखिल भारत हिंदू महासभा के पूर्व उपाध्यक्ष सतीश कुमार अग्रवाल ने हस्तक्षेप याचिका दायर की। याचिका में कहा गया है कि ममता बनर्जी का व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होना संवैधानिक रूप से अनुचित है, क्योंकि यह मामला व्यक्तिगत नहीं बल्कि राज्य शासन से जुड़ा है। गौरतलब है कि 4 फरवरी को ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट में बहस करने वाली पहली सेवारत मुख्यमंत्री बनी थीं।
सुप्रीम कोर्ट अब चुनाव आयोग के जवाब का विश्लेषण करेगा। कोर्ट को यह तय करना है कि क्या एसआईआर (SIR) की प्रक्रिया संवैधानिक नियमों के तहत हो रही है या इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश है।



