रायपुर। जंगली जानवरों के शिकार और वन अपराध की बढ़ती घटनाओं से चिंतित वन विभाग द्वारा वन अपराधियों के सामाजिक बहिष्कार का लिया गया निर्णय अंततः वापस ले लिया गया है। यह फैसला बीते 24 दिसंबर को आयोजित समीक्षा बैठक में लिया गया था, जिसकी अध्यक्षता पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ अरुण पाण्डेय ने की थी। बैठक में वन अपराधियों के खिलाफ सामाजिक स्तर पर कठोर संदेश देने की रणनीति पर सहमति बनी थी।

दरअसल वन विभाग के इस निर्णय की जमकर आलोचना हुई और वन्य जीव प्रेमी नितिन सिंघवी इस पर विरोध दर्शाते हुए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को पत्र भी लिखा था। जिसके बाद राज्य सरकार ने मामले को गंभीरता से लिया। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने वनबल प्रमुख वी. श्रीनिवास राव को पूरे प्रकरण की जांच के निर्देश दिए।

सूत्र इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि जांच के निर्देश जारी होने के बाद विभागीय स्तर पर पुनर्विचार किया गया और अंततः सामाजिक बहिष्कार संबंधी निर्णय को वापस लेने का फैसला किया गया। विभाग का मानना है कि वन अपराध नियंत्रण के लिए जागरूकता और सामाजिक भागीदारी अधिक प्रभावी उपाय साबित हो सकते हैं।

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सामाजिक बहिष्कार का क्या था मामला..?

समीक्षा बैठक में प्रस्तावित रणनीति के तहत, जिन क्षेत्रों में अवैध शिकार की घटनाएं अधिक हैं, वहां ग्राम स्तर पर विशेष कैंप आयोजित करने की योजना बनाई गई। इसमें गांव के मुखिया, धर्मगुरु, प्रतिष्ठित नागरिकों और समाजसेवी संस्थाओं के साथ बैठक कर अवैध शिकार से जुड़े फोटोग्राफ्स और तथ्यों के माध्यम से लोगों को जागरूक करने का विचार था। इसके साथ ही वन अपराधियों का सामाजिक तौर पर बहिष्कार का सुझाव भी दिया गया।

इस अभियान का उद्देश्य था कि समाज स्वयं अपराधियों के खिलाफ नैतिक दबाव बनाए और अपराध की प्रवृत्ति पर अंकुश लगे। प्रारंभिक चरण में कवर्धा वनमंडल और उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व क्षेत्र में इस मॉडल को लागू करने की योजना बनाई गई थी। साथ ही वन अधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्रों में संदिग्धों और अपराधियों की सूची संधारित करने के निर्देश दिए गए थे।

निर्णय की वापसी के बाद वन विभाग ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है। अब विभागीय अधिकारी समाज प्रमुखों, धर्मगुरुओं और स्थानीय समुदायों के माध्यम से ‘सामाजिक चेतना’ जागृत करने पर जोर देंगे।

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नई योजना के तहत, ग्रामीण और वन क्षेत्रों में जनजागरूकता अभियान चलाए जाएंगे, जिनमें लोगों से अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप वन्यजीवों और पर्यावरण की रक्षा करने की अपील की जाएगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि वन अपराधों पर नियंत्रण के लिए कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ सामाजिक सहयोग और जागरूकता भी आवश्यक है। सामाजिक बहिष्कार जैसे कदम संवेदनशील मुद्दे बन सकते हैं, इसलिए जागरूकता-आधारित मॉडल अधिक व्यावहारिक और स्वीकार्य विकल्प माना जा रहा है।