टीआरपी डेस्क। वर्ष 2013 से कोमा की स्थिति में बिस्तर पर पड़े हरीश राणा का मामला देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या उन्हें अंततः ‘पैसिव यूथनेशिया’ ( इच्छामृत्यु) के जरिए राहत दी जा सकती है।
कितना समय लगेगा? विशेषज्ञों की राय
एम्स (AIIMS) के पूर्व निदेशक डॉ. एम.सी. मिश्रा का इस मामले पर स्पष्ट मत है। उनके अनुसार, किसी मरीज की मौत में कितना समय लगेगा, यह पूरी तरह से उसके शरीर के अंगों (Organ Functions) पर निर्भर करता है। हालांकि, हरीश के कई अंग अभी भी मशीन या दवाओं के सहारे काम कर रहे हैं, ऐसे में समय बताना मुश्किल है। डॉ. मिश्रा का कहना है कि, जब तक शरीर के महत्वपूर्ण अंगों का कार्य रुकता नहीं है, तब तक मृत्यु की निश्चित अवधि तय नहीं की जा सकती। राहत की बात यह है कि मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, हरीश को फिलहाल दर्द महसूस नहीं हो रहा है, क्योंकि कोमा में चेतना का स्तर बेहद कम होता है।
इच्छामृत्यु की प्रक्रिया और कानूनी बाधाएं
भारत में इच्छामृत्यु का रास्ता बहुत कठिन है। इसके लिए केवल परिवार की इच्छा काफी नहीं है, बल्कि कानूनी और मेडिकल बोर्ड की मंजूरी अनिवार्य है। डॉक्टरों का एक पैनल यह प्रमाणित करता है कि मरीज का रिकवर होना असंभव है। सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार, लिविंग विल (Living Will) या परिवार की याचिका पर कोर्ट सुनवाई करता है। प्रक्रिया को तेज करने के लिए परिवार को मेडिकल बोर्ड की ठोस रिपोर्ट के साथ हाई कोर्ट में याचिका दायर करनी होती है।
क्या है ‘पैलिएटिव केयर’? (Palliative Care)
इसे उपशामक देखभाल भी कहते हैं। यह उन मरीजों के लिए है जिनका इलाज संभव नहीं है। इसका मुख्य उद्देश्य मरीज को दर्द से मुक्त रखना और जीवन के अंतिम दिनों को गरिमापूर्ण (Dignified) बनाना है। इसमें मरीज को असहनीय कष्ट से बचाने के लिए उन उपचारों को हटाने (Withdrawal of treatment) की अनुमति दी जा सकती है जो केवल जीवन को कृत्रिम रूप से खींच रहे हैं।


