Vijay TVK: तमिलनाडु में सरकार बनाने का सस्पेंस अब थ्रिलर फिल्म जैसा होता जा रहा है। सुपरस्टार विजय यानी थलापति विजय की सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने की राह में खुद राज्यपाल रोड़ा बनकर खड़े हो गए हैं। पिछले 48 घंटों में विजय ने दो बार राजभवन (लोकभवन) के चक्कर काटे, लेकिन दोनों बार उन्हें खाली हाथ वापस लौटना पड़ा है। चेन्नई के गलियारों में अब यह चर्चा आम हो गई है कि क्या थलापति विजय और राज्यपाल के बीच की यह जंग अब मद्रास हाईकोर्ट की चौखट तक पहुंचेगी?

राजभवन में दो दिन, दो मुलाकातें और विजय की खाली झोली

बुधवार के बाद गुरुवार को भी एक्टर विजय राजभवन पहुंचे। राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर के साथ करीब आधे घंटे की बैठक हुई। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, विजय ने राज्यपाल के सामने तर्क दिया कि वे सदन में बहुमत साबित करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं और सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते उन्हें मौका मिलना चाहिए। लेकिन, राज्यपाल ने दो-टूक शब्दों में कह दिया है कि दावा नहीं, पहले नंबर दिखाओ। राज्यपाल पहले उन 118 विधायकों के हस्ताक्षर (Sign) देखना चाहते हैं, जो विजय की सरकार के समर्थन में हैं।

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विजय का मास्टरस्ट्रोक, बिना बहुमत के पहले भी बनी हैं सरकारें

मुलाकात के दौरान टीवीके चीफ विजय ने कानूनी सलाह का हवाला देते हुए राज्यपाल से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की। टीवीके की ओर से दलील दी गई कि भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कई बार ऐसा हुआ है जब बिना स्पष्ट बहुमत वाली सबसे बड़ी पार्टी को पहले सरकार बनाने का न्योता दिया गया। हालांकि, राज्यपाल अब भी इस बात पर अड़े हैं कि वे किसी अस्थिर सरकार’ को शपथ नहीं दिला सकते।

नंबर गेम का गणित: 5 विधायकों पर फंसा पेंच

तमिलनाडु के सियासी आंकड़ों को देखें तो मामला काफी दिलचस्प है:

  • कुल सीटें: 234
  • बहुमत का आंकड़ा: 118
  • टीवीके (विजय): 108 सीटें
  • कांग्रेस का साथ: 05 सीटें
  • कुल जोड़: 113 सीटें

अब विजय को जादुई आंकड़े तक पहुंचने के लिए 5 और विधायकों की जरूरत है। राज्यपाल इसी 5 के फेर में विजय को हरी झंडी नहीं दिखा रहे हैं।

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क्या अब मद्रास हाईकोर्ट जाएंगे थलापति विजय?

सूत्रों का कहना है कि अगर शुक्रवार तक राजभवन से कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिलता है, तो टीवीके की लीगल टीम मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दायर करने की तैयारी कर चुकी है। विजय खेमे का मानना है कि सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते संवैधानिक रूप से पहला मौका उन्हें मिलना चाहिए। अब देखना होगा कि चेन्नई की सड़कों पर जश्न मनेगा या मामला कोर्ट की तारीखों में उलझेगा।