रायपुर। दुर्ग विश्वविद्यालय के कुलसचिव भूपेंद्र कुलदीप की PhD डिग्री को लेकर विवाद अब और गहरा गया है। स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) की शिकायत के बाद निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग ने मामले में हस्तक्षेप करते हुए तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन कर दिया है। आयोग ने शिकायतकर्ताओं को सभी दस्तावेजों के साथ उपस्थित होने का निर्देश दिया है। लेकिन इस जांच प्रक्रिया को लेकर SFI ने ही गंभीर आपत्ति जता दी है और इसे भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की कोशिश करार दिया है।

डिग्री देने वाले विश्वविद्यालय पर उठा सवाल

SFI के रायपुर जिला अध्यक्ष गर्व गभने, जिला सचिव हर्ष संघाणी और गौरव गुप्ता ने संयुक्त बयान में कहा है कि इस पूरे मामले में विनियामक आयोग खुद एक पक्ष है, इसलिए उसकी निष्पक्षता पर सवाल है। संगठन का मुख्य आरोप भारती विश्वविद्यालय को PhD डिग्री देने की जल्दबाजी में मिली अनुमति पर है। SFI का कहना है कि सामान्य नियमों के तहत किसी भी विश्वविद्यालय को स्थापना के बाद पहली डिग्री जारी करने के लिए कम से कम तीन वर्ष का समय लगता है, ताकि जरूरी अकादमिक ढांचा, शोध अवसंरचना और संकाय क्षमता विकसित हो सके। लेकिन भारती विश्वविद्यालय की स्थापना 2021 में हुई और महज एक वर्ष के भीतर ही उसे PhD पाठ्यक्रम संचालन की अनुमति दे दी गई। संगठन ने पूछा है कि आखिर किन नियमों के तहत स्थापना के साथ ही PhD कार्यक्रम शुरू करने की मंजूरी दी गई।

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जांच की प्रक्रिया पर आपत्ति

SFI ने जांच प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। संगठन का आरोप है कि आयोग ने आरोपी कुलसचिव भूपेंद्र कुलदीप को मूल दस्तावेजों के साथ पेश होने के लिए नहीं कहा, बल्कि शिकायतकर्ताओं से ही सभी प्रमाण और दस्तावेज मांग लिए गए। SFI के मुताबिक जिन बिंदुओं पर शिकायत की गई है, उनकी जांच ही नहीं की जा रही है।

पीएचडी सुपरवाइजर को कैसे मिली मान्यता..?

संगठन ने भूपेंद्र कुलदीप की PhD को लेकर कई तकनीकी और कानूनी सवाल खड़े किए हैं। SFI का कहना है कि कुलदीप की PhD सुपरवाइजर लुमेश्वरी साहू उस समय स्वयं पीएचडी शोधार्थी थीं और उनके पास यूजीसी के नियमों के तहत नियमित PhD गाइड बनने की आवश्यक योग्यता नहीं थी। इसके बावजूद उन्हें सुपरवाइजर की मान्यता कैसे मिल गई, यह जांच का विषय है।

इसके अलावा SFI ने यह भी पूछा है कि भूपेंद्र कुलदीप एक शासकीय कर्मचारी थे, तो क्या उन्होंने PhD करने के लिए शासन से पूर्व अनुमति ली थी। क्या उन्होंने यूजीसी के नियमों के तहत अनिवार्य कोर्सवर्क पूरा किया था, आवश्यक शोध पत्र प्रकाशित किए थे और न्यूनतम शोध अवधि संबंधी नियमों का पालन किया था।

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सबसे बड़ा विरोधाभास तारीखों को लेकर सामने आया है। SFI के अनुसार भूपेंद्र कुलदीप ने PhD करने की अनुमति के लिए आवेदन 2019 में किया था, जबकि उस समय भारती विश्वविद्यालय अस्तित्व में ही नहीं था। वहीं दूसरी तरफ उच्च शिक्षा विभाग द्वारा अनुमति पत्र 19 अक्टूबर 2022 को जारी किया गया, लेकिन कुलदीप का PhD पंजीयन उससे पहले 1 अक्टूबर 2022 को ही हो चुका था। SFI ने इसे यूजीसी नियमों और विनियम 13(2) का सीधा उल्लंघन बताया है।

‘फर्जी जांच का हिस्सा नहीं बनेगी एसएफआई’अपना विरोध दर्ज कराते हुए SFI ने कहा है कि वह इस ‘फर्जी जांच’ का हिस्सा नहीं बनेगी। संगठन ने स्पष्ट किया है कि जब तक विनियामक आयोग भारती विश्वविद्यालय के PhD अधिनियम और नियम सार्वजनिक नहीं करता, तब तक वह जांच समिति के सामने उपस्थित नहीं होगा। SFI का आरोप है कि आयोग अपनी साख बचाने के लिए मामले की लीपापोती कर रहा है और भ्रष्टाचार में शामिल लोगों को बचा रहा है। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि निष्पक्ष जांच नहीं हुई और जांच के बिंदु स्पष्ट नहीं किए गए, तो वह निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग के खिलाफ उग्र आंदोलन करेगा।

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