Nautapa 2026: देशभर में इस समय सूरज की तपिश अपने चरम पर है। उत्तर भारत से लेकर दिल्ली-एनसीआर तक लोग भीषण गर्मी और लू (Heatwave) के थपेड़ों से बेहाल हैं। इसी बीच, कल यानी 25 मई से नौतपा की शुरुआत हो रही है, जो 3 जून तक चलेगी। इन 9 दिनों को साल का सबसे गर्म समय माना जाता है।

एक तरफ शहरी लोग इस गर्मी से बचने के उपाय ढूंढ रहे हैं, वहीं ग्रामीण इलाकों और किसानों के लिए इस नौतपा का तपना बेहद जरूरी माना जाता है? आइए समझते हैं इसके पीछे का पूरा गणित और विज्ञान।

क्या होता है नौतपा और क्यों बढ़ती है इतनी गर्मी?

खगोलीय और ज्योतिषीय गणना के अनुसार, जब सूर्यदेव रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करते हैं, तो पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी कम हो जाती है। इस दौरान सूर्य की किरणें सीधे धरती पर पड़ती हैं। मौसम विभाग (IMD) के मुताबिक, इन 9 दिनों में देश के कई राज्यों में पारा 42 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। दिल्ली, यूपी, राजस्थान और बिहार समेत कई राज्यों में हीटवेव का रेड और ऑरेंज अलर्ट जारी किया जा चुका है।

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जितनी तपन, उतनी बरखा सुखद, खेती से क्या है कनैक्शन?

ग्रामीण भारत में नौतपा को लेकर एक मशहूर कहावत है नौतपा में जितनी तपन, उतनी बरखा सुखद। सदियों से किसानों का यह अटूट विश्वास रहा है कि मई-जून के ये 9 दिन जितने ज्यादा गर्म होंगे, आने वाला मानसून उतना ही झमाझम बरसेगा।

इसके पीछे एक वैज्ञानिक तर्क भी काम करता है। जब मैदानी इलाकों में भीषण गर्मी पड़ती है, तो वहां लो प्रेशर एरिया (कम दबाव का क्षेत्र) बनता है। यह तीव्र कम दबाव समुद्र की ओर से आने वाली नमी युक्त मानसूनी हवाओं को अपनी तरफ तेजी से खींचता है, जिससे अच्छी बारिश होती है।

…अगर नौतपा नहीं तपा, तो क्या वाकई जलजला आएगा?

बुजुर्गों का कहना है कि अगर नौतपा के दिनों में बारिश हो जाए या मौसम ठंडा हो जाए, तो इसे शुभ नहीं माना जाता। इसे ग्रामीण भाषा में नौतपा का गलना भी कहते हैं। परंपराओं के अनुसार, अगर नौतपा ठीक से नहीं तपा तो आगे चलकर जलजला यानी प्राकृतिक आपदाएं या बेमौसम भारी बारिश खेती को तबाह कर सकती है। इसके वैज्ञानिक और व्यावहारिक पहलू भी हैं। भीषण गर्मी के कारण खेतों की मिट्टी तपती है, जिससे फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले बैक्टीरिया, कीड़े और टिड्डियों के अंडे स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं। अगर इन दिनों लू नहीं चली और मौसम ठंडा रहा, तो खेतों में चूहों और नुकसानदेह जीवों की तादाद बढ़ जाती है, जो बाद में नई फसल को चट कर जाते हैं।

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क्लाइमेट चेंज ने बदला ट्रेंड

हालांकि, जहां एक तरफ पारंपरिक मान्यताएं और विज्ञान का एक हिस्सा नौतपा की गर्मी को जरूरी मानता है, वहीं आधुनिक मौसम वैज्ञानिकों का नजरिया थोड़ा अलग है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) के इस दौर में अब नौतपा के आधार पर मानसून का सटीक अनुमान लगाना सही नहीं है। अल-नीनो और ला-नीना जैसे वैश्विक कारकों के कारण अब मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है।

बहरहाल, मौसम चाहे जो करवट ले, लेकिन अगले 9 दिन देश के एक बड़े हिस्से के लिए परीक्षा की घड़ी होने वाले हैं। ऐसे में खुद को हाइड्रेटेड रखें और दोपहर के समय सीधे धूप में निकलने से बचें।