भोपाल। उर्दू शायरी और अदब की दुनिया से एक बेहद दुखद खबर सामने आई है। देश के सबसे पसंदीदा और मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र का आज गुरुवार दोपहर भोपाल (Bhopal MP) में निधन हो गया। उन्होंने 91 साल की उम्र में अपने घर पर अंतिम सांस ली। डॉ. बशीर बद्र पिछले लंबे समय से भूलने की बीमारी (Dementia Disease) से जूझ रहे थे। उनकी याददाश्त इतनी कमजोर हो चुकी थी कि वे अपने करीबियों को भी नहीं पहचान पा रहे थे। आज दोपहर करीब 12 बजे उन्होंने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।
मोहब्बत और टूटे दिलों की जुबान थे बशीर
बशीर बद्र उन चुनिंदा शायरों में से थे, जिनकी गजलें और शेर सिर्फ मुशायरों के मंच तक सीमित नहीं रहे। उनकी लिखी पंक्तियां आम लोगों की डायरियों, मोहब्बत के खतों और सोशल मीडिया के दौर में वॉट्सऐप स्टेटस (WhatsApp Status Lines) की जान बन गईं। बशीर साहब मुश्किल उर्दू शब्दों के बजाय बहुत आसान भाषा में लिखते थे, जो सीधे लोगों के दिलों को छू जाती थी।
उनकी लिखी यह लाइन तो हर दौर में अमर रहेगी:
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए…
संघर्ष और इश्क को दी खूबसूरत आवाज
उन्होंने मोहब्बत को कभी मुश्किल नहीं बताया, बल्कि उसे इतना आसान कर दिया कि पढ़ने वाले के चेहरे पर मुस्कान आ जाए। उन्होंने इश्क की गहराई को बयां करते हुए लिखा था
सर से पा तक वो गुलाबों का शजर लगता है,
और फिर अगली ही पंक्ति में वह लिखते हैं:
मैं तेरे साथ सितारों से गुजर सकता हूं,
कितना आसान मोहब्बत का सफर लगता है…
बशीर बद्र सिर्फ इश्क के नहीं, बल्कि जिंदगी के संघर्ष और हिम्मत के भी शायर थे। उनका एक और शेर आज भी लाखों टूटते हौसलों को ताकत देता है
मुझे मालूम है उसका ठिकाना फिर कहां होगा,
परिंदा आसमां छूने में जब नाकाम हो जाए…”
उनके निधन की खबर मिलते ही साहित्य जगत और उनके लाखों फैंस के बीच शोक की लहर दौड़ गई है। भोपाल स्थित उनके निवास पर उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लग गया है।


