बिलासपुर/रायपुर। छत्तीसगढ़ में फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनाना इतना आसान हो गया है कि स्कूली रिकॉर्ड में सफेदा लगाकर फर्जी बैगा जनजाति का प्रमाण पत्र बनवा लिया जाता है और इसका फायदा उठाकर सरकारी नौकरी कर रहे हैं। बिलासपुर जिले के कोटा और मस्तूरी ब्लाक में फर्जी तरीके से विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा का जाति प्रमाण पत्र बनवा कर 70 से अधिक लोगों ने नौकरी हासिल कर ली है। साथ ही 250 से अधिक फर्जी प्रमाण पत्र बनवा लिए गए हैं। खास बात है कि स्कूल में सफेदा लगाकर ढीमर को बैगा अंकित किया जा रहा है और नए एडमिशन मे बैगा जाति अंकित कराया जा रहा है। इनके राजस्व अभिलेख, स्कूल रिकॉर्ड, दाखिल-खारिज और निर्वाचन कागजातों में ढीमर ओबीसी जाति है। कई मामलों में पिता की जाति ढीमर है, जबकि बेटे का प्रमाण पत्र बैगा के नाम पर जारी हुआ है। कुछ शिकायतों में पत्नी एसटी और पति ओबीसी दर्ज होने जैसी विसंगतियां भी हैं। खास – बात कि जितना भी जाति प्रमाण पत्र बना है वह सब 2015 के पहले का है और निवास – बिलासपुर के इमलीपारा का लिखा गया है जबकि सभी लोग ग्राम पोड़ी, थाना सीपत, तहसील मस्तूरी के मूल निवासी है।
कैसे हुआ फर्जीवाड़ा
दरअसल स्कूल रिकॉर्ड में छेड़छाड़ करते हुए दाखिले के समय या पुराने रिकॉर्ड में सफेदा लगाकर ढीमर को ‘बैगा’ लिख दिया गया। बता दें कि ढीमर मूलतः केंवट जाति के हैं। मजे की बात यह है कि कई लोग ग्राम पोंडी, सीपत तहसील मस्तूरी के निवासी हैं, पर सर्टिफिकेट SDM पेंड्रारोड और पहले SDM बिलासपुर से जारी कराए गए। नियमतः मस्तूरी SDM से बनना था। ज्यादातर प्रमाण पत्र अस्थायी बनाए गए, जिन पर फर्जी सील और साइन किए गए। अधिकारियों से मिलीभगत कर ग्राम पंचायत से प्रस्ताव पास कराकर सर्टिफिकेट बनवाए गए।
ये हैं चौंकाने वाले तथ्य
– पिता की जाति ढीमर, बेटे का सर्टिफिकेट बैगा ST के नाम पर।
– पत्नी ST, पति OBC – ऐसी विसंगतियां भी मिलीं।
– 2015 से पहले के सारे सर्टिफिकेट में पता इमलीपारा, बिलासपुर लिखा, जबकि सब ग्राम पोड़ी, मस्तूरी के निवासी।
– रिश्तेदारों- ससुराल, दामाद, बहू-बेटी पक्ष ने भी फर्जी बैगा सर्टिफिकेट बनवा लिए।
– 2023 में सहायक शिक्षक के 55 पदों पर भर्ती में भी फर्जी सर्टिफिकेट का इस्तेमाल।
समाज के मुखिया हैं मास्टरमाइंड
बताया जा रहा है कि इस पूरे रैकेट का मास्टरमाइंड ढीमर याने केवट समाज का ही एक अध्यक्ष और सचिव है। ये लोग रिश्तेदारों को भी बैगा लिखवाकर नौकरी दिलाने का लालच दे रहे हैं। फर्जी बैगा बनकर कई लोग शिक्षाकर्मी, पटवारी, डॉक्टर, पुलिस में नौकरी कर रहे हैं।
खास बात यह है कि ग्राम पोंडी का मामला सीपत तहसील मस्तूरी विकासखंड जिला बिलासपुर के अंतर्गत आता है। जाति प्रमाण पत्र अनुविभागीय अधिकारी राजस्व मस्तूरी से जारी होना चाहिए लेकिन गड़बड़ी करते हुए समस्त फर्जी जाति प्रमाण पत्र वर्तमान मैकार्यालय अनुविभागीय अधिकारी रा. पेंड्रारोड, और पहले कार्यालय अनुविभागीय अधिकारी रा. बिलासपुर से जारी हुआ है। यही नहीं ग्राम पोंडी के अलावा आसपास सीपत तथा रतनपुर क्षेत्र में इनके रिश्तेदारों (ससुराल पक्ष, भांजा पक्ष, दामाद पक्ष, बहु-बेटी पक्ष) के द्वारा भी अपने नाम में बैगा लिखकर फर्जी बैगा जाति प्रमाण पत्र बनवा लिया गया है।
राष्ट्रीय अजा आयोग के आदेश के बाद जागा प्रशासन
बिलासपुर जिले का राजस्व अमला वैसे भी फर्जीवाड़े के नाम पर मशहूर है। यहां एक ओर जमीनों का फर्जीवाड़ा होता रहा, तो दूसरी ओर फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनाने का भी खेल चलता रहा। बीते कई सालों से यहां फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनाने की शिकायत होती रही मगर प्रशासन ने कोई भी ध्यान नहीं दिया। यह मामला तब प्रकाश में आया जब राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने राज्य शासन को आदेश दिया कि बैगा आदिवासियों के मामले की जांच की जाए। पिछले दिनों राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति की बैठक में इस पर चर्चा हुई और बिलासपुर जिला प्रशासन को मामले की जांच के लिए लिखा गया। अब जाकर जिला प्रशासन ने इसकी जांच शुरू की है।

बैगा जनजाति का सच
छत्तीसगढ़ में बैगा विशेष संरक्षित जनजातियों में दर्ज है। अनेक सरकारी पदों में इनकी सीधी भर्ती का प्रावधान है। 2011 की जनगणना के मुताबिक छत्तीसगढ़ में बैगा आबादी सिर्फ 89,744 है और ये कुछ ही जिलों में हैं। 2015-16 के सर्वे और विधानसभा में आदिमजाति मंत्री ने भी माना कि मस्तूरी क्षेत्र में बैगा समुदाय नहीं रहता। 1949 के बाद ढीमर समुदाय का बैगा लिखना संदिग्ध माना गया है।
दूसरे आदिवासी भी बन गए ‘बैगा जनजाति’ के
बताया जा रहा है कि गोंड़ / भूमिया/उरांव जाति के लोगो के द्वारा भी फर्जी तरीके से विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा का जाति प्रमाण पत्र बनवा कर दर्जनों लोगों ने नौकरी हासिल कर ली है। इसमें से अधिकांश शिक्षाकर्मी बन गए हैं।
प्रशासन क्या कह रहा है
बिलासपुर संभागायुक्त सुनील कुमार जैन ने कहा कि शिकायत मिली है। संबंधित विभागों को पत्र भेज दिया गया है। जांच के बाद नियमानुसार कार्रवाई होगी।

SIT या CBI जांच की मांग
इस मामले में राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग ने SIT या CBI जांच की मांग की है। आयोग का कहना है कि ग्राम पोड़ी के लोग इन्हें जानते तक नहीं। 1929-30 के मिशल अभिलेख से मिलान पर असली जाति सामने आ जाएगी। आशंका है कि भविष्य में आदिवासी जमीन की खरीद-फरोख्त के लिए भी फर्जीवाड़ा हो रहा है।
किन गांवों में सबसे ज्यादा मामले
कोटा, बेलगहना तहसील के बहेरामुड़ा, लुफा, दालसागर, बासाझाल, अखराडॉड, लठौरी, चॉटीड़ॉड, करहीकछार, छुईहा, चूनाखोदरा, लमनाझार, खसरियापारा, गोंड़पारा, टांटीधार, चिखलाडबरी, खैरझिटी, बानाबेल, उपका, बैगापारा, मझगाँव, औरापानी, कोरीपारा, सौंतापारा, करवा, पहन्दा, दवनपुर, बारीडीह आदि में फर्जी बैगा सर्टिफिकेट का खेल चला।



