अंबिकापुर/धनबाद। झारखंड का वासेपुर एक ऐसा नाम जहां कभी गोलियों की गूंज और गैंगवार की दहशत आम बात थी। ढाई दशक पहले इसी वासेपुर की सड़कों पर शुरू हुई खूनी दुश्मनी ने कई जिंदगियां निगल ली। अब उसी खूनी इतिहास का एक भगोड़ा किरदार फिर चर्चा में है। डॉन फहीम खान की मां नजमा खातून और मौसी शहनाज खातून की दिनदहाड़े हत्या का दोषी साबीर आलम उर्फ शब्बीर अलम, जो वर्षों से कानून की आंखों में धूल झोंक रहा था। उसके छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में छिपे होने की सूचना पर धनबाद पुलिस ने दबिश दी। लेकिन पुलिस के पहुंचने से पहले ही साबीर फिर एक बार अंधेरे का फायदा उठाकर फरार हो गया। बीते 13 वर्षों से छिपकर रह रहे साबीर ने सरगुजा में करोड़ों का साम्राज्य खड़ा कर लिया था।

झारखंड के वासेपुर का कुख्यात गैंगस्टर साबीर आलम (60) पिछले 13 साल से अपने सहयोगी जावेद के साथ अंबिकापुर में छिपकर रह रहा था। इस दौरान उसने एक स्थानीय बस संचालक बैदुल खान (57) के साथ पार्टनरशिप कर बसों और 40 से ज्यादा एम्बुलेंस का कारोबार खड़ा किया। करोड़ों रुपए का नेटवर्क बनाने के साथ उसने अंबिकापुर में आलीशान मकान भी बनवा लिया।
फरार साबीर के पार्टनर के खिलाफ मामला दर्ज
इधर इस मामले में सरगुजा पुलिस ने फरार गैंगस्टर साबीर के सहयोगी और उसके कारोबारी पार्टनर बस संचालक बैदुल खान (57) के खिलाफ कोतवाली थाने में FIR दर्ज की है। आरोप है कि बैदुल खान ने साबीर के भगोड़ा होने की जानकारी होने के बावजूद उसे पनाह दी और कारोबार में साथ दिया। एसपी अमोलक सिंह ने बताया कि बैदुल खान और अन्य सहयोगियों की तलाश जारी है।

यात्री बसों का कर रहा था संचालन
अंबिकापुर में छिपे साबीर आलम के तार धनबाद के क्रिमिनल सिंडिकेट से पूरी तरह जुड़े हुए थे। बताया जाता है कि वहां से रंगदारी और वसूली का मोटा पैसा लगातार इन आरोपियों तक पहुंचता था। साबीर आलम अपने पार्टनर बैदुल के साथ मिलकर राजहंश बस सर्विस का संचालन कर रहा था। इसके अलावा इन्होंने राजहंस कंपनी की 2 बसें भी खरीदी, जिन्हें सासाराम और बिहार पटना रूट पर चलाई जा रही थी।

एम्बुलेंस और रियल एस्टेट में भी लगाया पैसा
बताया गया है कि, गैंगस्टर के सिंडिकेट की SECL सहित अन्य औद्योगिक इलाके में लगभग 40 एंबुलेंस चल रही थी। इसके साथ ही साबीर और उसके सहयोगी जावेद आलम उर्फ बाबू ने अंबिकापुर के खरसिया नाका के आसपास जमीन खरीदकर प्लॉटिंग का काम भी शुरू कर दिया था। धनबाद पुलिस की दबिश के बाद इस पूरे नेटवर्क की परतें खुलनी शुरू हो गई हैं।
अब पुलिस गैंगस्टर के आर्थिक नेटवर्क, संपत्तियों और उसे संरक्षण देने वाले लोगों की भूमिका की जांच कर रही है। बता दें कि वासेपुर के खूनी गैंगवार पर आधारित फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ भी बन चुकी है। साबीर के पता लगने और उसके फरार होने की खबर ने वासेपुर के लोगों की पुरानी यादें ताजा कर दी है।
जब गोलियों से दहल उठा था धनबाद
18 अक्टूबर 2001 की वह सुबह आज भी धनबाद के लोगों को सिहरन देती है। फहीम खान की मां नजमा खातून और मौसी शहनाज खातून पुराना बाजार जा रही थीं। जैसे ही वे डायमंड क्रॉसिंग के पास पहुंचीं। घात लगाए हमलावरों ने ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दीं। कुछ ही सेकंड में सड़क खून से लाल हो गई और दोनों महिलाओं की मौके पर ही मौत हो गई।
इस सनसनीखेज डबल मर्डर केस में साबीर आलम, उसके भाई शाहीद समेत सात लोगों को आरोपी बनाया गया था।

साबीर गिरफ्तार हुआ और फिर कोर्ट से भी फरार हो गया
हत्या के बाद साबीर वर्षों तक फरार रहा। पुलिस ने कड़ी मशक्कत के बाद वर्ष 2013 में उसे गिरफ्तार कर लिया, लेकिन अदालत में पेशी के दौरान वह पुलिस को चकमा देकर फरार हो गया। तभी से वह कानून के शिकंजे से बाहर है। हालांकि वर्ष 2018 में धनबाद कोर्ट ने साबीर, उसके भाई शाहीद समेत सभी सात दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। लेकिन फैसला आने के बाद भी साबीर गिरफ्त से दूर ही रहा।
छत्तीसगढ़ में बदली पहचान, पुलिस पहुंची तो मच गई हलचल
हाल ही में धनबाद पुलिस को इनपुट मिला कि साबीर छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर स्थित सरगुजा जिले के मोमिनपुर इलाके में नई पहचान के साथ रह रहा है। सूचना मिलते ही पुलिस की टीम सादे कपड़ों में वहां पहुंची। दबिश के दौरान स्थानीय लोगों के विरोध का भी सामना करना पड़ा। इसी बीच पुलिस के आने की भनक साबीर को लग गई और वह फिर फरार हो गया। इसके बाद सरगुजा पुलिस ने पूरे इलाके में नाकाबंदी कर दी, लेकिन इस बार भी वह पुलिस के हाथ नहीं लगा।
कोयला स्क्रैप और रंगदारी! इसी से शुरू हुई थी खूनी जंग
फहीम खान और साबीर आलम की दुश्मनी किसी निजी विवाद की नहीं, बल्कि वर्चस्व की लड़ाई थी। कोयला, स्क्रैप, एजेंटी और रंगदारी के अवैध कारोबार पर कब्जे को लेकर दोनों गैंग आमने-सामने आ गए थे। यह संघर्ष इतना खूनी हुआ कि दोनों पक्षों के कई लोगों की जान चली गई। फहीम की मां और मौसी की हत्या उसी गैंगवार का सबसे चर्चित और सनसनीखेज अध्याय बन गई।

जानिए साबीर के दुश्मन गैंगस्टर फहीम खान के बारे में
गैंग्स ऑफ वासेपुर की असली कहानी का गैंगस्टर है फहीम खान जो झारखंड के बहुचर्चित रेलवे ठेकेदार धीरेंद्र सिंह हत्याकांड मामले में आरोपी था। हालांकि पिछले साल ही फहीम खान को अदालत ने बरी कर दिया, जिसके बाद वह जेल से बाहर आ चुका है।
पहले दोस्त थे साबीर और फहीम
फहीम और साबीर पहले दोस्त थे। 1980 के दशक में धनबाद रेलवे का बड़ा स्टेशन होने के कारण यहां लोही तस्करी और स्क्रैप का धंधा तेजी से फलने फूलने लगा। इस धंधे को लेकर ही फहीम खान और और साबीर में ठन गयी थी। इसके बाद कोयला व्यापारियों से रंगदारी वसूलने का धंधा शुरू हो गया।

फहीम खान (बाएं) और साबीर आलम (दाएं)
फहीम के बाद उसके बेटे इकबाल ने गैंग संभाली
फहीम खान के जेल जाने के बाद उसके बेटे इकबाल खान ने गैंग की कमान संभाली। फहीम खान का भांजा प्रिंस खान इकबाल का सहायक बन गया। दोनों मिल कर गैंग चलाने लगे। रंगदारी से बेहिसाब पैसा आने लगा। बाद में पैसा और वर्चस्व को लेकर इकबाल खान और प्रिंस खान में दुश्मनी हो गयी। अब भांजा प्रिंस खान ही अपने मामा फहीम खान का सबसे बड़ा दुश्मन बन बैठा है। धनबाद में आज भी कोयला, जमीन और रियल एस्टेट के कारोबारियों से बड़े पैमाने पर रंगदारी वसूली जाती है। दुश्मनी के बाद अलग हुए साबीर आलम पर फहीम की मां नजमा खातून और मौसी शहनाज की हत्या का आरोप है।
धनबाद का बाहरी मोहल्ला है वासेपुर..!
वासेपुर दरअसल धनबाद शहर का बाहरी इलाका है। अब यह धनबाद के एक मुहल्ले के रूप में आबाद है। धनबाद मुख्य शहर से इसकी दूरी करीब 3 किलोमीटर है। इस मुहल्ले का नाम इंजीनियर अब्दुल वासे के नाम पर है। लेकिन बाद में यह मुहल्ला फहीम खान और साबिर आलम के गैंग के खूनी खेल के कारण कुख्यात हो गया। फहीम खान ने पिता की हत्या के बाद बदला लेने की कसम खायी थी। गैंगस्टर फहीम खान पर सगीर हसन की हत्या का आरोप लगा था। 2011 में कोर्ट ने इस मामले में फहीम को उम्रकैद की सजा सुनायी थी। साढ़े सोलह साल जेल में बंद रहने के बाद कोर्ट के आदेश पर फहीम खान की रिहाई हुई है।


