टीआरपी डेस्क। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार सुदर्शन रेड्डी पर नक्सलवाद के समर्थन का आरोप लगाया था। जिसके जवाब में रेड्डी ने कहा कि, हर नागरिक के जीवन स्वतंत्रता और संपत्ति की रक्षा करना उनका कर्तव्य है। उन्होंने शाह से सलवा जुडूम पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पढ़ने का आग्रह किया। उन्होंने, अमित शाह के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह उनका निजी फैसला नहीं था, यह सुप्रीम कोर्ट का सामूहिक फैसला था। उन्होंने कहा कि अगर अमित शाह ने वह 40 पन्नों का फैसला पढ़ा होता, तो शायद वह ऐसा बयान नहीं देते। आइए जानते हैं क्या हैं सलवा जुडूम, जिस पर वर्तमान में चर्चा तेज हो गई हैं ?
क्या हैं सलवा जुडूम
छत्तीसगढ़ सरकार ने नक्सलियों से निपटने के लिए ‘सलवा जुडूम’ अभियान की शुरुआत की थी। ‘सलवा जुडूम’ शब्द का गौंड भाषा में अर्थ है ‘शान्ति यात्रा’। ये आंदोलन छत्तीसगढ़ की तत्कालीन कांग्रेस सरकार के समर्थन से चलाया गया था। इसका उद्देश्य राज्य में नक्सली हिंसा को रोककर शांति स्थापित करना था। इस अभियान की शुरुआत जून 2005 में कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा की ओर से की गई थी।
राज्य सरकार ने इस आंदोलन से जुड़ने वाले ग्रामीणों को नक्सलियों से लड़ने के लिए हथियारों और रसद के साथ-साथ अन्य आवश्यक चीजें भी मुहैया कराई थी। बीजापुर के कुटरू क्षेत्र से एक छोटे से अभियान के साथ शुरु हुए सलवा जुडूम आंदोलन ने देखते ही देखते एक विशाल रूप ले लिया। बड़ी संख्या में आदिवासी इस अभियान से जुड़ गए, जिन्हें बाद में विशेष पुलिस अधिकारी का दर्जा भी दिया गया था।
सलवा जुडूम आंदोलन से जुड़े आदिवासियों के पास थे पारंपरिक हथियार
शुरुआत में सलवा जुडूम आंदोलन से जुड़े आदिवासियों के पास कुल्हाड़ी टांगिया और तीर-धनुष जैसे पारंपारिक हथियार थे, लेकिन बाद में उन्हें आधुनिक हथियार दिए जाने लगे। इसके बाद नक्सलियों और आदिवासियों में हिंसा की घटनाएं बढ़ने लगी। इसके परिणामस्वरूप ग्रामीण आदिवासियों को कैंप में शरण लेना पड़ा। जानकारी के मुताबिक सलवा जुडूम अभियान के दौरान करीब 55,000 ग्रामीण आदिवासियों को पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में शरण लेनी पड़ी। वहीं , अक्टूबर 2008 में प्रकाशित एनएचआरसी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि, सलवा जुडूम ने अपनी पहले की गति खो दी और अब यह छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा और बीजापुर जिलों में अपने 23 शिविरों तक सीमित रह गया।
आदिवासी युवाओं को SPO के तौर पर किया नियुक्त
छत्तीसगढ़ राज्य पुलिस ने आदिवासी युवाओं को विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) के रूप में नियुक्त किया, जो मूलतः नक्सलवाद से निपटने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक मिलिशिया बल था। फरवरी 2011 में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने नागरिकों को इस तरह हथियार देना अवैध घोषित कर दिया।
पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने की थी तारीफ
पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने नक्सलवाद से लड़ने में एसपीओ की भूमिका की प्रशंसा की है और “जहां भी आवश्यक हो” उनकी नियुक्ति का आह्वान किया है, जबकि छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा है कि “सलवा जुडूम राज्य में नक्सली खतरे से छुटकारा पाने का जवाब है। 5 जुलाई 2011 को, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने छत्तीसगढ़ राज्य को माओवादी छापामारों से लड़ने के लिए स्थापित किसी भी मिलीशिया बल को भंग करने का आदेश दिया।
अमित शाह ने क्या कहा था?
केंद्रीय गृह मंत्री ने रेड्डी पर हमला करते हुए कहा था, विपक्ष के प्रत्याशी सुर्दशन रेड्डी वही हैं, जिन्होंने वामपंथी उग्रवाद को मदद करने के लिए सलवा जुडूम का जजमेंट दिया था और अगर ये जजमेंट न दिया गया होता तो वामपंथी नक्सलवाद 2020 तक खत्म हो गया होता। यही सज्जन हैं, जिन्होंने विचारधारा से प्रेरित होकर सलवा जूडुम का जजमेंट दिया था।


