राजनांदगांव। जिले के डोंगरगढ़ में नवरात्र के अवसर पर मां बम्लेश्वरी मंदिर में आयोजित ‘दाई बमलई पंचमी भेंट’ के दौरान पहली बार गोंड आदिवासी अपने साथ खैरागढ़ राजपरिवार के राजकुमार भवानी बहादुर सिंह मंदिर में पहुंचे। इस दौरान गोंडों और राजकुमार ने पुरानी परंपरा के मुताबिक बैगा पद्धति से देवी मां की पूजा–अर्चना की। यहां राजकुमार ने मंदिर प्रबंधन और ट्रस्ट व्यवस्था पर गंभीर आरोप लगाए।

बैगा पद्धति से पूजा की रही है परंपरा

दरअसल बमलेश्वरी मंदिर का निर्माण यहां के राजा कमल नारायण ने किया था और बताया जाता है कि देवी मां उनके स्वप्न में आई थी। मंदिर निर्माण के बाद गोंड समाज के लोग यहां की परंपरागत ढंग से बैगा पद्धति से पूजा अर्चना करते आ रहे थे। राजकुमार भवानी बहादुर ने इसका जिक्र करते हुए बताया कि उनके परिवार की व्यस्तता के चलते राजा वीरेंद्र बहादुर ने मंदिर संचालन के लिए ट्रस्ट बनवाया और वे ट्रस्ट के आजीवन सदस्य रहे। मगर उनकी मृत्यु के बाद ट्रस्ट द्वारा राज परिवार की अनदेखी की गई और पूछपरख भी कम कर दी गई।

मंदिर में गोंड समाज की भी हुई उपेक्षा

राजकुमार भवानी बहादुर ने इस मौके पर आदिवासी समाज की परंपराओं और संस्थापक परिवार की अनदेखी का मुद्दा उठाया। उन्होंने बताया कि कालांतर में मंदिर में होने वाली पूजा अर्चना में ट्रस्ट के पदाधिकारियों द्वारा गोंड समाज के लोगों की उपेक्षा शुरू कर दी गई, और कालांतर में उन्हें पूजा पाठ से अलग कर दिया गया।

परंपरा के अपमान का आरोप लगाया राजकुमार ने

राजकुमार ने बताया कि छत्तीसगढ़ में अधिकांश राजघराने गोंड राजाओं के हैं और उनका घराना भी गोंड समाज से आता है। उन्होंने कहा कि बम्लेश्वरी धाम में सदियों से बैगा पूजा को प्राथमिकता दी जाती रही है। यह परंपरा उनके पूर्वज राजा कमल नारायण के समय से चली आ रही है। हालांकि, अब उन्हें और उनके वंश को जानबूझकर दरकिनार किया जा रहा है, जो परंपरा का अपमान है।

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उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि उनके दादा ने सेवा भाव से ट्रस्ट की नींव रखी, जिसमें सभी वर्गों को जगह मिली थी, लेकिन आज संस्थापक परिवार को ही बाहर कर दिया गया है। राजकुमार ने आरोप लगाया कि ट्रस्ट का संचालन अब अपनी मूल भावना से भटक गया है।

गोंड समाज ट्रस्ट को लेकर चला रहा है मुहिम

डोंगरगढ़ स्थित मां बमलेश्वरी के मंदिर का संचालन यहां ट्रस्ट पदाधिकारियों द्वारा अपने हिसाब से किया जा रहा है, और इससे नाराज गोंड आदिवासी समाज ने इसके खिलाफ मुहिम चला रखी है। बीते साल भर से समाज के लोग मंदिर ट्रस्ट में गोंड समाज को 50% प्रतिनिधित्व देने की मांग कर रहे हैं। बीते 3 नवरात्रि से गोंड आदिवासी मंदिर में होने वाले ‘दाई बमलई पंचमी भेंट’ के मौके पर आते हैं और रैली की शक्ल में पहुंच कर बैगा पद्धति से पूजा अर्चना करते हैं।

बैगाओं ने राजकुमार भवानी को दिया न्यौता

बमलेश्वरी मंदिर में इस बार ‘दाई बमलई पंचमी भेंट’ का मौका पहले से कुछ अलग था। इस बार इस आयोजन में शामिल होने के लिए गोंड समाज के लोग छत्तीसगढ़ के अलावा मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों से हजारों की संख्या में पहुंचे। इस मौके पर उन्होंने यहां के राजघराने के राजकुमार भवानी बहादुर को विशेष तौर पर आमंत्रित किया और कहा कि वे प्राचीन परंपरा के तहत राज परिवार के लोगों की भी सहभागिता चाहते हैं। इसी के तहत 26 सितंबर की शाम आदिवासी समाज के लोग बड़ी संख्या में परंपरागत वाद्य यंत्रों की धुन पर नाचते गाते हुए मंदिर परिसर में पहुंचे।

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डोंगरगढ़ में विवाद गरमाया

‘दाई बमलई पंचमी भेंट’ का यह आयोजन शुक्रवार (26 सितंबर) रात हुआ। जिसमें गोंडवाना गोंड समाज की ऐतिहासिक परंपरा का निर्वहन किया गया। राजकुमार भवानी बहादुर सिंह पहली बार इसमें शामिल हुए और सैकड़ों श्रद्धालुओं के साथ माता के दरबार पहुंचे। इसी मंच से उन्होंने अपनी बात रखी। भवानी ने बताया कि वे पहली बार बैगाओं के साथ देवी मां की मूर्ति तक गए और पूजा अर्चना की। जबकि इससे पहले उन्हें रोक दिया जाता था।

बताया जाता है कि ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने इस दौरान देवी मां की मूर्ति का अपमान किए जाने का आरोप लगाया है।इनका कहना है कि इस दौरान माता का मुकुट झुक गया था।

ट्रस्ट की चुनाव प्रणाली में सुधार की मांग

इस मौके पर भवानी बहादुर सिंह ने शासन-प्रशासन से अपील की कि ट्रस्ट की चुनाव प्रणाली में सुधार किया जाए और संस्थापक सदस्यों की राय को अनिवार्य किया जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समाज को उसका हक नहीं मिला, तो गोंड समाज अपने अधिकार लेने के लिए मजबूर होगा।

आदिवासी गोंड समाज का कहना है कि मां बम्लेश्वरी उइके गोत्र की आराध्य देवी हैं। उनका आरोप है कि कुछ लोगों ने मंदिर पर कब्जा कर उन्हें किनारे कर दिया है।

जानिए डोंगरगढ़ के रियासत कालीन इतिहास के बारे में

डोंगरगढ़ रियासत ब्रिटिश काल में खैरागढ़ और राजनांदगांव के साथ छत्तीसगढ़ की प्रमुख रियासतों में से एक थी, जिसका शासक राजा घासीदास बहादुरी और निर्भीकता के लिए प्रसिद्ध था। सन 1816 में डोंगरगढ़ से नागपुर भेजे जा रहे कर की राशि को राजा घासीदास ने लूट लिया, जिससे ब्रिटिश हुकूमत हक्का-बक्का रह गई। नागपुर के रेजिडेंट सर रिचर्ड जेडिंक्स ने खैरागढ़ के राजा टिकैत राय और नांदगांव के राजा महंत मौजीराम को आदेश दिया कि डोंगरगढ़ के राजा को बंदी बनाकर नागपुर लाया जाए, और दोनों रियासतों के शासकों ने डोंगरगढ़ पर चढ़ाई कर इसे जीत लिया।

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इसके बाद अंग्रेजों ने डोंगरगढ़ का आधा क्षेत्र खैरागढ़ और आधा नांदगांव को सौंप दिया, जबकि खैरागढ़ के राजा टिकैत राय की वीरता से प्रभावित होकर उन्हें सिंह टाइटल और डोंगरगढ़ की गद्दी का अधिकार भी दिया गया।

कालांतर में रियासतों के शासकों को राजकीय सम्मान और पेंशन दी गई और Instrument of Accession पर हस्ताक्षर के साथ खैरागढ़ रियासत भारत का हिस्सा बन गई।

राजा बीरेन्द्र बहादुर सिंह ने अपने पुत्रों रविन्द्र बहादुर और शिवेंद्र बहादुर को क्रमशः खैरागढ़ और डोंगरगढ़ का प्रबंधन सौंपा और 1976 में मां बम्लेश्वरी मंदिर के संचालन के लिए ट्रस्ट का गठन किया, जो आज तक मंदिर की पूजा और व्यवस्थाएं संभाल रहा है।

हालांकि, राजपरिवार की ओर से इस ट्रस्ट और मंदिर प्रबंधन को लेकर उठे विवाद ने न केवल डोंगरगढ़ बल्कि पूरे प्रदेश में हलचल मचा दी है। प्रमुख बात यह भी है कि मंदिर ट्रस्ट के पदाधिकारियों के बीच वर्चस्व को लेकर विवाद है और ट्रस्ट को लेकर होने वाले चुनाव में प्रत्याशी लाखों रुपए खर्च करते हैं। अब राज परिवार और गोंड आदिवासियों के उठ खड़े होने के चलते नया विवाद शुरू हो गया है।