टीआरपी डेस्क। Interview with Vaibhav Vishal : हमेशा से क्रिएटिव स्पेस में काम करने की चाहत रखने वाले बॉलीवुड के बिग स्क्रीन से लेकर ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर रिलीज़ होने वाली वेब सीरीज़ और फिल्मों के लेखक वैभव विशाल चौथे ‘हिन्द युग्म उत्सव’ में शामिल होने रायपुर पहुँचे थे। जहाँ ‘द रूरल पोस्ट’ के पत्रकार अक्षय अजय बेहरा से उनकी विशेष बातचीत हुई।

वैभव विशाल ने पहली बार लोकप्रियता और सराहना तब हासिल की जब उनकी लिखी वेब सीरीज़ ‘स्कैम 1992’ के लिए उनको फ़िल्मफेयर अवॉर्ड, क्रिटिक्स गिल्ड अवॉर्ड और स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन अवॉर्ड जैसे सम्मान मिले। इस सीरीज़ के डायलॉग ‘रिस्क है तो इश्क है’ पर पूरे देश में मीम्स बने थे। साल 2023 में रिलीज़ हुई नेटफ्लिक्स की टॉप-ट्रेंडिंग सीरीज़ ‘राणा नायडू’ की सफलता के बाद वैभव को और भी व्यावसायिक पहचान मिली। इसके अलावा वे ‘इनसाइड एज’ और ‘शेखर होम’ जैसी सफल ओटीटी सीरीज़ की कहानी और संवाद भी लिख चुके हैं।

आइए जानते हैं कि एड फ़िल्म इंडस्ट्री, कई टीवी चैनलों और इरॉस इंटरनैशनल जैसी बड़ी कंपनी में चीफ़ क्रिएटिव ऑफिसर के तौर पर लंबे समय तक काम करने के बाद वैभव विशाल ने नौकरी छोड़ने का निर्णय क्यों लिया, क्यों उन्होंने आरामदायक ज़िंदगी को छोड़कर संघर्ष का रास्ता चुना और किस वजह से सब कुछ छोड़कर बॉलीवुड में काम करने की ठानी।

सवाल: आपके संघर्ष का सफर कैसा था? ऐसा कहा जाता है कि बॉलीवुड में सभी को ठोकर खानी पड़ती है, क्या आपने भी यह अनुभव किया?

उत्तर: संघर्ष हर सफल व्यक्ति के सफर का एक अहम हिस्सा होता है, क्योंकि बिना संघर्ष के सफलता को मापा ही नहीं जा सकता। हाँ, यह ज़रूर है कि हर किसी के संघर्ष की अपनी अलग परिभाषा और अपनी परिस्थितियाँ होती हैं। दरअसल मैंने जीवन में बहुत कुछ हासिल कर लेने के बाद, एक मुकाम पर पहुँचकर खुद को साबित करने के बाद संघर्ष के रास्ते चलने का फ़ैसला लिया। वो भी सोच-समझकर और अपनी स्थितियों का आँकलन करने के बाद। मैंने यह तय किया कि यदि आने वाले दो साल तक भी मेरी कोई कमाई न हो, तब भी मेरे घर-परिवार और रहन-सहन में कोई बदलाव नहीं आएगा।

मैंने सोची-समझी फ़ाइनेंशियल प्लानिंग के साथ कदम बढ़ाया और चीज़ें धीरे-धीरे अपने आप होती चली गईं। मेरी जीवनशैली में कोई बदलाव नहीं आया, और अगर कभी कुछ छोटे मोटे उतार चढ़ाव आए भी, तो मेरे परिवार ने हमेशा मेरा साथ दिया। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो ट्रेन, बस या साइकिल से अपने संघर्ष की शुरुआत करते हैं।ईश्वर की कृपा से मैंने अपने संघर्ष का सफर ड्राइवर सहित कार में तय किया! यह ज़रूर था कि मेरा संघर्ष अभाव या पीड़ा में नहीं बीता, लेकिन सच्चाई यह है कि मैंने नौकरी छोड़ दी थी, और यह समझ नहीं पा रहा था कि शुरुआत कहाँ से करूँ। उस संघर्ष से गुज़रे बिना मैं नहीं रह सकता था।

सवाल: नौकरी छोड़ने के तुरंत बाद आपको काम मिलने लगा या आपको भी बड़े संपर्क स्थापित करने में समय लगा?

उत्तर: जब मैंने नौकरी छोड़ी, तब मैं इरॉस इंटरनैशनल में चीफ़ क्रिएटिव ऑफिसर था। एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में कई सालों तक काम कर चुका था। बॉलीवुड के लोगों से मेरी पहचान थी, मुलाकातें होती रहती थीं। सच कहूँ तो शुरुआत में मैंने किसी को बताया ही नहीं था कि मैंने नौकरी छोड़ दी है और अब लिख रहा हूँ। लेकिन मैं इस इंडस्ट्री में इतना समय दे चुका था, इतना काम कर चुका था कि जिन लोगों ने मेरा काम देखा था, वे खुद ही फोन करके पूछने लगे, ‘सुना है आजकल लिखने का सोच रहे हो?’

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ऐसा ही एक फोन हंसल मेहता का भी आया। उन्होंने मुझसे पूछा, ‘आजकल क्या कर रहे हो, वैभव?’ मैंने बताया कि नौकरी छोड़ दी है और अब लिख रहा हूँ। उन्होंने कहा, ‘तुम आकर मुझसे मिलो, हम साथ काम करेंगे।’ उनका नाम इंडस्ट्री में इतना बड़ा था कि मुझे इससे बेहतर अवसर नहीं मिल सकता था। उनके साथ काम करने के बाद और भी बड़े डायरेक्टर्स के फोन आने लगे। लोग मुझसे मिलने लगे, मेरे साथ काम करने की इच्छा जताने लगे।

सवाल: पिछले कुछ सालों में बिग स्क्रीन से ज़्यादा ओटीटी प्लेटफॉर्म का ट्रेंड बढ़ा है, इसे लेकर आप क्या सोचते हैं?

उत्तर: मेरे लिए सौभाग्य की बात रही कि मुझे सफलता बहुत जल्दी मिली। ‘स्कैम 1992’ से मिली पहचान ने मेरी ज़िंदगी बदल दी। उसके बाद मैंने ‘राणा नायडू’ के संवाद लिखे, जो नेटफ्लिक्स पर नंबर एक ट्रेंडिंग सीरीज़ रही और पूरी दुनिया के टॉप-50 शो में जगह बनाने वाली अकेली भारतीय सीरीज़ थी। यह मेरे लिए एक मील का पत्थर साबित हुई। मेरी सीरीज़ ‘इनसाइड एज’ को इंटरनैशनल एमी अवॉर्ड्स के लिए भी नामांकित किया गया था। इसलिए मैं कह सकता हूँ कि मैं अपने चुनावों के मामले में बहुत भाग्यशाली रहा हूँ और मेरी सारी सफलता मुझे ओटीटी स्पेस से ही मिली है।

ओटीटी प्लेटफॉर्म फ़िल्म इंडस्ट्री में काम करने वाले लोगों के लिए एक बेहतर माध्यम बन चुका है। इसने अनगिनत प्रतिभाशाली कलाकारों को मौका दिया है। कलाकार अपनी अलग पहचान बना पा रहे हैं। ऐसी कहानियों को भी मंच मिल रहा है, जिन्हें तीन घंटे की फ़िल्म में समेट पाना पहले बहुत मुश्किल हुआ करता था।

सवाल: पिछले कुछ समय की बात की जाए तो बॉलीवुड लगातार फीका पड़ता नज़र आ रहा है, इसका क्या कारण हो सकता है?

उत्तर: मैं खुद कहानियाँ लिखता हूँ, फ़िल्मों के लिए संजय गुप्ताऔरएकता कपूरजैसे दिग्गजों के लिए लिख चुका हूँ। बचपन से फ़िल्में देखता आया हूँ, फ़िल्में पसंद करता हूँ, इसलिए फ़िल्मों की थोड़ी-बहुत समझ है। मुझे सचमुच ऐसा लगता है कि आज का बॉलीवुड पहले जैसी फ़िल्में नहीं बना रहा। पहले की फ़िल्मों की अपनी भाषा होती थी, अपना चित्रण होता था, और एक अलग तरह का व्याकरण हुआ करता था जो अब देखने-सुनने को नहीं मिलता। पहले बॉलीवुड फ़िल्मों में खलनायक की अपनी अहमियत होती थी। लेकिन अमरीश पुरी के बाद मुझे नहीं लगता कि कोई खलनायक उस तरह से उभरकर सामने आया है।

बॉलीवुड फ़िल्मों की बदलती संस्कृति उनकी लोकप्रियता पर असर डाल रही है। दर्शकों की पसंद बदली है, पर उसके साथ तालमेल बैठाने की जगह फ़िल्मों की आत्मा कहीं खो गई है। मुझे नहीं लगता कि बॉलीवुड का अपने पुराने दौर में लौटना मुश्किल है, बस ज़रूरत इस बात की है कि आज के कलाकार और लेखक फिर से उस पुराने व्याकरण, उस आत्मा को पकड़ें जो बॉलीवुड को दुनिया भर में ख़ास बनाती है।

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सवाल: आपने बचपन से ही सोच रखा था कि बॉलीवुड में ही काम करना है या ज़िंदगी के किसी पड़ाव पर पहुँचकर लगा कि इस ओर जाना चाहिए?

उत्तर: मैं मूलतः पटना का रहने वाला हूँ और बिहार में अच्छे घरों के माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा पढ़ाई पूरी करे और फिर यूपीएससी की परीक्षा देकर कलेक्टर बने। लेकिन मैं हमेशा से एक क्रिएटिव स्पेस में ही काम करना चाहता था। स्कूल में पढ़ाई के दौरान ही मुझे पता था कि मुझे कहाँ पहुँचना है, इसलिए स्कूलिंग पूरी करने के बाद मैं बड़ौदा गया और वहाँ महाराजा सायाजीराव यूनिवर्सिटी में फाइन आर्ट्स की पढ़ाई की। वो मेरे जीवन के सबसे अच्छे दिन थे। मैं पेंटर बनना चाहता था, लेकिन यह भी जानता था कि उसमें ज़्यादा पैसे नहीं हैं।

उसके बाद मैं मुंबई आया और वहाँ मैनेजमेंट की पढ़ाई की, सिर्फ इसलिए ताकि घरवालों से यह कह सकूँ कि अगर मैं अपनी मनचाही दिशा में कुछ नहीं कर पाया, तो कम से कम एक अच्छी नौकरी तो मिल ही जाएगी। मैनेजमेंट की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने कुछ एड फ़िल्म कंपनियों के साथ काम किया। थोड़े समय बाद एमटीवी से जुड़ा और वहाँ लगभग दस साल रहा। ‘रोडीज़’ का हिस्सा भी रहा, लेकिन रिएलिटी शो के कल्चर को मैं अपना नहीं पाया, इसलिए उनसे दूरी बना ली।

एमटीवी के बाद मैं इरॉस इंटरनैशनल के साथ काम कर रहा था। ज़िंदगी आरामदायक थी, उस मुकाम पर पहुँच चुका था जहाँ ऑफिस में बैठकर सिर्फ दूसरों का काम देखने के पैसे मिलते थे। लेकिन भीतर हमेशा एक अधूरापन महसूस होता था, जो कहता था कि मैं यह करने के लिए मुंबई नहीं आया था। 38-39साल की उम्र में मैंने सब कुछ सोच-समझकर एक दिन फ़ैसला लिया और फ़िल्मों की कहानी लिखने के लिए नौकरी छोड़ दी। उस समय मेरे पास बड़े सपनों के अलावा कुछ नहीं था, लेकिन दिल में भरोसा था कि जिस मुंबई ने अब तक मुझे इतना कुछ दिया है, वह आगे भी मुझे निराश नहीं करेगी और लोगों का प्यार मिलता रहेगा।

सवाल: ‘राणा नायडू’ ने देश-दुनिया में धूम मचा दी, जिसके बाद आपको और आपकी कला दोनों को ही अलग पहचान मिली। तो क्या ज़िंदगी का यह ग्लैमर वाला फ़ेज़ आपको पसंद है?

उत्तर: अगर मैं सिर्फ रायपुर की ही बात करूँ, तो जब मैं यहाँ पहुँचा, तो बहुत से लोग मुझे रिसीव करने आए थे। वो पल मेरे लिए बहुत अहम था। लेकिन असली खुशी मुझे तब मिली जब मेरे स्टेज शो से पहले दो लड़के मुझे देखकर आपस में कह रहे थे, “ये वही ‘राणा नायडू’ वाले राइटर हैं।” जब मैंने उनकी वो बात सुनी, तो वो पल मेरे लिए सबसे अहम बन गया, क्योंकि मुझे मेरी कला के ज़रिए पहचान मिल रही थी, जैसे किसी पिता को अपने बच्चे की सफलता पर गर्व होता है।

मानवीय प्रवृत्ति है कि हर किसी को अपनी वाहवाही, अपनी पहचान, अपनी कला की सराहना अच्छी लगती है। मुझे भी यह पसंद है। लेकिन इस चीज़ का नशा किसी भी कलाकार के सिर पर नहीं चढ़ना चाहिए। इसलिए मैं हमेशा खुद को याद दिलाता रहता हूँ कि यह जो तारीफ़ें हैं, ये मेरी नहीं, मेरे काम की हैं। जब तक काम अच्छा रहेगा, अंजाम अच्छा रहेगा, तब तक यह सब चलता रहेगा।

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मेरा सोचने का तरीका थोड़ा अलग है। मेरा विश्वास नीचे से ऊँचाई को देखकर डरने में नहीं, बल्कि ऊँचाई पर पहुँचकर चुनौतियों को छोटा साबित करने में है। रही बात ग्लैमर की, तो बस इतना ही कहना चाहूँगा कि मैं एक छोटा-सा लेखक हूँ, जो अपना घर चलाने के लिए लिखता है। लोगों का प्यार मिल रहा है और उम्मीद है कि आगे भी मिलता रहेगा।

सवाल: वेब सीरीज़ में गालियों का उपयोग अब बहुत आम हो चला है। इससे आप कितने सहमत हैं?

उत्तर: एक लेखक हमेशा वही लिखना चाहता है जिससे उसके लिखे हुए शब्दों, संवादों और कहानियों से दर्शक जुड़ सकें। हम भी वही करते हैं। भला गालियाँ किसी लेखक ने थोड़े ही बनाई हैं! गालियाँ तो समाज में हमेशा से मौजूद रही हैं, बस पहले उन्हें इस तरह खुलकर प्रस्तुत नहीं किया जाता था।

अगर आप गौर करें तो जिन सीरीज़ में गाली-गलौज का इस्तेमाल ज़्यादा हुआ है, दर्शक उनसे ज़्यादा कनेक्ट कर पाते हैं। वजह यह नहीं है कि उनमें अभद्रता परोसी जा रही है, बल्कि इसलिए कि दर्शक यह महसूस करते हैं कि हमारी दुनिया में भी ऐसी ही परिस्थितियाँ बनती हैं और ऐसी ही भाषा बोली जाती है। जब दर्शक ऐसा महसूस करने लगते हैं, तो वे कहानी या किरदारों को अपने जीवन से जोड़ पाते हैं। यही वजह है कि लेखक गालियों का उपयोग करते हैं।

असल में इसमें लेखक की कोई अलग उपज नहीं होती। लेखक तो वही लिखता है जो दर्शक देखना और सुनना चाहते हैं। अगर किसी किरदार को आक्रामक, निगेटिव या असभ्य दिखाना है, तो उसके संवादों में गालियाँ शामिल करनी ही पड़ती हैं, तभी तो दर्शक सभ्य और असभ्य किरदार में अंतर कर पाते हैं।

सवाल: लेखकों को उनकी मेहनत का उचित श्रेय नहीं मिल पाता। आप इस बात से कितने सहमत हैं?

उत्तर: इस बात से मैं पूरी तरह सहमत हूँ। जब कोई फ़िल्म बनती है, तो ज़्यादातर क्रेडिट अभिनेता ले जाते हैं। उनके बाद डायरेक्टर और प्रोड्यूसर का नाम उभरकर सामने आता है। इन सबके बाद, नामों की लंबी सूची में कहीं जाकर लेखक को उसका नाम और थोड़ा-बहुत श्रेय दिया जाता है। जबकि मेरा मानना है कि लेखक इससे कहीं ज़्यादा का हक़दार होता है, क्योंकि अगर लेखक लिखना छोड़ दे, तो न अभिनेता अभिनय कर पाएगा और न डायरेक्टर निर्देशन।

Vaibhav Vishal’s Interview : हालाँकि अगर मैं अपनी बात करूँ, तो मेरी किस्मत इस मामले में बहुत अच्छी रही है। कुछ डायरेक्टर्स ऐसे भी हैं जो लेखक के महत्व को समझते हैं और उन्हें उनके हिस्से का सम्मान और क्रेडिट देते हैं। किस्मत कह लीजिए या कुछ और, मुझे हमेशा ऐसे ही डायरेक्टर्स मिले हैं। लेकिन यह भी सच है कि हर लेखक की किस्मत मेरी तरह नहीं होती। ज़्यादातर मौक़ों पर क्रेडिट स्टार्स ही ले जाते हैं, चाहे वे अभिनेता हों, डायरेक्टर हों या प्रोड्यूसर।