Republic Day 2026: बस्तर में सोमवार की सुबह गणतंत्र का नया सवेरा लेकर आई। कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों से लेकर अबूझमाड़ के सघन जंगलों तक, जहां वर्षों तक डर और लाल आतंक का असर रहा, वहां 40 गांवों में पहली बार तिरंगा लहराया गया। कर्रेगुट्टा, जो तेलंगाना सीमा पर स्थित है और कभी माओवादियों का मजबूत बेस कैंप माना जाता था, इस वर्ष चले लगभग एक महीने लंबे अभियान के बाद सुरक्षा बलों के नियंत्रण में आया। यहां स्थायी सुरक्षा कैंप स्थापित होने के साथ ही आसपास के गांवों में गणतंत्र दिवस मनाया गया।

यह गणतंत्र दिवस बस्तर के इतिहास में इसलिए खास रहा, क्योंकि माओवादी हिंसा के खिलाफ डबल इंजन सरकार के तहत चलाए गए अभियानों के बाद बस्तर संभाग का करीब 95 प्रतिशत इलाका माओवादी प्रभाव से मुक्त बताया जा रहा है। चार दशक बाद 40 गांवों में खुले तौर पर संविधान को सलामी दी गई। जिन गांवों में 26 जनवरी को सन्नाटा रहता था, वहां इस बार राष्ट्रगान गूंजा और तिरंगा लहराता नजर आया।

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पहली बार गांव में फहराया तिरंगा

गांवों में लोगों ने अपने हाथों से तिरंगा फहराया। यह सिर्फ एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भय से मुक्ति का प्रतीक बना। बीजापुर जिले के पेद्दाकोरमा गांव के किसान सोमड़ू पोड़ियम ने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में पहली बार गांव में झंडा देखा है। वहीं अबूझमाड़ के एड़जुम गांव निवासी रामधेर माड़वी ने बताया कि पहले 26 जनवरी का मतलब खतरा होता था, अब यह दिन गर्व का प्रतीक बन गया है।

डर की जगह लौटा भरोसा

यह बदलाव हाल के वर्षों में सुरक्षा बलों की स्थायी मौजूदगी से संभव हो पाया। बीते एक वर्ष में माओवादी कोर एरिया में 58 नए सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए, जिनमें से 53 कैंपों में इस बार पहली बार गणतंत्र दिवस मनाया गया। पिछले चार वर्षों में बस्तर संभाग में करीब 135 सुरक्षा कैंप खोले गए हैं। इससे न केवल सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हुई, बल्कि ग्रामीणों में यह विश्वास भी लौटा कि शासन-प्रशासन की मौजूदगी अब जमीन पर दिखाई दे रही है।

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लंबे संघर्ष के बाद बदले हालात

बस्तर में माओवाद के खिलाफ संघर्ष दशकों से जारी रहा है। वर्ष 2001 से दिसंबर 2025 तक हुई हजारों मुठभेड़ों में बड़ी संख्या में माओवादी मारे गए, वहीं इस संघर्ष में सुरक्षाबलों के जवानों और निर्दोष नागरिकों ने भी जान गंवाई। झीरम घाटी और ताड़मेटला जैसी घटनाएं आज भी बस्तर की स्मृति में दर्ज हैं। 2021 के टेकुलगुड़ेम हमले के बाद रणनीति में बदलाव किया गया और सुरक्षा बलों ने स्थायी रूप से क्षेत्र में तैनात होकर माओवाद की जड़ों पर प्रहार किया। इसके परिणाम वर्ष 2025 में स्पष्ट रूप से सामने आए।

रंजना वर्मा पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया से जुड़ी अनुभवी न्यूज राइटर हैं। उन्होंने देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर से मास्टर ऑफ मास कम्युनिकेशन की शिक्षा प्राप्त की है। रायपुर के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम करते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ और देश से जुड़े समसामयिक मुद्दों के साथ राजनीति, शिक्षा, सरकारी योजनाओं, कारोबार, तकनीक और लाइफस्टाइल जैसे विषयों पर लेखन किया है। समाचार लेखन के साथ SEO आधारित कंटेंट तैयार करने में भी उनकी अच्छी पकड़ है। सरल भाषा में तथ्यों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना और पाठकों तक विश्वसनीय जानकारी पहुंचाना उनकी लेखन शैली की प्रमुख विशेषता है।