रायपुर। छत्तीसगढ़ की माटी में दबी गौरवशाली विरासत और प्राचीन स्मारकों को अब केवल सरकारी फाइलों के भरोसे नहीं छोड़ा जाएगा। प्रदेश की ऐतिहासिक धरोहरों को नया जीवन देने और उन्हें सहेजने के लिए संस्कृति विभाग ने राजधानी रायपुर में एक बड़ी पहल की है।
बता दें कि महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में शनिवार से तीन दिवसीय विशेष कार्यशाला का आगाज हुआ है। 7 मार्च से 9 मार्च 2026 तक चलने वाले इस आयोजन का मुख्य मकसद छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में बिखरी पुरातत्वीय संपदा को स्थानीय लोगों की मदद से सुरक्षित करना है।
मैदानी स्तर पर तैयार होगा सुरक्षा कवच
अक्सर देखा जाता है कि गांवों और वनांचलों में स्थित प्राचीन मंदिर या मूर्तियां देखरेख के अभाव में खंडहर में तब्दील हो जाती हैं। सूत्रों के अनुसार, इसी समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल के निर्देश पर जिला स्तर पर पुरातत्वीय संघों को मजबूत किया जा रहा है। इस कार्यशाला में प्रदेश के अलग-अलग जिलों से आए प्रतिनिधि और विशेषज्ञ एक ऐसा ढांचा तैयार कर रहे हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर ही स्मारकों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
प्रथम तकनीकी सत्र के दौरान प्रो. आर. एन. विश्वकर्मा ने विस्तार से समझाया कि कैसे जिला संघों की भूमिका संग्रहालयों के संचालन में मील का पत्थर साबित होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक स्थानीय समुदाय अपनी विरासत से नहीं जुड़ेगा, तब तक संरक्षण का काम अधूरा है।
युवाओं को मिलेगा रोजगार, चमकेगा पर्यटन
इस पहल का एक बड़ा पहलू आर्थिक भी है। कार्यशाला में चर्चा की गई कि अगर जिला स्तर पर ये संघ सक्रिय होते हैं, तो न केवल धरोहरें बचेंगी बल्कि स्थानीय युवाओं के लिए गाइड और संरक्षण सहायक के रूप में रोजगार के नए रास्ते भी खुलेंगे। बता दें कि बस्तर से लेकर सरगुजा तक, छत्तीसगढ़ में पर्यटन की असीम संभावनाएं हैं, जिन्हें अब वैज्ञानिक ढंग से तराशने की तैयारी है।
संस्कृति विभाग के संचालक विवेक आचार्य ने साफ तौर पर कहा कि इस प्रशिक्षण के बाद जिला प्रतिनिधि अपने क्षेत्रों में जाकर अधिक प्रभावी तरीके से काम कर सकेंगे। उन्होंने प्रतिनिधियों द्वारा उठाई गई जमीनी चुनौतियों का व्यावहारिक समाधान भी सुझाया।
कौन-कौन रहा मौजूद?
तीन दिनों तक चलने वाले इस मंथन में कार्यक्रम प्रभारी डॉ. पी.सी. पारख, प्रभात कुमार सिंह और डॉ. अरुंधति परिहार सहित विभाग के तमाम आला अधिकारी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। कार्यशाला के समापन के बाद, ये प्रशिक्षित सदस्य अपने-अपने जिलों में जाकर सोए हुए पुरातत्वीय संघों को फिर से जीवित करेंगे।
ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले कुछ महीनों में हमारे सुदूर वनांचलों में स्थित प्राचीन स्मारकों की स्थिति में बड़ा सुधार देखने को मिलेगा।


