रायपुर। छत्तीसगढ़ के कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में कुछ समय पूर्व ही प्रकाश में आये ‘ग्रीन केव’ (Green Cave) में किए जा रहे निर्माण कार्यों को लेकर पर्यवरणविदों ने आपत्ति जताई थी। अब पर्यावरण संरक्षण से जुड़े इस संवेदनशील क्षेत्र में कथित तौर पर बिना अनुमति स्थायी निर्माण किए जाने की शिकायत के बाद केंद्र सरकार ने मामले को गंभीरता से लिया है और जांच के आदेश जारी किए हैं।

हाल ही में वन्यजीव प्रेमी व अधिवक्ता ब्यास मुनि द्विवेदी ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को लिखित में शिकायत की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि छत्तीसगढ़ में वन विभाग ने इको-टूरिज्म के नाम पर ग्रीन केव के प्रवेश द्वार पर एक स्थायी ‘वेलकम गेट’ और गुफा के भीतर सीमेंट-कंक्रीट की सीढ़ियों का निर्माण कराया है, जबकि इसके लिए आवश्यक वैधानिक अनुमति नहीं ली गई।

शिकायत में जानकारी दी गई है कि ग्रीन केव के प्रवेश द्वार पर बनाए गए गेट को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वह देखने में लकड़ी की संरचना जैसा प्रतीत हो, जबकि वास्तव में वह सीमेंट-कंक्रीट और ईंटों से निर्मित है। इसके अलावा, गुफा के अंदर पर्यटकों की सुविधा के लिए बनाई गई सीढ़ियां भी पूरी तरह स्थायी कंक्रीट संरचना हैं। आरोप है कि ये सभी निर्माण कार्य वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए किए गए हैं। इस अधिनियम के तहत वन क्षेत्र में किसी भी प्रकार का स्थायी निर्माण करने से पहले केंद्र सरकार की अनुमति लेना अनिवार्य होता है।

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निर्माण पर 48 लाख से अधिक की राशि खर्च

शिकायत में यह भी बताया गया है कि PCCF (वन्यजीव) द्वारा कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के निदेशक को इस परियोजना के लिए कुल 48.45 लाख रुपये की राशि स्वीकृत की गई थी। यह राशि दो किस्तों में जारी की गई—पहली किस्त 14.72 लाख रुपये और दूसरी 33.73 लाख रुपये की। इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद, यदि निर्माण कार्य नियमों के विपरीत पाए जाते हैं, तो यह न केवल पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन होगा, बल्कि वित्तीय अनियमितताओं के सवाल भी खड़े करेगा।

वन सलाहकार समिति के निर्देशों का उल्लंघन

इस शिकायत में वन सलाहकार समिति के 25 अक्टूबर 2021 के निर्देशों का भी उल्लेख किया गया है। जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि वन क्षेत्रों के भीतर किसी भी प्रकार के स्थायी निर्माण को ‘गैर-वानिकी गतिविधि’ माना जाएगा, और इसके लिए अनिवार्य रूप से अनुमति लेनी होगी। हालांकि, यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि इको-टूरिज्म के लिए अस्थायी संरचनाएं बनाई जाती हैं, तो उन्हें गैर-वानिकी गतिविधि की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा। ऐसे में ग्रीन केव में बनाए गए स्थायी ढांचे नियमों के दायरे में आते हैं या नहीं, यह जांच का विषय बन गया है।

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मंत्रालय ने मांगी जांच रिपोर्ट

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 2 अप्रैल 2026 को छत्तीसगढ़ शासन के अपर मुख्य सचिव (वन) को पत्र लिखकर पूरे मामले की जांच करने के निर्देश दिए हैं। मंत्रालय ने कहा है कि जांच कर यह स्पष्ट किया जाए कि निर्माण किन परिस्थितियों में किया गया और क्या इसके लिए आवश्यक अनुमति ली गई थी या नहीं। साथ ही यह भी निर्देशित किया गया है कि यदि किसी प्रकार की अनियमितता पाई जाती है, तो कानून के अनुसार उचित कार्रवाई की जाए और इसकी जानकारी शिकायतकर्ता तथा मंत्रालय दोनों को दी जाए।

पर्यावरणविद पहले ही जाता चुके हैं आपत्ति

भारत के प्रसिद्ध गुफा अन्वेषक और वैज्ञानिक डॉ. जयंत विश्वास के हवाले से कहा, ‘कांगेर घाटी की अब तक खोजी गई लगभग 27 गुफाओं में यह एकमात्र गुफा है जिसमें दोपहर के समय, वह भी केवल एक घंटे के लिए सूर्य की रोशनी पहुंचती है. इसमें स्टैलेक्टाइट्स हैं, जिन पर शैवाल की परत जमी हुई है, जिससे यह बारीक हरे रंग की ऑयल पेंटिंग जैसी बनावट देती है.’ ‘ग्रीन केव’ का नाम गुफा की दीवारों और छत से लटकी चूना-पत्थर की संरचनाओं (स्टैलेक्टाइट्स) पर मौजूद सूक्ष्म हरी माइक्रोबियल परतों के कारण पड़ा है. अपनी विशिष्ट भूवैज्ञानिक विशेषताओं के कारण इसे राष्ट्रीय उद्यान की दुर्लभ गुफाओं में गिना जाता है.

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विशेषज्ञों का कहना है कि इससे पर्यटन औपचारिक रूप से शुरू होने से पहले ही गुफा पारिस्थितिकी को अपूरणीय नुकसान हो सकता है। विशेषज्ञों ने जोर देकर कहा कि यदि भविष्य में कभी पर्यटन की अनुमति दी भी जाए, तो वह अत्यंत सीमित, कड़ाई से नियंत्रित और विज्ञान-आधारित होनी चाहिए, जिसमें मनोरंजन से पहले संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए।

ग्रीन केव को लेकर जनहित याचिका लंबित

ग्रीन केव को पर्यटन स्थल बनाये जाने को लेकर पर्यावरण प्रेमी नितिन सिंहवी ने पूर्व में अतिरिक्त मुख्य सचिव (वन) को शिकायत भेजकर चेतावनी दी थी कि यहां पर्यटन से अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड, गर्मी, नमी, धूल और कंपन उत्पन्न होगा, जिससे गुफा की आंतरिक रसायनिकी प्रभावित होगी और उसकी हरी सूक्ष्मजीवी परतों को गंभीर नुकसान पहुंचेगा। बावजूद इसके लगातार हो रहे निर्माण कार्य को देखते हुए नितिन सिंहवी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान स्थित ‘ग्रीन केव’ (हरित गुफा) को पर्यटन के लिए खोलने और वहां निर्माण कार्य करने के विरुद्ध दायर जनहित याचिका पर पूर्व में बिलासपुर उच्च न्यायालय में प्रारंभिक तौर पर सुनवाई हुई जिसमें वन विभाग से जवाब मांगा गया है। कोर्ट ने इस मामले में होली के बाद सुनवाई की तिथि तय करने का निर्देश दिया है। हालांकि नई तिथि अभी तय नहीं हुई है।