Kidney Transplant Rules: नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (NOTTO) ने एक बड़ा फैसला लिया है। अब देश भर के अस्पतालों को किडनी ट्रांसप्लांट के बाद मरीजों के बचने की दर, मौत के आंकड़े और ग्राफ्ट फेल होने जैसी पूरी जानकारी अपनी वेबसाइट पर पब्लिक करनी होगी।
ये खबर उन मरीजों के लिए बड़ी राहत है, जो अब तक बिना किसी ठोस आधार के किडनी ट्रांसप्लांट के लिए अस्पतालों का चयन करने को मजबूर थे।
क्या है नया नियम?
NOTTO के डायरेक्टर डॉ. अनिल कुमार ने साफ निर्देश दिए हैं कि अस्पताल अब केवल सफल सर्जरी के दावे नहीं कर पाएंगे। अब उन्हें ट्रांसप्लांट के बाद का फॉलो-अप डेटा भी नेशनल रजिस्ट्री को समय पर देना होगा। मरीजों को अब यह पता चल सकेगा कि किस हॉस्पिटल का ट्रैक रिकॉर्ड कैसा है।
क्यों लिया गया यह कड़ा फैसला?
इस बदलाव की नींव बीजेपी सांसद कैप्टन ब्रजेश चौटा की एक शिकायत ने रखी। उन्होंने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री को ज्ञापन सौंपकर मंगलुरु के मरीजों का उदाहरण दिया था। सांसद का कहना था कि हम सिर्फ ‘सफल ट्रांसप्लांट’ की संख्या देखते हैं, लेकिन ऑपरेशन के 3-5 साल बाद क्या स्थिति होती है, इसकी कोई निगरानी नहीं होती।
रायपुर के बड़े अस्पतालों में इलाज कराने वाले मरीजों और उनके परिजनों के लिए यह एक बड़ी पारदर्शिता है। अब अस्पताल को सर्जरी से पहले मरीज को जोखिम और संभावित नतीजों की पूरी जानकारी देना अनिवार्य होगा।
अस्पतालों को अब देना होगा 5 साल का हिसाब
नए नियम के तहत अब अस्पतालों को अपनी वेबसाइट पर एक स्टैंडर्ड रिपोर्टिंग फॉर्मेट में ये डेटा डालना होगा…
- डिस्चार्ज के वक्त मरीज की स्थिति।
- 6 महीने, 1 साल, 3 साल और 5 साल बाद का डेटा।
- कितने मरीजों का ग्राफ्ट फेल हुआ।
- कितने मरीज फॉलो-अप से बाहर हो गए।



