The victim received justice: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के एक फैसले ने गरीब के लिए न्याय कितना मुश्किल है, इसकी भयावह तस्वीर सामने ला दी है। हत्या के मामले में उम्रकैद काट रहे जांजगीर निवासी देव प्रकाश यादव को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच (जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस राधाकृष्ण अग्रवाल) ने बरी कर दिया।
सबसे चौंकाने वाली बात – आरोपी को 2016 में ही हाईकोर्ट से जमानत मिल गई थी, लेकिन जमानतदार नहीं मिलने से यह 9 साल तक जेल में ही पड़ा रहा।
पिता ने मंदिर-पेड़ के नीचे रात काटी, भीख मांगी
इस मामले में अधिवक्ता प्रियंका शुक्ला मसीहा बनीं। वह ‘जनहित चैंबर’ से जुड़ी हैं जो गरीबों को मुफ्त कानूनी मदद देता है। देव प्रकाश के पिता 70 वर्षीय बंशी यादव खुद भी इसी हत्या केस में आरोपी थे, लेकिन 2015 में बरी हो गए थे। बेटे को उम्रकैद और 500 रुपये जुर्माना हुआ था।
बेटे के जेल जाने के बाद परिवार बिखर गया। जमीन-मकान पर रिश्तेदारों ने कब्जा कर लिया। बंशी को मंदिर और पेड़ के नीचे रात गुजारनी पड़ी, भीख मांगनी पड़ी।
2022 में जब वह प्रियंका शुक्ला के पास पहुंचे तो उनके पास पूरी फाइल तक नहीं थी, सिर्फ बेटे का नाम था। पड़ताल में पता चला कि 2016 में जमानत मिल चुकी है लेकिन जमानतदार के अभाव में रिहाई नहीं हुई।
इसके बाद 2022 में याचिका लगी और व्यक्तिगत बंधपत्र (Personal Bond) पर उनकी रिहाई हुई। रिहाई के वक्त देव प्रकाश ने कहा था – “विश्वास नहीं हो रहा, लगा पूरी जिंदगी जेल में ही बीतेगी”।
आखिरकार 20 अगस्त 2026 को अंतिम सुनवाई में उम्रकैद खत्म हुई और वह पूरी तरह बरी हो गया।
अधिवक्ता प्रियंका शुक्ला ने कहा – “अदालत से राहत मिलना और उस राहत तक पहुंच पाना दोनों अलग चुनौतियां हैं। क्या 9 साल बाद इस परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति बदल पाएगी?”
FAQ: सालों तक सड़ता रहा जेल में
सवाल 1. देव प्रकाश यादव कौन है और 9 साल जेल क्यों रहा?
जांजगीर का देव प्रकाश हत्या केस में उम्रकैद काट रहा था। हाईकोर्ट ने 2016 में ही जमानत दे दी थी, लेकिन गरीबी के कारण जमानतदार नहीं मिला तो 2022 तक जेल में रहा।
सवाल 2. इसे न्याय कैसे मिला और कब बरी हुआ?
2022 में पिता बंशी यादव अधिवक्ता प्रियंका शुक्ला (जनहित चैंबर) से मिले। उन्होंने याचिका लगाकर व्यक्तिगत बंधपत्र पर रिहाई कराई और 20 अगस्त 2026 को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने उसे बरी कर दिया।
सवाल 3. इस मामले ने क्या सवाल खड़ा किया है?
यह मामला दिखाता है कि अदालत से जमानत मिलना ही काफी नहीं, उस तक पहुंचना भी चुनौती है। गरीबी के कारण एक व्यक्ति 9 साल तक बेवजह जेल में रहा, जबकि वह जमानत का हकदार था।


