Security personnel deployed with political leaders in Bastar Chhattisgarh
Security personnel deployed with political leaders in Bastar Chhattisgarh

Chhattisgarh Leaders Security Review: छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ अभियान में बड़ी सफलता के बाद अब सरकार सुरक्षा व्यवस्था के अगले चरण की तैयारी में है। बस्तर संभाग में 100 से ज्यादा जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा में तैनात सैकड़ों जवानों की भूमिका की समीक्षा की जाएगी। इनमें करीब 40 ऐसे जनप्रतिनिधि हैं, जिन्हें भारी सुरक्षा घेरा मिला हुआ है। उपमुख्यमंत्री और गृहमंत्री विजय शर्मा ने भी साफ किया है कि नक्सल गतिविधियां लगभग खत्म होने के बाद नेताओं की सुरक्षा की समीक्षा की जाएगी। इसके बाद ही तय होगा कि सुरक्षा घटाई जाएगी, हटाई जाएगी या पहले की तरह जारी रखी जाएगी।

सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक तरफ नक्सल विरोधी अभियान के लिए बस्तर में पर्याप्त सुरक्षा बल बनाए रखना है, वहीं दूसरी तरफ नक्सली खतरे के चरम दौर में नेताओं को दिए गए अतिरिक्त सुरक्षा घेरे की जरूरत को नए सिरे से परखना है।

नक्सल खतरा घटा तो बदलेगी सुरक्षा की व्यवस्था?

बस्तर में राजनीतिक नेताओं और जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा लंबे समय से बड़ी प्राथमिकता रही है। नक्सल प्रभावित इलाकों में नेताओं की आवाजाही और राजनीतिक गतिविधियों को देखते हुए बड़ी संख्या में जवान सुरक्षा में लगाए जाते रहे हैं। अब सुरक्षा व्यवस्था की प्राथमिकता बदलने की तैयारी है। अधिकारियों के मुताबिक, नक्सल विरोधी ऑपरेशन के लिए जरूरी बल बस्तर में ही रहेगा। लेकिन नेताओं को मिले अतिरिक्त सुरक्षा घेरे की अलग से समीक्षा की जाएगी। इसका मतलब यह नहीं है कि सभी नेताओं की सुरक्षा एक साथ हटा दी जाएगी। जिन जनप्रतिनिधियों के खिलाफ अभी भी गंभीर खतरा पाया जाएगा, उनकी सुरक्षा जारी रखी जा सकती है।

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असली सवाल अतिरिक्त सुरक्षा का

सुरक्षा समीक्षा में यह देखा जाएगा कि किसी नेता को वर्तमान में कितने खतरे का सामना है और उसे कितनी सुरक्षा की जरूरत है। इसके लिए नक्सली गतिविधियों की मौजूदा स्थिति, संबंधित व्यक्ति की राजनीतिक भूमिका, उसकी आवाजाही और सुरक्षा से जुड़े अन्य पहलुओं को आधार बनाया जा सकता है। अगर किसी नेता की सुरक्षा में तैनात अतिरिक्त जवानों की जरूरत नहीं पाई जाती है तो उन्हें दूसरी जिम्मेदारियों में लगाया जा सकता है। इसमें नियमित पुलिस ड्यूटी, कानून-व्यवस्था और सुरक्षा अभियानों जैसी जिम्मेदारियां शामिल हो सकती हैं।

बस्तर के नेता बोले- खतरा अभी खत्म नहीं हुआ

सुरक्षा में संभावित बदलाव की चर्चा के बीच बस्तर के कुछ नेताओं का कहना है कि उन्हें अभी भी अंदरूनी इलाकों में जाना पड़ता है और इसलिए सुरक्षा कम करना उचित नहीं होगा। भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष और बीजापुर निवासी जी वेंकट ने बताया कि नक्सलवाद समाप्त होने के बाद नेताओं की सुरक्षा कम किए जाने की जानकारी मिली है। उन्होंने बताया कि उन्हें वाय श्रेणी की सुरक्षा मिली है, जबकि उनके क्षेत्र के पूर्व मंत्री महेश गागड़ा को जेड श्रेणी की सुरक्षा मिली है। वेंकट के मुताबिक, नेताओं को अंदरूनी इलाकों में जाना पड़ता है, इसलिए फिलहाल सुरक्षा में कटौती नहीं होनी चाहिए। वहीं वनमंत्री केदार कश्यप, जिला सहकारी केंद्रीय बैंक अध्यक्ष दिनेश कश्यप, जगदलपुर विधायक किरण देव, पूर्व विधायक संतोष बाफना और अजजा आयोग के अध्यक्ष रूपसिंह मंडावी ने कहा कि उन्हें नेताओं की सुरक्षा कम किए जाने की जानकारी नहीं है।

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किस आधार पर तय होगी सुरक्षा?

सूत्रों के अनुसार सुरक्षा समीक्षा में कई बिंदुओं को देखा जा सकता है। इनमें संबंधित नेता के खिलाफ खतरे की प्रकृति, संबंधित इलाके में नक्सली गतिविधियों की स्थिति, नेता की वर्तमान राजनीतिक भूमिका और उसकी आवाजाही प्रमुख आधार हो सकते हैं। यानी सुरक्षा का फैसला केवल इस आधार पर नहीं होगा कि नक्सलवाद कमजोर हुआ है। किसी व्यक्ति को अब भी वास्तविक खतरा पाया गया तो उसका सुरक्षा घेरा बरकरार रखा जा सकता है।

BJP और कांग्रेस दोनों के नेताओं को सुरक्षा

बस्तर संभाग में सुरक्षा पाने वाले नेताओं में भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के नेता शामिल हैं। भाजपा से सुकमा, बीजापुर, दंतेवाड़ा, कांकेर, नारायणपुर और बस्तर के कई जिला पदाधिकारी, पूर्व जनप्रतिनिधि और स्थानीय नेता सुरक्षा घेरे में हैं। कांग्रेस के नेताओं में कर्मा परिवार के छबिंद्र कर्मा, पूर्व विधायक देवती कर्मा, बीजापुर विधायक विक्रम शाह मंडावी, कोंटा विधायक कवासी लखमा, पूर्व विधायक रेखचंद जैन, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज, पूर्व मंत्री मोहन मरकाम और जिला कांग्रेस अध्यक्ष कवासी हरीश समेत अन्य नेताओं को सुरक्षा मिली हुई है।

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जवानों की तैनाती पर भी पड़ेगा असर

अगर समीक्षा के बाद कुछ नेताओं की सुरक्षा कम की जाती है तो बड़ी संख्या में जवानों को अन्य जिम्मेदारियों के लिए उपलब्ध कराया जा सकता है। इससे पुलिस बल को कानून-व्यवस्था और दूसरे सुरक्षा अभियानों में इस्तेमाल करने की गुंजाइश बढ़ेगी। हालांकि अंतिम फैसला सुरक्षा समीक्षा के बाद ही होगा। सरकार का रुख फिलहाल साफ है कि सभी नेताओं की सुरक्षा एक साथ हटाने के बजाय खतरे के आधार पर फैसला लिया जाएगा। यानी बस्तर में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई के बाद अब सुरक्षा व्यवस्था का अगला सवाल यह है कि किस नेता को कितनी सुरक्षा की जरूरत है और कितने जवानों को दूसरी जिम्मेदारियों में वापस लगाया जा सकता है।

रंजना वर्मा पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया से जुड़ी अनुभवी न्यूज राइटर हैं। उन्होंने देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर से मास्टर ऑफ मास कम्युनिकेशन की शिक्षा प्राप्त की है। रायपुर के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम करते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ और देश से जुड़े समसामयिक मुद्दों के साथ राजनीति, शिक्षा, सरकारी योजनाओं, कारोबार, तकनीक और लाइफस्टाइल जैसे विषयों पर लेखन किया है। समाचार लेखन के साथ SEO आधारित कंटेंट तैयार करने में भी उनकी अच्छी पकड़ है। सरल भाषा में तथ्यों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना और पाठकों तक विश्वसनीय जानकारी पहुंचाना उनकी लेखन शैली की प्रमुख विशेषता है।