Scrub Typhus in Chhattisgarh: उत्तर छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग के वनांचल और ग्रामीण क्षेत्रों में लेप्टोस्पायरोसिस तथा स्क्रब टाइफस जैसे संक्रमणों के बढ़ते मामले स्वास्थ्य विभाग के लिए चिंता का विषय बन गए हैं। पिछले छह महीनों के दौरान मेडिकल कॉलेज अस्पताल अंबिकापुर में इन दोनों बीमारियों से जुड़े 40 से 50 से अधिक संदिग्ध और पुष्ट मरीज सामने आने की जानकारी मिली है।
इन मामलों की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अधिकांश मरीज ग्रामीण, जंगल और पहाड़ी क्षेत्रों से जुड़े हुए हैं। इन इलाकों में बड़ी संख्या में जनजातीय समुदाय निवास करता है। स्वास्थ्य विभाग और मेडिकल विशेषज्ञ संक्रमण के मामलों पर नजर बनाए हुए हैं और लोगों को समय पर जांच व इलाज कराने की सलाह दी जा रही है।
समय पर इलाज मिलने से अब तक नहीं हुई मौत
मेडिकल कॉलेज अस्पताल अंबिकापुर के मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. पंकज टेंभुरकर के अनुसार, सरगुजा संभाग में लेप्टोस्पायरोसिस और स्क्रब टाइफस के लक्षणों वाले मरीज सामने आए हैं। राहत की बात यह है कि समय पर पहचान और उपचार मिलने के कारण अब तक किसी मरीज की मौत की जानकारी नहीं है। हालांकि डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन बीमारियों की शुरुआती पहचान है। दोनों संक्रमणों के लक्षण सामान्य वायरल बुखार, मलेरिया, डेंगू और अन्य मौसमी बीमारियों से काफी मिलते-जुलते हो सकते हैं। ऐसे में केवल लक्षण देखकर बीमारी की सही पहचान करना मुश्किल हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक बुखार रहने या गंभीर लक्षण दिखाई देने पर जांच कराना बेहद जरूरी है।
पंडो, पहाड़ी कोरवा और मांझी समुदाय में मिले मामले
स्वास्थ्य विभाग की निगरानी में सामने आया है कि संक्रमण के कई मामले जंगल, पहाड़ी और दूरस्थ ग्रामीण इलाकों से जुड़े लोगों में पाए गए हैं। पंडो, पहाड़ी कोरवा और मांझी समुदाय के लोगों में भी संक्रमण के मामले सामने आने की बात कही गई है। सरगुजा संभाग के कई इलाके घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरे हुए हैं। बारिश के मौसम में यहां रहने वाले लोगों का दूषित पानी, गीली मिट्टी और झाड़ियों वाले क्षेत्रों से संपर्क बढ़ जाता है। इसी कारण कुछ परिस्थितियों में संक्रमण फैलने का जोखिम भी बढ़ सकता है। स्वास्थ्य विभाग ग्रामीण और संवेदनशील क्षेत्रों में जागरूकता बढ़ाने की जरूरत पर जोर दे रहा है।
दूषित पानी और संक्रमित जानवरों से फैल सकता है लेप्टोस्पायरोसिस
लेप्टोस्पायरोसिस लेप्टोस्पाइरा नामक जीवाणु से होने वाला संक्रमण है। यह बीमारी संक्रमित जानवरों के मूत्र से दूषित पानी या मिट्टी के संपर्क में आने पर फैल सकती है। चूहे, मवेशी, कुत्ते और अन्य संक्रमित जानवर इसके संक्रमण का स्रोत बन सकते हैं। बारिश और जलभराव के दौरान इसका खतरा बढ़ सकता है।
लेप्टोस्पायरोसिस के प्रमुख लक्षणों में शामिल हैं-
तेज बुखार
सिरदर्द
मांसपेशियों में दर्द
आंखों का लाल होना
उल्टी
कमजोरी और थकान
लाल घुन के काटने से फैलता है स्क्रब टाइफस
सरगुजा में चिंता बढ़ाने वाली दूसरी बीमारी स्क्रब टाइफस है। यह Orientia tsutsugamushi नामक जीवाणु के संक्रमण से होती है। यह संक्रमण संक्रमित चिगर्स यानी छोटे माइट के लार्वा के काटने से फैलता है। ये आमतौर पर झाड़ियों, घास और प्राकृतिक वातावरण वाले क्षेत्रों में पाए जा सकते हैं। स्क्रब टाइफस के मरीजों में तेज बुखार, ठंड लगना, सिरदर्द, बदन दर्द और जोड़ों में दर्द जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। कुछ मामलों में जिस जगह संक्रमित चिगर ने काटा होता है, वहां काले रंग का निशान या पपड़ी जैसा घाव दिखाई देता है। इसे एस्कर कहा जाता है और यह बीमारी की पहचान में डॉक्टरों के लिए महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है।
सामान्य बुखार समझकर नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, इन दोनों बीमारियों की सबसे बड़ी चुनौती समय पर पहचान है। शुरुआती चरण में मरीज को बुखार, कमजोरी और शरीर दर्द जैसी सामान्य समस्याएं होती हैं। ऐसे लक्षण मलेरिया, डेंगू या वायरल फीवर में भी दिखाई देते हैं। इस कारण कई बार मरीज शुरुआत में बीमारी को सामान्य बुखार मानकर इलाज में देरी कर सकता है। डॉक्टरों का कहना है कि यदि तेज बुखार लंबे समय तक बना रहे, शरीर में असामान्य दर्द हो या मरीज जंगल, झाड़ियों और दूषित पानी वाले क्षेत्र के संपर्क में रहा हो, तो तुरंत स्वास्थ्य केंद्र में जांच करानी चाहिए।
सरकारी अस्पतालों में हो रहा इलाज
अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में सामने आए संदिग्ध और पुष्ट मरीजों की जांच और उपचार किया जा रहा है। जरूरतमंद मरीजों को सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं के माध्यम से इलाज उपलब्ध कराया जा रहा है। पात्र मरीजों को आयुष्मान भारत योजना के तहत उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ भी मिल सकता है। स्वास्थ्य विभाग की प्राथमिकता समय पर मरीजों की पहचान कर उन्हें उचित इलाज उपलब्ध कराना है।
लैंडलॉक्ड छत्तीसगढ़ में भी संक्रमण का खतरा
लेप्टोस्पायरोसिस को केवल समुद्र तटीय राज्यों की बीमारी मानना सही नहीं है। संक्रमित पशुओं के मूत्र से दूषित पानी और मिट्टी के संपर्क में आने पर यह संक्रमण देश के अलग-अलग हिस्सों में फैल सकता है। सरगुजा जैसे वन और ग्रामीण बहुल इलाकों में बारिश के मौसम के दौरान लोगों का प्राकृतिक वातावरण और जलभराव वाले क्षेत्रों से संपर्क बढ़ जाता है। इससे संक्रमण का जोखिम भी बढ़ सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि लोगों को घबराने के बजाय सावधानी बरतनी चाहिए। दूषित पानी से बचाव, जंगल और झाड़ियों वाले इलाकों में शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनना तथा बुखार होने पर समय पर जांच कराना संक्रमण से बचाव के लिए महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।


