Raut Nacha Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ में हर साल दिवाली के ठीक दूसरे दिन यानी गोवर्धन पूजा से एक अनूठा लोकनृत्य शुरू होता है, जिसे राउत नाचा कहा जाता है। भगवान श्री कृष्ण के वंशज माने जाने वाले यादव समुदाय (यदुवंशी) के लोग इस परंपरा को हजारों सालों से निभाते आ रहे हैं।
आखिर क्या है राउत नाचा का इतिहास और क्यों आज भी इसकी परंपरा उसी उत्साह से निभाई जाती है? आइए जानते हैं।
भगवान कृष्ण के वंशज निभाते हैं परंपरा
राउत नाचा छत्तीसगढ़ के लोकप्रिय लोकनृत्यों में शामिल है। इसे खासतौर पर बिलासपुर और आदिवासी इलाकों में किया जाता है। दूध-दही का काम करने वाले यादव समुदाय के लोग इसे परंपरा के तौर पर निभाते हैं। राउत नाचा की शुरुआत दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा से होती है। यह परंपरा 7 से 14 दिनों तक चलती है। इस दौरान यदुवंशी लोग टोलियों में घर-घर जाते हैं और पारंपरिक नृत्य करते हैं। बदले में उन्हें वस्त्र और अन्न भेंट किए जा
कृष्ण की जीत से जुड़ी है मान्यता
राउत नाचा को भगवान श्रीकृष्ण की विजय का प्रतीक माना जाता है। इसे दिवाली के बाद गौड़ उत्सव के दिन किए जाने की परंपरा है। मान्यता के अनुसार, यादव समुदाय इस अवसर को श्रीकृष्ण द्वारा अधर्मी राजा कंस के वध और बुराई पर अच्छाई की जीत की खुशी से जोड़ता है। नृत्य के दौरान यदुवंशी भगवान कृष्ण के जीवन से जुड़े दोहे और वीरगाथाएं गाते हैं। इसके अलावा कवि कबीर और तुलसी के छंद भी प्रस्तुत किए जाते हैं। इस तरह राउत नाचा में भक्ति के साथ नीति, पौराणिक प्रसंग और लोक परंपराएं भी दिखाई देती हैं।
रंगीन वेशभूषा और सजी हुई लाठियां होती हैं खास
राउत नाचा में यादव समुदाय के पुरुष नर्तक हिस्सा लेते हैं। वे पारंपरिक चमकीले और रंगीन कपड़े पहनते हैं। कमर और टखनों में घुंघरू बांधे जाते हैं। नर्तकों के हाथों में सजी हुई लाठियां और धातु की ढाल होती है। वे टोलियों में घरों से निकलते हैं और नृत्य करते हुए अलग-अलग प्रसंग प्रस्तुत करते हैं। नृत्य के बीच भक्ति, नीति, हास्य और पौराणिक कथाओं से जुड़े दोहे गाए जाते हैं। इन प्रस्तुतियों के जरिए लोकजीवन और धार्मिक कथाओं को एक साथ सामने लाया जाता है।
महाभारत की कहानियों की भी मिलती है झलक
राउत नाचा के दौरान महाभारत काल से जुड़ी कहानियों को भी अलग अंदाज में प्रस्तुत किया जाता है। इन प्रस्तुतियों में आदिवासी जीवन शैली की झलक भी देखने को मिलती है। सजी हुई लाठियों के साथ गीतों के बीच शौर्य और शृंगार के भाव भी प्रस्तुत किए जाते हैं। यही वजह है कि राउत नाचा केवल नृत्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसमें गीत, कथा और अभिनय का भी मेल दिखाई देता है।
इन लोकवाद्यों से बनता है राउत नाचा का माहौल
राउत नाचा में छत्तीसगढ़ के कई पारंपरिक लोकवाद्यों का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें टिमकी, मोहरी, दफड़ा, ढोलक, सिंगबाजा, मांदर और ड्रम शामिल हैं। टिमकी अर्धगोलाकार ताल वाद्य है। मोहरी फूंककर बजाई जाती है। दफड़ा डफली जैसा वाद्य है। वहीं मांदर ढोलक जैसा, लेकिन बेलनाकार वाद्य होता है। इन वाद्यों की ताल, घुंघरुओं की आवाज और पारंपरिक गीतों के साथ राउत नाचा की प्रस्तुति पूरी होती है। इस लोकनृत्य में छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, धार्मिक आस्था और पारंपरिक जीवन शैली की झलक एक साथ दिखाई देती है।


